संसद में पेश केंद्रीय बजट केवल एक वार्षिक वित्तीय दस्तावेज़ नहीं, बल्कि अपने आप में ऐतिहासिक महत्व रखता है. यह बजट ऐसे समय में पेश किया गया है, जब भारत एक ओर वैश्विक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और धीमी होती अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के दबावों से जूझ रहा है, तो दूसरी ओर दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति को सुदृढ़ कर रहा है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लगातार नौवीं बार बजट प्रस्तुत किया जाना भी इसे ऐतिहासिक बनाता है. यह भारतीय संसदीय इतिहास की एक दुर्लभ उपलब्धि है. इस निरंतरता ने आर्थिक नीति में स्थिरता और दीर्घकालिक दृष्टि का संकेत दिया है, जिसमें एक ओर बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और निवेश को प्रोत्साहन दिया गया है, वहीं दूसरी ओर गरीब, किसान, महिला, युवा और मध्यम वर्ग को राहत देने की कोशिश भी दिखती है. सरकार का यह रुख स्पष्ट करता है कि वह समावेशी विकास को केवल नारा नहीं, बल्कि नीति का आधार बनाना चाहती है. ऐसे संदर्भ में पेश हुआ यह बजट केवल वर्तमान वित्तीय वर्ष की प्राथमिकताओं को नहीं, बल्कि आने वाले दशक में भारत की आर्थिक दिशा, विकास मॉडल और नीति-दृष्टि को भी परिभाषित करने का प्रयास करता है. इस वर्ष का केंद्रीय बजट ऐसे समय में पेश किया गया, जब भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता, तकनीकी बदलाव और घरेलू स्तर पर रोजगार,महंगाई और समावेशी विकास की चुनौतियों से एक साथ घिरी हुई है. सरकार ने वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हुए पूंजीगत व्यय और राज्यों को संसाधन हस्तांतरण पर विशेष बल दिया है. प्रश्न यह है कि क्या यह बजट भारत की वर्तमान आर्थिक अवस्था की जरूरतों को पूरी तरह संबोधित कर पाता है या फिर कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपेक्षाएं अधूरी रह जाती हैं.
साल 2024-25 और 2025-26 के बजटों की निरंतरता और तुलना में देखा जाए, तो यह बजट विकासोन्मुख तो है,परंतु कुछ बुनियादी प्रश्नों को अधूरा छोड़ता हुआ भी प्रतीत होता है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने अपेक्षाकृत स्थिर आर्थिक वृद्धि दर्ज की, जबकि 2025-26 में वैश्विक मंदी के संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और निर्यात दबावों के बावजूद घरेलू मांग ने अर्थव्यवस्था को सहारा दिया. ऐसे में 2026-27 का बजट सरकार के लिए न केवल विकास को गति देने का, बल्कि उसे अधिक समावेशी और रोजगारोन्मुख बनाने का एक अवसर था.
राजकोषीय परिदृश्य: संतुलन की कोशिश
सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राजकोषीय घाटा लगातार कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं. वर्ष 2024-25 में कुल व्यय ₹46.52 लाख करोड़ रहा, जो 2025-26 के संशोधित अनुमान में बढ़कर ₹49.64 लाख करोड़ हुआ. इसके मुकाबले 2026-27 के बजट अनुमान में कुल व्यय ₹53.47 लाख करोड़ आंका गया है, जो स्पष्ट रूप से विस्तारवादी रुख को दर्शाता है. राजस्व प्राप्तियां 2026–27 में बढ़कर ₹35.33 लाख करोड़ होने का अनुमान है, जबकि 2025–26 में यह लगभग ₹33.42 लाख करोड़ थी. कर राजस्व में आयकर और निगम कर की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती दिखती है, जो औपचारिक अर्थव्यवस्था के विस्तार का संकेत है. राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.8 फीसदी (2024-25) से घटकर 2025-26 में 4.4 फीसदी था. इसके वित्त वर्ष 2026-27 में 4.3 फीसदी रहने का अनुमान है, जो दीर्घकालीन वित्तीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) लक्ष्यों के अनुरूप है. यह संकेत देता है कि सरकार विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन साधने का प्रयास कर रही है. हालांकि, ब्याज भुगतान अब भी कुल व्यय का बड़ा हिस्सा (2026–27 में ₹14.04 लाख करोड़) बना हुआ है, जो यह दर्शाता है कि सार्वजनिक ऋण एक दीर्घकालिक चुनौती बना रहेगा.
