डॉक्टर आंबेडकर ने कैसे देखा था बेहतर समाज का सपना, क्यों जरूरी है रोटी के साथ गरिमा

विज्ञापन
रमाशंकर सिंह

दुनिया के अन्य देशों की तरह भारतवासी भी अपने बारे में ऊंचा ख़याल रखते हैं. वो वक़्त-बेवक़्त इसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी करते रहते हैं. इस प्रक्रिया में वे अपनी सभ्यतागत गैर-बराबरी, बहिष्करण और हिंसा को छिपा ले जाना चाहते हैं. लेकिन ऐसा हमेशा होता नहीं है और उनके बीच से ही कोई इस सबके बारे में ऊंची और स्पष्ट आवाज़ में बोल देता है. कोई सफाई कर्मचारी, किसी कार्यालय में काम करने वाली अस्थायी महिला श्रमिक या किसी सीवर में दम तोड़ता दलित नौजवान कह देता है कि भारत में सब कुछ ठीक नहीं है. इसे ठीक किया जाना चाहिए. जिन लोगों ने भारत को एक सभ्यता के रूप में उसकी सीमाओं से परिचित करवाया है, उसमें बाबा साहेब डॉ. बीआर आंबेडकर (14 अप्रैल 1891- 6 दिसम्बर 1956) का नाम सर्वोपरि है. इसके पहले यह काम महात्मा बुद्ध कर चुके थे. इन महापुरुषों ने समानता, करुणा और मैत्री के द्वारा एक बेहतर समाज के निर्माण का सपना देखा. आधुनिक भारत में समता, गरिमा और करुणा के आधार पर एक भारतीय मनुष्य के निर्माण का स्वप्न डॉ. आंबेडकर ने देखा. उनका यह सपना उनके निजी जीवन, उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के भारत के सार्वजनिक जीवन, भारत में उपनिवेशवाद की उपस्थिति और आज़ादी की लड़ाई, अमेरिका-यूरोप में उनकी पढ़ाई के दौरान उपजा था.

डॉक्टर आंबेडकर का संन्यासियों सा जीवन

अपनी कठोर मेहनत, ऊंचे दर्जे की तार्किकता और करुणा से दूसरों के जीवन में उजाला भर देने की उनकी क्षमता ने उन्हें एक सभ्यतागत और मसीही नायक में बदल दिया है. लेकिन यह अनायास नहीं हुआ है. उन्हें उपेक्षा सहनी पड़ी है. वे बार-बार तपे हुए सोने की तरह बाहर निकल कर आए हैं. एक बार तो उन्हें अपने जीवन के दौरान और दूसरी बार 1960 से लेकर 1985 तक. उत्तर भारत में जब बहुजन आंदोलन उभरने लगा तो वे जगह-जगह दिखाई देने लगे- मूर्तियों और बहसों में, चुनावी सभाओं से लेकर साहित्य और कविता में. भारतीय लोगों ने जब उन पर दुबारा नज़र डाली तो पाया कि उनके जीवन और शिक्षाओं में ऐसा बहुत कुछ है जो भूमिहीन, वंचित और सामाजिक रूप से सबाल्टर्न जगहों पर मौजूद समुदायों और औरतों की जिंदगानी को बदल सकता है.

