भारत की सिविल सेवाएं देश की रीढ़ हैं. हाल ही में घोषित यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2025 के परिणाम ने एक बार फिर साबित किया कि लाखों युवा सपनों को हकीकत में बदलने के लिए कठिन परीक्षा दे रहे हैं. इस परीक्षा में कामयाब अभ्यर्थी जल्द ही आईएएस, आईपीएस, आईएफएस जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं में शामिल होंगे.ये अधिकारी देश की नीतियों को जमीनी स्तर पर लागू करने की जिम्मेदारी संभालेंगे. लेकिन सवाल यह है क्या ये नए अधिकारी वाकई उस आदर्श नौकरशाही का हिस्सा बन पाएंगे, जिसकी कल्पना सरदार पटेल ने की थी? क्योंकि नौकरशाही किसी लोकतंत्र की जान होती है. यदि अधिकारी निष्पक्ष, मेहनती और ईमानदार हों, तो देश तेजी से आगे बढ़ता है. वहीं, यदि भ्रष्टाचार, आलस्य और सत्ता के आगे झुकना उनकी आदत बन जाए, तो राष्ट्र को गहरी क्षति पहुंचती है. यह सत्य सभी जानते हैं, फिर भी आज भी कई चुनौतियां बरकरार हैं.
नए सफल अभ्यर्थियों को बधाइयां तो मिल रही हैं, लेकिन असली परीक्षा तब शुरू होती है, जब वे ट्रेनिंग पूरी कर जिलों या विभागों में तैनात होते हैं. ब्रिटिश काल में आईसीएस अधिकारियों को बनाया गया था ताकि वे ब्रिटिश शासन को मजबूत करें. इसलिए शुरू में अधिकांश पदों पर गोरे अधिकारियों को ही नियुक्त किया जाता था. वे जिले की हर छोटी-बड़ी बात से वाकिफ होते थे—कृषि भूमि के प्रकार, उपजाऊपन, सिंचाई की स्थिति, गांवों की आबादी, सामाजिक-आर्थिक संरचना, नदियां, वर्षा का औसत वगैरह.
ईमानदार अधिकारी
माफ करें, आज कितने अधिकारी अपने जिले या शहर के मोहल्लों तक की सही जानकारी रखते हैं? हालांकि, आजाद भारत में भी कई उत्कृष्ट अधिकारी हुए हैं. जगमोहन, के सुब्रमण्यम ( विदेश मंत्री एस जयशंकर के पिता), एके दामोदरन, एलपी सिंह, टीएन शेषन, जेएन दीक्षित जैसे नाम प्रेरणा स्रोत बने रहे हैं. लेकिन दुर्भाग्य से कुछ अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त भी रहे और काहिल साबित हुए.
एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी—यदि हम अधिकारियों से बेखौफ होकर काम करने की अपेक्षा करते हैं, तो उन्हें सुरक्षित
माहौल और संरक्षण देना भी हमारा कर्तव्य है. ईमानदार अधिकारी अक्सर अवरोधों का सामना करते हैं. उन्हें प्रमोशन से वंचित किया जाता है, बार-बार ट्रांसफर किया जाता है. हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने अपनी ईमानदारी की भारी कीमत चुकाई. उनके 34 साल की सेवा में 57 बार ट्रांसफर हुए. ऐसे कई अधिकारी हैं जिन्हें कड़वी सच्चाई के लिए समाज और सिस्टम दोनों से सजा मिलती है. ठीक कहा गया है—कड़वी दवा और कड़क ईमानदार अधिकारी कम लोगों को पसंद आते हैं. ज्यादातर लोग ऐसे 'बिकने वाले' बाबुओं को तरजीह देते हैं जो उनके इशारे
पर काम करें.
