उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से करीब 255 किलोमीटर दूर स्थित है त्रियुगी नारायण गांव. यह गांव त्रियुगी नारायण मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. श्री केदारनाथ जी आने वाले यात्री सोनप्रयाग से होकर करीब 13 किलोमीटर की दूरी तय कर त्रियुगी नारायण पहुंचते हैं. रुद्रप्रयाग जिले की ऊखीमठ तहसील में समुद्र तल से करीब 1,980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव पौराणिक मान्यताओं, धार्मिक आस्था और हिमालयी संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है.ऐसी मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. त्रियुगी नारायण मंदिर परिसर में जल रही अखंड धूनी को उसी विवाह की अग्नि माना जाता है. हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं, लेकिन बढ़ता धार्मिक पर्यटन और बदलता मौसम अब गांव के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर रहा है.
आधी भी नहीं रह गई है बर्फबारी
मंदिर के तीर्थ पुरोहित कैलाश चंद्र गैरोला के अनुसार लगभग तीन हजार की आबादी वाले त्रियुगी नारायण गांव का मौसम पिछले चार-पांच सालों में काफी बदल गया है. कभी दिसंबर, जनवरी और फरवरी में यहां पांच छह फीट तक बर्फ गिरती थी. इस वजह से लोग अपने घरों से बाहर तक नहीं निकल पाते थे. अब हालात यह हैं कि इस साल फरवरी में मुश्किल से एक से डेढ़ फीट बर्फ ही गिरी. उनका मानना है कि मौसम का चक्र तेजी से बदल रहा है. जून जैसी गर्मी अब मई में ही महसूस होने लगी है.
गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर तोषी क्षेत्र में कभी-कभी भूस्खलन होता रहता है. वहां सड़क के पास एक जगह पानी के स्रोत से निकलकर जमा हो रहा पानी लगातार बढ़ रहा है. स्थानीय लोगों के अनुसार सड़क निर्माण के दौरान उस जगह पर मिट्टी डाल दी गई है, लेकिन गांव वाले इसे भविष्य के खतरे के रूप में देख रहे हैं.
राजमा और आलू तक सिमटी खेती
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) से जुड़े वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के अनुसार गंगोत्री क्षेत्र में गर्मियों के दौरान ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ जाती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये कण हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की एक बड़ी वजह बन रहे हैं.
कैलाश चंद्र गैरोला बताते हैं कि गांव की खेती भी पहले जैसी नहीं रही. कभी यहां कई तरह की फसलें होती थीं, लेकिन अब गांव मुख्य रूप से आलू और राजमा तक सिमट गया है. हालांकि गांव के आसपास जंगलों में आग की घटनाएं अपेक्षाकृत कम हैं और पानी के स्रोत अभी भी ठीक ठाक स्थिति में माने जाते हैं.त्रियुगी नारायण में पलायन भी बहुत कम देखने को मिलता है. गांव के अधिकांश परिवार मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक कार्यों पर निर्भर हैं. तीर्थ यात्रियों की आवाजाही यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बन चुकी है.
त्रियुगी नारायण गांव की एक सड़क के किनारे लगा कूड़े का अंबार.
Photo Credit: Himanshu Joshi
कूड़ा छोड़कर जाते पर्यटक
उत्तराखंड पर्यटन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक चारधाम यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. 2024 में चारधाम यात्रा में 45 लाख से अधिक यात्री पहुंचे थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर करीब 51 लाख तक पहुंच गई. अकेले केदारनाथ धाम में 2025 में 16 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किए. केदारनाथ मार्ग से जुड़े त्रियुगी नारायण जैसे छोटे हिमालयी गांवों पर भी बढ़ते धार्मिक पर्यटन का सीधा दबाव पड़ रहा है.
गांव के लोगों को लगता है कि सोशल मीडिया ने त्रियुगी नारायण को नई पहचान दी है. पिछले कुछ सालों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं, लेकिन इसके साथ समस्याएं भी आ रही हैं. गांव के आसपास गंदगी और बदबू की शिकायत अब आम होती जा रही है. कई जगह कूड़ा जमा रहता है.स्थानीय निवासियों के मुताबिक साफ-सफाई की व्यवस्था सीमित है. जिला पंचायत की तरफ 15-20 दिन में सफाई के लिए कर्मचारी आते हैं, लेकिन लगातार बढ़ती भीड़ के सामने यह व्यवस्था काफी नहीं पड़ती है.
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)