'हर वर्ष एक महानायक' गढ़ने वाले देश भारत में, आम तौर पर व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में एक फांक बनी रहती है. आज़ादी के आंदोलन के दौरान देश में यह दुर्गुण न्यूनतम था. उसके नायकों के व्यक्तिगत जीवन और सार्वजनिक व्यवहार में एक साम्य दिखता था. इसे डॉक्टर आंबेडकर का जीवन परिलक्षित करता है. लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से एमएससी, इकोनॉमिक्स की डिग्री लेकर लौटे आंबेडकर को जब सिडेनहम कॉलेज में नौकरी मिली तो उनकी आर्थिक दिक़्क़तें पहले से कम हुईं, लेकिन समाप्त नहीं हुईं. वह दिन भर कॉलेज में पढ़ाते, शाम को पढ़ते, पूरा घर शांत रहता. उनकी पत्नी रमाबाई को पता रहता कि डॉ. आंबेडकर किसी बड़े उद्देश्य के लिए यह जीवन जी रहे हैं. डॉ. आंबेडकर  के जीवनीकार अशोक गोपाल लिखते हैं कि 'संन्यासियों जैसे इस जीवन से उन्हें बाहर की परिस्थितियों ने खींच लिया'. जनवरी 1919 में उन्होंने लॉर्ड साउथबरो की अध्यक्षता में गठित समिति के सामने अपना प्रतिवेदन रखा.इसमें उन्होंने कहा कि भारत के अस्पृश्य कैसे अलग हैं, उनकी समस्या कैसे अन्य समुदायों से अलग है; जबकि स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा इसे अखंड इकाई मानती थी. इसी दौर में उन्होंने दलित खुदमुख्तारी की बात कही और जोर दिया कि दलितों को अपनी भलाई करने के लिए खुद आगे आना होगा. अगले साल वे फिर विदेश चले गए अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए. वापस लौटकर, 1923 के बाद उन्होंने भारत के सार्वजनिक जीवन में अपने आपको झोंक दिया. 1924 में बहिष्कृत हितकारिणी सभा गठित की, बाटलीबोई एकाउंटेंसी ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में अंशकालिक प्रवक्ता के रूप में पढ़ाना शुरू किया. लेकिन वेतन इतना नहीं था जो उनके व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन के लिए पर्याप्त हो. आनंद तेलतुम्बडे ने लिखा है कि वे 1928 तक ट्यूशन भी पढ़ाते रहे. दो-दो बड़े देशों की शानदार डिग्री लिए डॉ. आंबेडकर जितना व्यक्तिगत मोर्चे पर उद्दिग्न थे, उतना ही सार्वजनिक मोर्चे पर भी. वे चाहते तो जीवन के इस मोड़ पर खुद को अलग कर सकते थे और कुछ ही समय में उनका जीवन सुखदायक हो जाता लेकिन किसी बोधिसत्व की तरह उन्हें देश की एक बड़ी जनसंख्या का जीवन ज्यादा आकर्षित करता था. वे उसे बेहतर करना चाहते थे. यह अनायास नहीं है कि कुछ बाद की दलित कविताओं और साहित्य में उन्हें 'बोधिसत्व' कहा गया है. 'बोधिसत्व' वह है जो सबको मुक्ति दिलाने के बाद अपनी मुक्ति के बारे में सोचता है.

दुनिया को बताई दलितों की पीड़ा

डॉ. आंबेडकर उनको अपने कष्ट से ज्यादा भारत के उन करोड़ों लोगों का कष्ट भारी लगा जिन्हें तब अस्पृश्य (अछूत) कहा जाता था. वे लोग जीवन की हर जगह से धकियाए गए थे, यहां तक कि पानी पीने की जगहों से भी. साल 1927 में इसके लिए उन्होंने 'महाड सत्याग्रह' किया. उन्होंने भारत के लोगों को तथ्यात्मक तरीके से बताया कि वे खाने-पीने की जगहों पर भेदभाव करते हैं और इसे सांस्कृतिक तरीकों से लागू करते हैं और जब कोई नहीं मानता तो हिंसा पर उतर आते हैं. इस घटना के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और महात्मा गांधी सहित भारत के लोगों को मनवा लिया कि दलितों का उत्थान हुए बिना भारत का उत्थान नहीं हो सकता. साल 1932 में हुए पूना पैक्ट में उन्होंने भले ही महात्मा गांधी की मांग मान ली थी, लेकिन इसने अस्पृश्य जनों की समस्या को व्यापक विचार-विमर्श का हिस्सा बनाया. कांग्रेस को अपनी राजनीति बदलनी पड़ी और 1935 के भारत शासन अधिनियम में 'अनुसूचित जाति' की नई श्रेणी जोड़ी गई.

