होर्मुज पर अनसुनी क्यों रह गई डोनाल्ड ट्रंप की अपील, क्यों ध्यान नहीं दे रहे हैं अमेरिका के मित्र देश

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Harsh V. Pant

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए एक व्यापक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक गठबंधन बनाने की कोशिश आज की भू-राजनीति के एक परिचित तनाव को दर्शाती है. यह जिम्मेदारी साझा करने की अमेरिकी उम्मीदों और ऐसे संकट के समय उसके दोस्त देशों की जोखिम उठाने की इच्छा की कमी के बीच का अंतर. इन देशों को यह लगता है कि यह संकट उनका पैदा किया हुआ नहीं है.

अमेरिका ने जापान, दक्षिण कोरिया, नाटो के सदस्य यूरोपीय देशों और यहां तक कि चीन जैसे ऊर्जा-निर्भर देशों से यह अपील की थी. लेकिन किसी भी देश की कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.अमेरिका के किसी भी सहयोगी देश ने होर्मुज जलडमरूमध्य में नौसैनिकों की तैनाती नहीं की है. उनकी यह हिचकिचाहट आकस्मिक नहीं है, इसके पीछे रणनीतिक गणना और राजनीतिक असहजता दोनों ही कारण हैं.

ईरान की सोची-समझीं चालें

ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य की औपचारिक नाकेबंदी जैसे उग्र कदम से बचते हुए, उसे एक सलेक्टिव चेकप्वाइंट के रूप में बदल दिया है. वह चीन, भारत और तुर्की जैसे उन देशों को अपेक्षाकृत आसान आवाजाही की इजाजत दे रहा है, जिन्हें वह अपना दुश्मन नहीं मानता है. वहीं वह अमेरिका और उसके समर्थक देशों के लिए इस रास्ते को जटिल बना रहा है. इस तरह तेहरान ने एक संतुलित बाधा खड़ी की है. इस वजह से वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब पांचवां हिस्सा ले जाने वाला यह मार्ग आंशिक रूप से ठप पड़ गया है. इससे कीमतें बढ़ी हैं और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं पर असमान रूप से दबाव पड़ा है.

इस हालत में ट्रंप का होर्मुज जलडमरूमध्य खुलवाने के लिए सहयोगी देशों से जिम्मेदारी साझा करने पर जोर देना किसी नई रणनीतिक पहल से ज्यादा मजबूरी का परिणाम लगता है. उनका तर्क है कि खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा पर निर्भर देशों को अपने हितों की रक्षा खुद करनी चाहिए, लेकिन यह तर्क प्रभावी नहीं रहा. इससे यह धारणा मजबूत हुई है कि अमेरिका उस संकट को लागत दूसरों पर डालना चाहता है, जिसकी पृष्ठभूमि बनाने में उसकी भूमिका रही है.

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साझेदार देशों की अनिच्छा का एक कारण इस टकराव की उत्पत्ति भी है. ईरान पर अमेरिका और इजरायल पर हमला किसी व्यापक गठबंधन के निर्माण या कूटनीतिक तैयारी के बिना किए गए थे. इसलिए कई सहयोगी इस स्थिति को सामूहिक सुरक्षा चुनौती की बजाय सीमित रणनीतिक पहल के रूप में देखते हैं.जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों ने यह कहते हुए इससे खुद को अलग कर लिया कि यह नाटो का मिशन नहीं है.

जोखिम से भरा हुआ समुद्री इलाका 

व्यावहारिक स्थितियां भी समस्या को जटिल बनाती हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य सिर्फ एक समुद्री मार्ग नहीं है, बल्कि एक अत्यधिक विवादित क्षेत्र है, जहां ईरान की माइन, ड्रोन, मिसाइल और तेज हमला करने वाली नौकाएं जैसी असममित क्षमताएं लागत को बढा सकती हैं. कई देशों के लिए अपने महंगे नौसैनिक संसाधनों को ऐसे क्षेत्र में भेजना, जो जल्द ही घातक क्षेत्र बन सकता है, रणनीतिक रूप से अव्यावहारिक होगा, खासकर ऐसे समय जब कोई स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य या निर्णायक सैन्य बढ़त न हो.

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घरेलू राजनीति भी अहम भूमिका निभाती है. जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में ऊर्जा के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, इसके बावजूद उन्होंने कोई रणनीतिक आक्रामकता नहीं दिखाई. इसकी बजाय, बाहरी संघर्षों में उलझने को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी है. सैन्य हस्तक्षेप के प्रति जनमत सावधानी भरा है, बल्कि कई बार विरोधी है. यूरोपीय देश भी लंबे सैन्य अभियान के अनुभव के कारण टकराव बढ़ाने से बचना चाहते हैं.

खाड़ी के इलाके में गहरे ऊर्जा हितों के बावजूद चीन ने भी अमेरिकी नेतृत्व वाली इस पहल में शामिल होने की कोई खास इच्छा नहीं दिखाई है. इसमें शामिल होना न केवल जोखिम भरा होगा, बल्कि यह अमेरिका के साथ रणनीतिक नजदीकी का भी संकेत देगा,खासकर ऐस समय में जब दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है.

मदद मांगने की बजाय दबाव की रणनीति

ट्रंप की बयानबाजी ने इन समस्याओं को और बढ़ाया है. सहयोगियों के असहयोग पर सार्वजनिक टिप्पणी, नाटो को लेकर चेतावनियां और सहयोगी देशों को दिए गए अल्टीमेटम- इन सबने एकजुटता की जगह रक्षात्मक प्रतिक्रिया पैदा की है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दबाव बनाकर अपनी बात मनवाना, पूर्व सहमति और भरोसे की जगह नहीं ले सकता.

वहीं दूसरी ओर, ईरान ने इन मतभेदों का कुशलतापूर्वक फायदा उठाया है. उसने यह सुनिश्चित किया है कि सभी पक्ष समान रूप से प्रभावित न हों. इससे सामूहिक कार्रवाई की भावना कम हो गई है. जिन देशों पर असर कम हुआ है, वे पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के हित में जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं.

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यह स्थिति एक रणनीतिक असंतुलन को दर्शाती है. अमेरिका उस संकट में सहयोग चाहता है, जिसने उसके एकतरफा फैसलों से आकार लिया है, जबकि उसके साझेदार लागत, जोखिम और राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए सतर्क रुख अपना रहे हैं. ट्रंप का भविष्य में समर्थन मिलने का भरोसा उस हकीकत से मेल नहीं खाता, जिसमें रणनीति बदले बिना बोझ मुख्य रूप से अमेरिका पर ही रहेगा. यह घटनाक्रम एक बड़ा सबक भी देता है- संकट के बीच में गठबंधन नहीं बनाए जा सकते. इसके लिए पहले से वैधता, साझा जिम्मेदारी और स्पष्ट साझा हितों की जरूरत होती है, ये इस मामले में काफी हद तक नदारद नजर आ रहे हैं. 

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( डिस्क्लेमर: हर्ष वी पंत नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं,उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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