टीएन शेषन के चुनाव सुधार
ईमानदार अफसरों की बात होगी तो टीएन शेषन की याद कैसे नहीं आएगी. यह मानना होगा कि अगर टीएन शेषन भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त न बनते, तो देश में चुनावों के नाम पर धोखाधड़ी और धांधली का आलम जारी ही रहता. उन्होंने 1990 के दशक में चुनाव आयोग के प्रमुख पद पर रहते हुए चुनाव सुधारों को सख्ती से लागू करने का अभियान शुरु किया. शेषन ने उन गुंडा तत्वों पर ऐसी चाबुक चलाई , जिसने धन और बल के सहारे सियासत करने वालों को जमीन पर उतारकर पैदल कर दिया गया था. शेषन ने अपने साथियों में यह विश्वास जगाया कि उन्हें चुनाव की सारी प्रक्रिया को ईमानदारी से अंजाम देना चाहिए. उनसे पहले के कुछ चुनाव आयुक्तों पर आरोप लगते रहते थे कि वे पूरी तरह से सरकार के इशारों पर ही चुनाव करवाते हैं. शेषन ने साबित किया था कि इस सिस्टम में रहते हुए भी बहुत कुछ सकारात्मक किया जा सकता है. वे अपने दफ़्तर में बैठकर काम करने वाले अफ़सर नहीं थे. वे चाहते थे कि चुनाव सुधार करके भारत के लोकतंत्र को मजबूत किया जाए.शेषन ने अपने लिए एक कठिन और कठोर राह को पकड़ा. उन्होंने चुनाव सुधार का ऐतिहासिक कार्य करके विश्व भर में नाम कमाया. उन्होंने देश को जगाने के उद्देश्य से 1994 से 1996 के बीच चुनाव सुधारों पर देश भर में सैंकड़ों जन सभाओं को भी संबोधित किया.
क्या हम सत्येंद्र दुबे और शनमुगम मंजूनाथ की कहानियां भूल गए? सत्येंद्र दुबे ने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, पहले स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के संदर्भ में) में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सीलबंद पत्र लिखा. उन्होंने भ्रष्ट अधिकारियों, इंजीनियरों और ठेकेदारों के गठजोड़ का खुलासा किया. लेकिन इस पत्र के कारण ही 27 नवंबर 2003 को उनकी हत्या कर दी गई.
इसी तरह, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के अधिकारी शनमुगम मंजूनाथ ने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिलेमें एक पेट्रोल पंप पर एडल्टरेटेड ईंधन बेचने की गड़बड़ी पकड़ी. 13 सितंबर 2005 को उन्होंने पंप सील किया. 19 नवंबर 2005 को दोबारा निरीक्षण के दौरान उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई. ऐसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है.
सरदार पटेल की अधिकारियों को सीख
दिल्ली के सिविल लाइंस में स्थित मेटकाफ हाउस भारत की शीर्ष नौकरशाही का प्रतीक है. यहीं 21 अप्रैल 1947 को सरदार पटेल ने स्वतंत्र भारत के पहले बैच के आईएएस-आईपीएस अधिकारियों को संबोधित किया था. उन्होंने कहा था कि अधिकारी जनता के हित में काम करें और किसी भी तरह की कोताही न बरतें. इसी दिन को लोक सेवक दिवस के रूप में मनाया जाता है.साल 1947 से पहले यहीं आईसीएस परीक्षाएं होती थीं और 1958 तक ट्रेनिंग भी. बाद में ट्रेनिंग मसूरी में शुरू हुई.
क्या आज सभी अधिकारी सरदार पटेल के बताए मार्ग पर चल रहे हैं? दुर्भाग्य से कई अधिकारी जिलों में तैनात होने पर जनता से दूर हो जाते हैं. वे महलनुमा बंगलों में रहते हैं और आम जनता से उनका कोई सरोकार नहीं रहता. सरकार को चाहिए कि ऐसे अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो जो अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं करते. भ्रष्टाचार सिद्ध होने पर कठोर दंड दिया जाए.कई अधिकारी जीवन भर 'मलाईदार' पोस्टिंग के चक्कर में नेताओं-मंत्रियों के आगे सिर झुकाते हैं.यह सब बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए.तभी सच्चे लोक सेवक अपने कर्तव्य निभा पाएंगे और देश सही दिशा में आगे बढ़ेगा.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