डॉ. आंबेडकर  के प्रयासों से अनुसूचित जाति में शामिल समुदायों को आरक्षण का अधिकार मिला. फिर भी बात इतनी ही नहीं है. उन्होंने कहा था कि मनुष्य को केवल रोटी ही नहीं बल्कि गरिमा भी चाहिए. उनकी भौतिक और वैचारिक उपस्थिति ने करोड़ों लोगों को आत्मसम्मान के लिए आवाज़ उठाना सिखाया. 26 जनवरी, 1950 को जब 'भारत का संविधान' लागू हुआ तो उसमें उसने भारत के सार्वजनिक जीवन को समानता के आधार पर अनुशासित करने का प्रयास किया और स्पष्ट कहा कि एक नागरिक के रूप में सभी बराबर हैं. जो पीछे छूट गए हैं, उन्हें आगे लाने के लिए सरकार क़दम उठाए. इस दिशा में भारत को प्रेरित करने में डॉ. आंबेडकर की मेहनत और विश्वदृष्टि शामिल थी. उन्होंने न केवल अस्पृश्यता का कानूनी अंत करवाया बल्कि न्यायालयों में मूलाधिकारों को लागू करवाने वाले प्रावधानों को शामिल करने की भूमिका संविधान सभा के अपने शुरुआती भाषणों में ही तैयार कर दी थी. आज भी भारत का कमज़ोर से कमज़ोर व्यक्ति न्यायालय में इस विश्वास के साथ जाता है कि उसकी बात सुनी जाएगी.

Advertisement

राजनीतिक ताक़त से निकलता बेहतर जीवन का रास्ता

डॉ. आंबेडकर का शुरू से ही मानना था कि राजनीतिक ताक़त ही अस्पृश्य जनों को बेहतर भविष्य दे सकती है. लेकिन उन्होंने यह भी महसूस किया कि केवल राजनीति सब कुछ नहीं बदल सकती. उन्होंने कहा कि केवल राजनैतिक लोकतंत्र पर्याप्त नहीं है, उसे सामाजिक लोकतंत्र में बदलना होगा. उनके लिए सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ था- स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व को जीवन का आधार बनाना. उनका वह मशहूर भाषण याद कीजिए जब उन्होंने कहा था कि 'आर्थिक स्तर पर हमारा समाज ऐसा है जिसमें कुछ लोगों के पास अतुल संपत्ति है और कुछ निरी निर्धनता में जीवन बिता रहे हैं. 26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं. राजनैतिक जीवन में हम समता का व्यवहार करेंगे और सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में असमानता का... हमें इस विरोधाभास को जितनी जल्दी हो सके, मिटा देना चाहिए.''

आज यह विरोधाभास कहीं और ज्यादा स्पष्ट हो रहे हैं. आर्थिक और सामाजिक असमानता बढ़ रही है. सामाजिक, सांस्कृतिक और शासकीय तौर पर इसे न्यूनतम किए बिना भारत किसी बेहतर सभ्यता का दावा नहीं पेश कर सकता है.

Advertisement

(डिस्क्लेमर: लेखक कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी  हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

पाठकों से अपील:  अगर आप भी किसी विषय पर लेख लिखना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. आप अपने पसंद के विषय पर लेख लिखकर हमें भेजें. लेख की शब्द सीमा 1500 शब्द है. लेख मंगल फॉन्ट में टाइप होना चाहिए. एक जरूरी बात, लेख मौलिक होना चाहिए, वह कहीं और प्रकाशित नहीं होना चाहिए, वह पूरा या आंशिक तौर पर भी कहीं से कॉपी किया हुआ या AI की मदद से तैयार किया हुआ नहीं होना चाहिए. लेख पसंद आने पर उसे हम अपने ब्लॉग सेक्शन में जगह देंगे. लेख को आप हमारी ईमेल आईडी पर Edit.Blogs@ndtv.com पर भेज सकते हैं.

Topics mentioned in this article