नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद एक सवाल की चर्चा पूरे देश में हो रही है, वो है जेडीयू का भविष्य क्या होगा ? हालांकि, नीतीश कुमार आज़ भी जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. लेकिन, यह भी सच है कि नीतीश कुमार का स्वास्थ्य और उम्र उनके सक्रिय राजनीति में बधा बन रही है. यही वजह है कि संजय कुमार झा को दल का कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया था. इसका मकसद पार्टी में रोजमर्रा की गतिविधियों के साथ-साथ संसद और बीजेपी नेतृत्व के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करना था.
नीतीश की पार्टी में नेतृत्व संकट
जेडीयू के समक्ष आने वाले दिनों में प्रमुख चुनौती नेतृत्व की होगी. 1990 से लेकर आज़ तक बीजेपी नीतीश पर आश्रित थी. इसका एक कारण बिहार बीजेपी में सशक्त नेतृत्व का अभाव रहा. सुशील मोदी के बाद बीजेपी बिहार में मजबूत नेतृत्व खड़ा करने में विफल रही. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार ने भी सुशील मोदी के बाद किसी बीजेपी नेता को मजबूती से उभरने नहीं दिया. हालांकि, 2020 में नीतीश की इच्छा को दरकिनार करते हुए बीजेपी ने सुशील मोदी की जगह वैश्य समुदाय के ही अन्य नेता तारकेश्वर प्रसाद और अति पिछड़ा समाज से रेणु देवी को उपमुख्यमंत्री बनाया था. हालांकि, यह सरकार मात्र दो साल तक ही चल सकी . 2022 में नीतीश कुमार ने बीजेपी से गठबंधन तोड़कर राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ मिलकर 'महागठबंधन' सरकार बनाई. यह बीजेपी के साथ उनका दूसरा अलगाव था. विदित हो कि नीतीश और बीजेपी का गठबंधन 1996 से शुरू हुआ था. उपरोक्त तथ्य इस बात का प्रमाण हैं कि नीतीश को स्थापित करने में बीजेपी का भी अहम योगदान रहा है. लेकिन बदलते समय के साथ नीतीश कुमार बीजेपी के लिए एक राजनीतिक मजबूरी बन गए. इस परिस्थिति में नीतीश के राजनीतिक रिटायरमेंट के बाद बीजेपी कतई नहीं चाहेगी कि किसी दूसरे नीतीश कुमार का राजनीतिक जन्म हो.नीतीश के बेटे निशांत कुमार को नई सरकार में डिप्टी सीएम नहीं बनाया जाना इस ओर इशारा करता है. हालांकि, राजनीतिक जानकारों का कहना है कि नीतीश और स्वयं निशांत नहीं चाहते थे कि अभी डिप्टी सीएम जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी संभाले. इसी बहाने निशांत ऐसी सरकार से दूरी भी बना के रखना चाहते हैं जो सरकार उनके पिता को मुख्यमंत्री पद से हटा कर बनाई गई है.निशांत को उम्मीद है कि नीतीश की वजह से उपजी सहानुभूति का लाभ उन्हें मिलेगा और वो एक सशक्त नेता के तौर पर उभर कर आएंगे.
नीतीश के बाद जेडीयू में भी नेतृत्व को लेकर काफ़ी असमंजस है. पार्टी और समर्थकों का एक तबका निशांत कुमार को जेडीयू की कमान संभालने के पक्ष में है. इसके विपरीत नीतीश कुमार स्वयं इस विचार से इत्तेफाक नहीं रखते हैं. नीतीश कुमार नहीं चाहते हैं कि अनुभवहीन निशांत के हाथों में पार्टी की बागडोर सौंपी जाए. नीतीश के बाद दूसरे बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह हैं जिनकी उम्र भी नीतीश के बराबर है. वो भूमिहार जाति से आते हैं. जातीय समीकरण के हिसाब से नीतीश का समर्थक तबका उनको कभी अपना नेता स्वीकार नहीं करेगा. कमोबेश यही स्थिति जेडीयू के अन्य सवर्ण नेताओं के साथ है. ऐसी स्थिति में सबकी निगाहें निशांत पर ही टिकी हैं. लेकिन क्या वो अपने पिता की तरह संघर्ष के रास्ते सत्ता हासिल कर पाएंगे? इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छुपा है.
नीतीश कुमार ने करीब दो दशक तक बिहार की सरकार चलाने के बाद सीएम पद की कुर्सी बीजेपी के सम्राट चौधरी को सौंप दी है.