विकास की धुरी: पूंजीगत व्यय
बजट 2026-27 में कुल प्रभावी पूंजीगत व्यय ₹17.14 लाख करोड़ रखा गया है. यह 2024-25 की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है. 2024–25 में पूंजीगत व्यय लगभग ₹10 लाख करोड़ के आसपास था, जो 2025–26 में बढ़कर ₹11 लाख करोड़ से अधिक हुआ, और वर्तमान बजट वर्ष में पूंजीगत व्यय ₹12.21 लाख करोड़ ले जाने का प्रस्ताव है. रेलवे, सड़क, शहरी अवसंरचना, ऊर्जा तथा रक्षा से जुड़ी परियोजनाओं में बढ़ा हुआ आवंटन यह दर्शाता है कि सरकार दीर्घकालीन उत्पादक क्षमता के निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर रही है. रेलवे के लिए नई लाइनों, दोहरीकरण, रोलिंग स्टॉक और ट्रैक नवीकरण में निरंतर वृद्धि यह संकेत देती है कि लॉजिस्टिक्स लागत घटाने और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी मजबूत करने को प्राथमिकता दी गई है. यह कदम उद्योग और निर्यात दोनों के लिए सकारात्मक माना जा सकता है.
इस बजट में बायोफार्मा के लिए 10 हजार करोड़ रुपये से एक अभियान चलाने की घोषणा की गई है.
पिछले तीन सालों की तुलना में पूंजीगत व्यय में सबसे अधिक जोर दिखाई देता है. यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सरकार अल्पकालिक खपत को बढ़ाने के बजाय सड़क,रेलवे, शहरी अवसंरचना, ऊर्जा और डिजिटल ढांचे जैसे क्षेत्रों में निवेश कर दीर्घकालिक उत्पादक क्षमता को मजबूत करना चाहती है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार, पूंजीगत व्यय का बहुगुणक प्रभाव अधिक होता है और इससे रोजगार सृजन भी अपेक्षाकृत टिकाऊ होता है.
कर राजस्व और प्राप्तियां
2026–27 में सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियां लगभग ₹35 लाख करोड़ रहने का अनुमान है. इसमें कर राजस्व का हिस्सा सबसे बड़ा है. आयकर और कॉर्पोरेट कर से होने वाली आय में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है, जो औपचारिक अर्थव्यवस्था के विस्तार का संकेत देती है. वस्तु एवं सेवा कर (GST) से भी स्थिर और मध्यम वृद्धि की उम्मीद की गई है. हालांकि, यह भी सच है कि भारत का कर-से-GDP अनुपात अभी भी कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कम है. ऐसे में कर आधार के विस्तार, अनुपालन में सरलता और कर प्रशासन में तकनीकी सुधारों की आवश्यकता बनी रहती है. बजट में इस दिशा में बड़े संरचनात्मक सुधार अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देते हैं. सहकारी संघवाद के दृष्टिकोण से देखा जाए तो पिछले तीन सालों में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को मिलने वाले संसाधनों में लगातार वृद्धि हुई है. 2026–27 में कुल अंतरण ₹25 लाख करोड़ से अधिक रहने का अनुमान है, जो 2024–25 की तुलना में काफ़ी अधिक है. इसमें करों का हिस्सा, वित्त आयोग के अनुदान और केंद्र प्रायोजित योजनाएं शामिल हैं. यह प्रवृत्ति सहकारी संघवाद को मजबूत करती है और राज्यों को अपनी विकास प्राथमिकताओं के अनुसार खर्च करने की अधिक स्वतंत्रता देती है. खासकर बुनियादी सेवाओं और सामाजिक क्षेत्रों में राज्यों की भूमिका को देखते हुए यह एक सकारात्मक संकेत है.
केंद्रीय बजट 2026–27 में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के लिए ₹1.62 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो 2025–26 के ₹1.52 लाख करोड़ से अधिक है. यह वृद्धि यह दर्शाती है कि सरकार कृषि क्षेत्र को स्थिर रखने का प्रयास कर रही है, लेकिन किसानों की बढ़ती लागत और जलवायु जोखिमों की तुलना में यह बढ़ोतरी सीमित प्रतीत होती है. इसके विपरीत, ग्रामीण विकास के लिए आवंटन ₹2.13 लाख करोड़ से बढ़कर ₹2.73 लाख करोड़ हो गया है, जो ग्रामीण रोजगार, आवास और बुनियादी सेवाओं को लेकर सरकार की प्राथमिकता को रेखांकित करता है.
