चार मई 2026 का दिन भारतीय राजनीति के पन्नों में ऐतिहासिक परिणामों के लिए याद किया जाएगा. पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य एक बार फिर अपनी उस परंपरा को दोहरा रहा है, जहां सत्ता का परिवर्तन केवल चेहरों का बदलाव नहीं, बल्कि एक युग का अंत होता है. साल 1977 में वामपंथ का उदय और 2011 में ममता बनर्जी का 'परिवर्तन' इसी पैटर्न के गवाह रहे हैं. राज्य की 293 में से 206 सीटें जीतने वाली बीजेपी के सिर पर सजा जीत का सेहरा सत्ता संरचना में उस तीसरे बड़े बदलाव की परिणति है, जिसकी नींव दशकों पहले रखी गई थी.यह चुनाव परिणाम उन सभी सवालों का अंत करता है और बंगाल की राजनीति के उन मोड़ों का विश्लेषण करता है, जहां मतों और सीटों के बीच के फासले ने इतिहास बदल दिया. यह जीत दर्शाती है कि कैसे बीजेपी के सक्रिय कार्यकर्ताओं की मेहनत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मौन जमीनी कार्य ने बीजेपी को शून्य से शिखर तक पहुंचाया.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'स्थिरता' और 'निर्णायक अंत' दो मुख्य विशेषताएं रही हैं. यहां सत्ता का हस्तांतरण अक्सर उस चुनावी गणित पर निर्भर करता है, जहां वोट शेयर में एक छोटा सा बदलाव सीटों का पहाड़ खड़ा कर देता है. 1977 का चुनाव बंगाल के इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ था. आपातकाल (1975-77) और सिद्धार्थ शंकर रॉय की सरकार के खिलाफ उपजे आक्रोश ने वामपंथी मोर्चे को वह जमीन दी, जिसकी कल्पना खुद वामपंथियों ने नहीं की थी. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो चुनाव से पहले वामपंथियों ने जनता पार्टी को 52 फीसद सीटों की पेशकश की थी, लेकिन समझौता न हो पाने पर वे अकेले लड़े और 231 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया. 1977 में कांग्रेस को 23.02 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन सीटें मिलीं मात्र 20. वहीं सीपीएम को 35.46 फीसदी वोट मिले और सीटें मिलीं 178. यह बंगाल की राजनीति का वह सच है, जहां 10-12 फीसदी मतों का अंतर विपक्षी दल का अस्तित्व मिटा सकता है.
'परिवर्तन' की लहर में 34 साल के शासन का अंत
ज्योति बसु के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य के कार्यकाल में सिंगूर और नंदीग्राम के भूमि अधिग्रहण विवादों ने वामपंथ की ग्रामीण जड़ों को हिला दिया. ममता बनर्जी ने 'माँ, माटी, मानुष' के नारे के साथ 2011 में वह कर दिखाया जो नामुमकिन माना जाता था.साल 2011 में वामपंथी मोर्चे ने हार के बावजूद 41 फीसदी मत प्राप्त किए थे, लेकिन सीटों के मामले में वे 62 पर सिमट गए. वहीं, टीएमसी ने 38.93 फीसदी मतों के साथ अकेले 184 सीटें हासिल कीं. इससे स्पष्ट है कि बंगाल में जब मतदाता सत्ता विरोधी होता है, तो वह समेकित मतदान (Consolidated Voting) के जरिए पूरी व्यवस्था को उलट देता है.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी का यह प्रचंड उभार कोई रातों-रात हुई घटना नहीं है. यह डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के भारतीय जनसंघ की विरासत और पिछले 15 साल के सघन जमीनी कार्य का परिणाम है. कोलकाता में जन्मे डॉक्टर मुखर्जी ने 1951 में जब जनसंघ की स्थापना की, तब उनका उद्देश्य बंगाल को विभाजन के जख्मों से उबारना था. साल 1952 के पहले चुनाव में जनसंघ ने बंगाल से दो लोकसभा सीटें जीती थीं. हालांकि, डॉक्टर मुखर्जी के निधन के बाद पार्टी की जड़ें कमजोर होती चली गईं. साल 1982 में बीजेपी ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और उसे मात्र 0.58 फीसदी वोट मिले. वहीं 1991 के विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए 'लैंडमार्क'साबित हुए. राम जन्मभूमि आंदोलन और बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर पार्टी ने पहली बार 11.34 फीसदी मत प्राप्त किए. इस चुनाव में बीजेपी कोई सीट भले न जीत पाई. लेकिन एक तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित हो गई. साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बंगाल की राजनीति 'द्विध्रुवीय' (TMC बनाम BJP) हो गई. वामपंथ के पतन ने बीजेपी को वह स्पेस दिया, जहां विपक्ष पूरी तरह खाली था.
बीजेपी ने अपने चुनाव अभियान में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार की विफलताओं को मुद्दा बनाया.
आरएसएस का 'साइलेंट' मिशन
बंगाल में बीजेपी की इस विशाल जीत के पीछे आरएसएस का एक दशक लंबा 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' अभियान है. संघ ने बंगाल में माकपा की 'कैडर आधारित पार्टी सोसायटी' को अपनी 'सेवा आधारित नेटवर्क' से सीधी चुनौती दी. कई ऐसे अध्ययन हैं जो बताते हैं कि आरएसएस की शाखाएं बढ़ीं हैं. साल 2011 में बंगाल में करीब एक हजार शाखाएं लगती थीं, जो 2024-25 तक बढ़कर दो हजार से अधिक हो गईं. विद्या भारती' के माध्यम से सरस्वती शिशु मंदिर, जैसे स्कूलों की संख्या भी 100 से बढ़कर 300 से अधिक हुई. इसके अलावा,'एकल विद्यालय' ने उन आदिवासी और सीमावर्ती क्षेत्रों (जंगलमहल और उत्तर बंगाल) में पैठ बनाई, जहां सरकारी सेवाएं कमजोर थीं.