क्या अति पिछड़ा वोटर जेडीयू के साथ बना रहेगा
बीजेपी चाहती थी कि नीतीश यदि अपने बेटे को डिप्टी सीएम बनाते हैं तो वो सम्राट चौधरी की जगह किसी अति पिछड़े नेता को मुख्यमंत्री बनाएगी. लेकिन नीतीश कुमार इसके लिए तैयार नहीं हुए. कारण स्पष्ट था नीतीश किसी भी कीमत पर अति पिछड़ा वोट बैंक बीजेपी को उपहार में नहीं देना चाहते थे. निशांत को सरकार में शामिल न कर नीतीश ने परिवारवाद के आरोपों से भी किनारा कर लिया और अति पिछड़ा समुदाय पर अपना प्रभाव बनाए रखने का राजनीतिक प्रयास भी. नीतीश कुमार जानते हैं कि नेतृत्व के अलावा बीजेपी के पास अतिपिछड़ों को देने के किए कुछ भी नहीं है. दूसरी तरफ़ नीतीश ने पंचायत में आरक्षण और प्रतिनिधित्व दिया है जिसका राजनीतिक लाभ जेडीयू को भविष्य में भी मिलने की उम्मीद है.
महिला और चुप्पा वोटर किधर जाएंगे
नीतीश के बाद महिला मतदाताओं का रुझान किस तरफ़ रहेगा? इसे लेकर भी राजनीतिक पंडितों के बीच बहस छिड़ी हुई है. नीतीश कुमार ने पंचायत में आरक्षण देकर महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण किया. इसके अलावा सरकारी नौकरी में सभी वर्ग के महिलाओं को आरक्षण देकर उनका सामाजिक आर्थिक विकास करने का कार्य किया. नीतीश सरकार ने मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना शुरू की थी.इससे एक करोड़ से अधिक बेटियों की पढ़ाई की राह आसान हुई. प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी से घरेलू हिंसा में कमी आई और इसका सीधा फ़ायदा महिलाओं को मिला. इसके अलावा प्रदेश का एक छोटा तबका जिसे चुप्पा यानी साइलेंट वोटर कहा जाता है, वो नीतीश के नेतृत्व के कारण जेडीयू को वोट करता है. क्या आने वाले दिनों में महिला और साइलेंट मतदाता जेडीयू के साथ रहेंगे? बिहार के अन्य राजनीतिक दल ज़रूर कोशिश करेंगे कि यह वोटर उनसे जुड़े. बीजेपी को उम्मीद है कि संसद और विधानसभा में महिला आरक्षण बिल लाकर यह तबका उससे जुड़ेगा. लेकिन इस बिल का वास्तविक प्रभाव 2029 लोकसभा चुनाव परिणाम में देखने को मिलेगा, क्योंकि यह क़ानून 2029 से लागू होगा.
नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को जेडीयू के भविष्य के रूप में देखा जा रहा है.
जेडीयू का फंडिंग और मैनेजमेंट
लिबरल डेमोक्रेसी में फंडिंग और मैनेजमेंट चुनावी राजनीति का एक अहम हिस्सा बन गया है. भारतीय राज्य के नवउदारवादी झुकाव ने भारतीय लोकतंत्र पर अपनी छाप छोड़नी शुरू कर दी. यह दिवंगत नेता प्रमोद महाजन द्वारा संचालित बीजेपी के 2004 के चुनाव अभियान में 'इंडिया शाइनिंग' और 'भारत उदय' के नारों के साथ स्पष्ट हुआ. इसके बाद हर राजनीतिक दल को चुनाव जीतने के लिए एक कुशल रणितिकार की जरूरत पड़ी. जहां बीजेपी के किए यह काम अरुण जेटली और प्रमोद महाजन ने किया, वहीं जनता दल यूनाइटेड के लिए यह कार्य संजय कुमार झा ने किया. अपने अध्यक्षीय कार्यकाल के दौरान संजय झा ने 2024 का लोकसभा चुनाव और 2025 के विधानभवन चुनाव में पार्टी को जबरदस्त सफलता दिलाई. बीजेपी नीत केंद्र सरकार के साथ बेहतर तालमेल के लिए जाने जाने वाले संजय झा ने बिहार को डबल इंजन की सरकार में विकास की कई योजनाएं दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. नीतीश की लगातार होती कम सक्रियता के बीच जेडीयू को संजय कुमार झा जैसे कुशल रणनीतिकार की ज़रूरत बनी रहेगी.
(डिस्क्लेमर: लेखक बिहार के ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के एचपीएस कॉलेज, मधेपुर में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं. इन्होंने नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज से पीएचडी की है. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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