बशीर बद्र: बेवफाई को भी इंसानी कमज़ोरी बताने वाला शायर, जो वक़्त की बेरुखी और यादों के साथ चला

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विवेक शुक्ला

ये बात होगी 1995 की. उस दिन राजधानी का तारीखी शंकर-शाद मुशायरा चल रहा था. मॉडर्न स्कूल के सभागार में उर्दू शायरी के शैदाई कुछ खास सुनना चाह रहे थे. मुशायरे में रंग नहीं जम रहा था. तब मुशायरा का संचालन कर रहे नामवर शायर गुलजार देहलवी ने बशीर बद्र को अपने कलाम पढ़ने की दावत दी. गुलजार साहब समझ रहे थे कि बशीर साहब के आने के बाद मुशायरा जम जाएगा. ये ही हुआ. बशीर साहब ने अपने खास अंदाज में अपने कुछ मकबूल शेर पढ़े. उन्होंने  पहला शेर सुनाया, 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए'. इस शेर के पढ़ते ही सभागार गूंजने लगा, बशीर साहब फिर पढ़िए...फिर पढ़ें.

अभी सभागार में कुछ शांति हुई ही थी कि बशीर साहब ने अब अपना मकबूल शेर पढ़ा- 

'दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों...' यह शेर पढ़कर बशीर साहब ने मुशायरा लूट लिया.

एक शायर का जाना

उन्हीं हर दिल अजीज बशीर बद्र साहब का इंतकाल हो गया है. आप कह सकते हैं कि उर्दू अदब का एक चिराग बुझ गया. वे आधुनिक उर्दू शायरी के शिखर पुरुष थे, जिनकी ग़ज़लों ने लाखों दिलों को छुआ. सरल ज़बान, गहरी संवेदना और इंसानी ज़िंदगी की मज़बूरियों को बयान करने का उनका अंदाज़ बेमिसाल था. मशहूर लेखक और मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) हैदराबाद के पूर्व चांसलर फिरोज बख्त अहमद कहते हैं कि बशीर साहब की शायरी में इश्क़ की तड़प हो, ज़िंदगी की उदासी हो या समाज की हक़ीक़त, सब कुछ इतनी आसानी से उतरता था कि आम आदमी भी अपनी कहानी सुन लेता था.

डॉ. बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में हुआ था. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उन्होंने बीए, एमए और पीएचडी की. उन्होंने मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष के रूप में लंबे समय तक सेवा की. लेकिन 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जल गया, उनके अप्रकाशित कलाम राख हो गए. फिर भी उनकी रूह ने हार नहीं मानी. वे भोपाल शिफ्ट हो गए और वहां से भी शायरी की रोशनी बिखेरते रहे. उनकी इकाई, आमद, आहट, इमेज जैसी किताबें उर्दू अदब के खज़ाने हैं. साहित्य अकादमी अवॉर्ड, पद्मश्री और कई उर्दू अकादमियों के सम्मान उन्हें मिले.

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Add image caption hereडॉ. बशीर बद्र (सफेद जैकेट में) का जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में हुआ था.

इश्क़ की तहज़ीब पर टिकी शायरी

बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खूबी उसकी सादगी है. उन्होंने जदीद ग़ज़ल को नई तासीर दी. पुरानी परंपरा की जटिलताओं से दूर, उन्होंने बोलचाल की ज़बान में इतना गहरा असर पैदा किया कि मुशायरों में उनका कलाम सुनकर लोग वाह-वाह
करते रह जाते थे. उनकी शायरी इश्क़ की तहज़ीब पर टिकी है, लेकिन वो इश्क़ महज़ रोमांटिक नहीं, बल्कि इंसानी फितरत का आईना है.

'कुछ तो मजबूरियां रही होंगी 
यूं कोई बेवफा नहीं होता'

इस शेर में उन्होंने बेवफाई को भी इंसानी कमज़ोरी से जोड़ दिया. ग़लत नहीं ठहराया,
बल्कि समझने की कोशिश की. यही उनका हुनर था. दर्द को बयान करना बिना नफरत के, बिना जजमेंट के.

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ग़ज़लों में ज़िंदगी की रफ़्तार

चोटी के कवि और गजलकार दिनेश रघुवंशी ने उनके साथ की बार मंच साझा किया. वे
कहते हैं कि उनकी ग़ज़लों में ज़िंदगी की रफ़्तार, वक़्त की बेरुखी और यादों की अहमियत बार-बार आती है. 'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो' वाला शेर तो आज भी हर उस शख्स की ज़बान पर है, जो गुज़रे वक़्त को संभाल कर रखना चाहता है. यादें उनके लिए रोशनी हैं, जो अंधेरी गलियों में भी साथ देती हैं.

