अमेरिका की सेंट्रल कमान के पूर्व कमांडर और राजदूत रहे जॉन अबीज़ैद ने 2007 में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में भाषण दिया था, "Of course it's about oil. We can't really deny that."
उन्होंने यह बात इराक के संदर्भ में कही थी. अबीजैद ने इस बात को स्वीकार किया था कि इराक की जंग का कनेक्शन तेल से ही था. ईरान के कथित न्यूक्लियर प्रोग्राम पर विवाद से शुरू हुआ युद्ध भी अब तेल-एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर आकर टिक गया है. कभी परमाणु हथियार बनाने का आरोप तो कभी सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य, अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की निगाहें पूरी तरह से ईरान के तेल संसाधनों पर हैं. खबर है कि ईरान पर दबाव डालने के लिए अमेरिका खार्ग द्वीप पर कब्जा करने या उसकी घेराबंदी करने की योजना को मंजूरी देने पर विचार कर रहा है. इसका मकसद ईरान के होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलना है. फिलहाल अमेरिका की तीन अलग-अलग मरीन यूनिटें उस क्षेत्र की ओर रवाना हो चुकी हैं. बताया जा रहा है कि व्हाइट हाउस और पेंटागन जल्द ही और भी सैनिक भेजने पर विचार कर रहे हैं.
'एक्सियोस' नाम की बेवसाइट ने व्हाइट हाउस के अधिकारी के हवाले से खबर दी है कि "अमेरिका चाहता है कि होर्मुज़ खुला रहे. अगर ऐसा करने के लिए उसे द्वीप पर कब्ज़ा करना पड़ा, तो वह होगा. अगर वह तट पर हमला करने का फ़ैसला करता है, तो वह भी होगा. लेकिन अभी तक ऐसा कोई फ़ैसला नहीं लिया गया है." इससे पहले अमेरिकी सेना ने 13 मार्च को खार्ग द्वीप बम बरसाए थे.
ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है खार्ग
खार्ग द्वीप ईरान के तेल उद्योग के लिए महत्वपूर्ण है. ईरान के 90 फीसदी कच्चे तेल का निर्यात इस द्वीप पर बने टर्मिनल से होता है. वहां प्रतिदिन करीब सात मिलियन बैरल तेल लोड करने की क्षमता है. फारस की खाड़ी में होने के कारण, यह तेल टैंकरों के लिए सबसे बड़ा अपतटीय (Offshore) टर्मिनल भी है. इसे ईरान का लाइफलाइन माना जाता है.
तेल पर निर्भर ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए खार्ग द्वीप पर हमले का मतलब उसकी आर्थिक रीढ़ टूटना होगा. हालांकि, इस द्वीप पर हमले का सीधा असर वैश्विक तेल की कीमतों पर पड़ता है. क्योंकि यह चीन-ईरान ऊर्जा संबंधों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है. अमेरिकी प्रशासन को लगता है कि अगर खार्ग द्वीप पर कब्जा कर लेते हैं तो वे दूसरी ओर तेल की आपूर्ति बंद कर देंगे. बावजूद इसके, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि खार्ग के अमेरिका के कब्जे में जाने के बाद ईरान डोनाल्ड ट्रंप की शर्तों पर शांति स्थापित करने के लिए राजी हो जाए.
इराक और अफगानिस्तान से लेकर तमाम उदाहरण मौजूद हैं, जब ट्रंप से पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों के कार्यकाल में भी ग्राउंड ऑपरेशन हुआ है. लेकिन सवाल यह है कि क्या 'Boots on Ground' से इनकार कर चुके ट्रंप खार्ग में जमीनी ऑपरेशन का खतरा मोल लेंगे?
क्या इतना आसान होगा अमेरिका का ऑपरेशन?
हालांकि यह सब कुछ आसान नहीं होगा. खार्ग द्वीप, जो तट से 15 नॉटिकल मील दूर स्थित है. वहां पर कब्जा करने का कोई भी ऑपरेशन काफी जोखिम भरा हो सकता है. अगर इस तरह के ऑपरेशन को मंजूरी मिल जाती है, तो और भी सैनिकों की जरूरत होगी. आशंका जताई जा रही है कि ऑपरेशन शुरू होने के बाद अमेरिकी सैनिक सीधे तौर पर हमले की जद में आ सकते हैं.
आखिर क्या है अमेरिका की रणनीति?
व्हाइट हाउस ने एक्सियोस को बताया है, "हमें हमलों के ज़रिए ईरानियों को और कमज़ोर करने, द्वीप पर कब्ज़ा करने और उसके जरिए बातचीत का दवाब डालने के लिए इस्तेमाल करने में लगभग एक महीने का समय लगेगा."
कुछ ही दिनों में 2500 मरीन भी पहुंचने वाले हैं. व्हाइट हाउस और पेंटागन इसके अलावा और भी अतिरिक्त सैन्य बल भेजने पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है. एक्सियोस से पहले न्यूज़मैक्स और रॉयटर्स भी अतिरिक्त सैन्य बल भेजने की योजनाओं की खबरें दे चुके हैं.
डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.