संघ ने 600 से अधिक स्थायी सामाजिक सेवा परियोजनाएं शुरू कीं, जिनमें स्वास्थ्य शिविर और आपदा राहत (जैसे सुंदरबन और उत्तर बंगाल की बाढ़) शामिल हैं. यही नहीं आरएसएस ने बंगाल की 'शाक्त परंपरा' (दुर्गा/काली पूजा) के साथ-साथ 'राम नवमी' और 'हनुमान जयंती' जैसे उत्सवों को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला दिया. साल 2017 में दक्षिण बंगाल में राम नवमी रैलियों में 18 लाख लोगों की भागीदारी संघ की संगठनात्मक शक्ति का प्रमाण थी.
ममता बनर्जी की हार के पांच बड़े कारण क्या हैं
ममता बनर्जी की 15 साल पुरानी सरकार जैसे धराशायी हुई है, वह केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि गहरे सामाजिक संकट का भी परिणाम है. इस चुनाव का सबसे निर्णायक और विवादास्पद मुद्दा विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का रहा है. चुनाव आयोग द्वारा की गई इस प्रक्रिया ने समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया. मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर लगभग 90.83 लाख नाम हटा दिए गए. बीजेपी ने इसे फर्जी मतदाताओं की सफाई के रूप में पेश किया. मतदाताओं की संख्या कम होने के बावजूद राज्य में 92.93 फीसदी का ऐतिहासिक मतदान दर्ज किया गया, जो टीएमसी के खिलाफ एक मूक विद्रोह के रूप में देखा गया.
बीजेपी ने पश्चिम बंगाल की 294 सदस्यों वाली विधानसभा में 206 सीटें अपने नाम की हैं.
टीएमसी के तीसरे कार्यकाल में शिक्षक भर्ती घोटाला उनकी छवि पर सबसे बड़ा धब्बा बना. हाई कोर्ट की ओर से 25 हजार नियुक्तियों को रद्द करना सरकार की साख के लिए घातक साबित हुआ. युवाओं के बीच यह धारणा बनी कि राज्य में सरकारी नौकरियां केवल 'पैसे और पैरवी' से मिलती हैं.
महिलाओं को मौन मतदाता मानकर ममता बनर्जी ने 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाएं शुरू की थीं, लेकिन आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना और कवर-अप के आरोपों ने महिला मतदाताओं को सरकार से दूर कर दिया. सुरक्षा के प्रश्न ने ममता के प्रति अटूट वोट बैंक को दरका दिया. नेतृत्व का संकट भी ममता सरकार की हार का बड़ा कारण है. नंदीग्राम में हार के बाद ममता बनर्जी के लिए भवानीपुर उनका मजबूत किला था, लेकिन 2026 में उन्हें वहां भी हार देखनी पड़ी है. वहां सुवेंदु अधिकारी द्वारा किया गया हिंदू एकीकरण सफल रहा.2021 के बाद बंगाल में वामपंथी और कांग्रेस का वोट बैंक बीजेपी की ओर तेजी से शिफ्ट हुआ है. वामपंथी कार्यकर्ताओं ने टीएमसी के दमन से बचने के लिए बीजेपी को एक सुरक्षा कवच के रूप में चुना.
आरएसएस की सेवा का फल
बंगाल की चुनावी राजनीति में क्षेत्रों का विभाजन अब पूरी तरह बीजेपी के पक्ष में झुक गया है. उत्तर बंगाल में जहां बीजेपी ने क्लीन स्वीप की स्थिति बनाई. उसने 2019 से बने अपने दबदबे को और मजबूत किया है.वहीं जंगलमहल में आदिवासी समुदायों के बीच आरएसएस के सेवा कार्यों ने बीजेपी को बांकुरा, पुरुलिया और झाड़ग्राम में अजेय बना दिया. दक्षिण बंगाल और शहरी कोलकाता यह टीएमसी का अंतिम अभेद्य किला था, लेकिन भ्रष्टाचार और आरजी कर मामले ने कोलकाता के भद्रलोक को भी बीजेपी की ओर धकेल दिया.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली हार के बाद रोती-बिलखतीं तृणमूल कांग्रेस की समर्थक.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी को जो प्रचंड जनादेश मिला है, वह किसी एक चुनावी वादे की जीत नहीं, बल्कि 15 साल की सत्ता विरोधी लहर, संस्थागत भ्रष्टाचार के प्रति आक्रोश और आरएसएस के धैर्यपूर्ण वैचारिक कार्य का महामिलन है. 90 लाख मतदाताओं का नाम हटना और उसके बाद हुआ ध्रुवीकरण ममता बनर्जी के लिए वाटरलू साबित हुआ. बीजेपी का यह उभार सिद्ध करता है कि बंगाल का मतदाता अब क्षेत्रीय पहचान के साथ-साथ राष्ट्रीय विकास और प्रशासनिक पारदर्शिता की आकांक्षाओं की ओर बढ़ रहा है. यह 1977 और 2011 के बाद बंगाल का तीसरा और सबसे बड़ा सत्ता हस्तांतरण है, जो राज्य के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे में गहरे बदलाव लाने वाला है.
(डिस्क्लेमर: लेखक देश की राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं. वो राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