शिक्षा और कौशल विकास पर जोर
शिक्षा क्षेत्र में आवंटन ₹1.22 लाख करोड़ से बढ़कर ₹1.39 लाख करोड़ हो गया है, जिससे राष्ट्रीय शिक्षा नीति और कौशल विकास कार्यक्रमों को गति मिलने की संभावना है. इसी प्रकार, स्वास्थ्य क्षेत्र में बजट ₹94,625 करोड़ से बढ़कर ₹1.04 लाख करोड़ हो गया है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना को मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक संकेत है, हालांकि यह अभी भी अपेक्षित स्तर से कम है. वहीं स्वास्थ्य क्षेत्र में 2026–27 के लिए ₹1,04,599 करोड़ का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष से अधिक है. इससे प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, आयुष्मान भारत योजना और स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी, किंतु सार्वभौमिक और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा के लक्ष्य को देखते हुए इसमें और निवेश की आवश्यकता बनी रहती है.
रक्षा बजट 2025–26 के ₹5.68 लाख करोड़ से बढ़कर ₹5.94 लाख करोड़ हो गया है, जो आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन पर सरकार के निरंतर प्रयासों को दर्शाता है. ऊर्जा क्षेत्र में सबसे तेज़ बढ़ोतरी देखने को मिली है चुकी ऊर्जा के विकास के लिए पिछले वित्त-वर्ष की तुलना में आवंटन ₹86,471 करोड़ से बढ़कर ₹1.09 लाख करोड़ हो गया है जो हरित ऊर्जा और ऊर्जा संक्रमण को प्राथमिकता देने का स्पष्ट संकेत है. जबकि वाणिज्य एवं उद्योग और आईटी–दूरसंचार के लिए बढ़ा हुआ आवंटन विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और निवेश वातावरण को मजबूत करने की दिशा में है. वाणिज्य और उद्योग के लिए बजट ₹52,324 करोड़ से बढ़कर ₹70,296 करोड़ और आईटी और दूरसंचार के लिए ₹53,946 करोड़ से बढ़कर ₹74,560 करोड़ हो गया है, जो विनिर्माण और डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में है. वहीं, विज्ञान एवं अनुसंधान के लिए आवंटन ₹37,014 करोड़ से बढ़कर ₹55,756 करोड़ हो गया है. नवाचार आधारित विकास की दिशा में एक स्वागतयोग्य कदम है. इससे अनुसंधान, नवाचार, अंतरिक्ष, जैव-प्रौद्योगिकी और उभरती तकनीकों को बढ़ावा मिलेगा, हालांकि भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनाने के लिए शोध और विकास (R&D) में और आक्रामक निवेश की आवश्यकता है. परिवहन, मेट्रो और अन्य अवसंरचना परियोजनाओं पर बढ़ता खर्च विकास का इंजन बना हुआ है, हालांकि, ब्याज भुगतान ₹14 लाख करोड़ से अधिक बने रहना यह दर्शाता है कि बढ़ते सार्वजनिक ऋण के कारण सरकार की वित्तीय गुंजाइश अभी भी सीमित है.
समग्र रूप से, यह बजट पिछले साल की तुलना में निवेश और अवसंरचना उन्मुख दिखाई देता है. यह बजट कृषि, ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा और R&D पर स्पष्ट जोर दिखाता है. पूंजीगत व्यय और राज्यों को अंतरण से विकासात्मक गुणक (मल्टीप्लायर) बढ़ने की संभावना है. वर्तमान बजट की रुपरेखा से राष्ट्रीय शिक्षा नीति और प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे को बल तो मिलेगा, लेकिन जीडीपी के अनुपात में इन क्षेत्रों पर सार्वजनिक व्यय अब भी अपेक्षित स्तर से कम है. कुल मिलाकर, बजट 2026–27 को एक संतुलित और निवेश-प्रधान बजट कहा जा सकता है, जिसमें पूंजीगत व्यय, अवसंरचना और राजकोषीय अनुशासन पर स्पष्ट जोर है. मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में यह बजट जोखिम लेने के बजाय स्थिरता को प्राथमिकता देता है. प्रश्न यही है कि क्या यह सावधानी भारत को तेज, समावेशी और रोजगारोन्मुख विकास के अगले चरण तक ले जाने के लिए पर्याप्त होगी या आने वाले वर्षों में और साहसिक आर्थिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ेगी.
डिस्क्लेमर: लेखक ओडिशा के भुबनेश्वर स्थित कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विपणन पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.