बशीर बद्र ने इश्क़ को नया रूप दिया. उनका इश्क़ न तो फ़रहाद-शिरीं वाला था, न लैला-मजनूं का पारंपरिक. बल्कि आधुनिक इंसान की तन्हाई, बिछड़ने का गम औरमिलने की उम्मीद से भरा हुआ था.

'न जी भर के देखा न कुछ बात की
बस एक आस बाकी रह गई'

जैसे शेर, उनकी ग़ज़लों को अमर बना देते हैं. मुहब्बत में दिखावा नहीं, सच्चाई है. वे कहते हैं कि मुहब्बत में ज़रूरत नहीं, बस एक एहसास का साथ काफी है.

बशीर बद्र का घर मेरठ में 1987 में हुए सांप्रदायिक दंगे में जला दिया गया था, इसके बाद वो भोपाल में बस गए थे.
Photo Credit: Special Arrangement

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फिरोज बख्त अहमद कहते हैं कि उनकी शायरी में समाज की हक़ीक़त भी झलकती है. दंगों का दर्द, इंसानी रिश्तों की नाज़ुकता, दोस्ती-दुश्मनी के बीच का संतुलन सब कुछ उनकी नज़्मों और ग़ज़लों में है.'दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे' वाला शेर तो आज भी सांप्रदायिकता और नफरत के माहौल में मिसाल बनता है. वे इंसानियत के शायर थे. ज़िंदगी ने उन्हें बहुत कुछ लुटाया, लेकिन उम्मीद और इंसान पर यक़ीन नहीं छोड़ा.

घर जलाए जाने के बाद भी किसी से गुस्सा नहीं थे

वहीं मशहूर शायर पापुलर मेरठी को बशीर बद्र के साथ लंबे समय तक एक साथ मुशायरों में पढ़ने का मौका मिला. दोनों मेरठ कॉलेज में पढ़ाते भी थे. अपने पुराने मित्र को याद करते हुए पापुलर मेरठी कहते हैं कि 1987 में मेरठ के शास्त्री नगर में स्थित उनके घर को जला दिया गया था. इसके बावजूद उनके मन में किसी के प्रति गुस्सा नहीं था. मेरठ दंगों में घर जलने के बाद वे भोपाल शिफ्ट हो गए. लेकिन इस घटना ने उनकी शायरी को और गहराई दी. वे कहते हैं कि नफरत इंसान को इंसान नहीं रहने देती. एक शेर में वे नफरत को दफन करने की बात करते हैं-'सात सन्दूकों में भर कर दफ़न कर दो नफ़रतें आज इंसान को मुहब्बत की ज़रूरत है बहुत.' 

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बशीर बद्र की शायरी की एक और खासियत है उसका संगीतमय अंदाज़. कई ग़ज़लें गाई गईं, फिल्मों में इस्तेमाल हुईं. उनकी ज़बान इतनी सहज थी कि आम श्रोता भी महसूस कर लेता था. उन्होंने कहा भी था कि ग़ज़ल से उनका जन्म-जन्म का साथ है.

बशीर साहब ने 'कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज़ का शहर है ज़रा फासले से मिला करो', शेर में आधुनिक शहर की ठंडक, रिश्तों की औपचारिकता और दूरी को बखूबी बयान किया गया है. वे ज़माने के बदलाव को समझते थे और उसे शायरी में ढाल देते थे.

बशीर बद्र के शेरों का खजाना

उनके क़रीब 18 हज़ार शेरों का खज़ाना है. इतनी बड़ी तादाद में भी हर शेर में ताज़गी है. वे कहते थे कि शायरी ज़िंदगी का आईना है. उनकी ग़ज़लें आंसुओं से भीगी हैं, लेकिन उम्मीद की किरण भी दिखाती हैं.

बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को आम लोगों तक पहुंचाया. वे आलोचक भी थे.'आज़ादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला' और 'बीसवीं सदी में ग़ज़ल' जैसी किताबें लिखीं. यानी शायरी के साथ-साथ उन्होंने अदब को समझने और सिखाने का काम भी किया.

उनके इंतकाल से उर्दू अदब का एक युग का अंत हो गया. लेकिन उनकी शायरी ज़िंदा रहेगी. मुशायरों में, ज़ुबानों पर, दिलों में. बशीर बद्र साहब ने साबित किया कि शायर सिर्फ शेर कहने वाला नहीं, बल्कि ज़माने का गवाह होता है. उनकी ग़ज़लें आज भी हमें छूती हैं क्योंकि वे हमारे अपने दर्द, अपनी उम्मीद और अपनी कहानी बयान करती
हैं.

उजाले अपनी यादों के
हमारे साथ रहने दो...

ये शेर अब उनकी याद में और भी गहरा हो गया है. बशीर बद्र साहब, आपकी शायरी अमर है. आपकी रूह को सलाम.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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