फिजां में हर ओर धुरंधर का शोर है. पिछले कई सालों के दौरान लगे राष्ट्रवाद के तड़के के बीच बॉक्स-ऑफिस पर धुरंधर की 'धुरंधरता'' बॉलीवुड वास्तविक सिनेमा' को एक नया स्तर प्रदान करती दिखती है. लेकिन अभी भी पर्दे पर यह साल 2019 में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई महान इस्रायली जासूस ओली कोहेन के जीवन पर बनी 'द स्पाई' से मीलों दूर दिखाई पड़ती है. वास्तव में रियलिज्म के रोमांच को सरलता से परोसने में कुछ साल पहले आई राजी फिल्म रणबीर सिंह और अक्षय खन्ना के स्टारडम पर सवार धुरंधर से कहीं आगे है. राजी भी 18 साल की भारतीय जासूस सहमत (नेवी ऑफिसर हरिंदर सिक्का की लिखी किताब-"कॉलिंग सहमत") के जीवन पर बनी थी. इस मूवी ने बिना ज्यादा खून-खराबे, नाटकीय मारधाड़ के खुफिया दुनिया (R&AW) के तौर-तरीकों को शानदार अंदाज में पेश किया था. बहरहाल, देश के अलग-अलग कालखंड में घटित अलग घटनाओं,' बॉलीवुड हीरोइज्म' के बूते बॉक्स-ऑफिस पर नए रिकॉर्ड पर सवार धुरंधर कई सच और बड़े सवालों को पीछे छोड़ गई. क्या इन बड़े सवालों पर चर्चा हुई? पोडकास्ट की भीड़ में कोई पोडकास्ट (प्रतिशत)? मतलब क्या मंत्री और उनके बेटे वाली घटना सच थी? अगर थी, तो यह चुप्पी, खामोशी क्यों (समाज भी)?
करीब दो साल पहले बॉबी देओल को लॉर्ड बना चुका सोशल मीडिया अब अक्षय खन्ना को लॉर्ड बनाने पर तुला है, तो कोई बहरीन के रैप सॉन्ग का एक शब्द भी समझ न आने के बावजूद इस पर कदम-ताल करते हुए रील बना रहा है. मानो हर वर्ग के बीच एक होड़ सी लगी हुई है, तो वहीं तमाम विद्वान अपने-अपने मन के नैरेटिव (कथन, व्याख्यान) गढ़ रहे हैं. कोई विद्वान (?) पड़ोसी देश की आतंकी हरकतों को छिपाने या क्लीन चिट देने में जुटा है, तो कोई एक वर्ग को बदनाम करने की साजिश बता रहा है! आखिरकार यह कैसी सोच है? ये लोग कौन हैं? लेकिन लगाए जा रहे तमाम इन अलग-अलग 'सुरों' के बीच सत्य भी किसी कोने में खड़ा है. ठीक करीब डेढ़ दशक पहले क्रिकेट के मैदान से लंबे-लंबे हवाई छक्कों से निकले सच की तरह, जो जस्टिस मुदगल कमेटी रिपोर्ट के रूप में सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट में जमा है. ठीक वैसा ही कुछ साल पहले 'पनामा पेपर्स' का सच जो बुलंद "आंय" की आवाज के तले आगे बढ़ने से पहले ही दम तोड़ देता है!
कुल मिलाकर भारतीय समाज की मनोदशा अभी भी कड़वे सच को स्वीकारने की नहीं ही बन सकी है. शायद यही वजह है कि धुरंधर के तथ्य (अगर ये सही है) के बावजूद मीडिया सहित तमाम मंचों पर शायद ही यह सवाल या बहस होती दिखाई पड़ी कि वह मंत्री और उसका बेटा कौन था, जिसने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को नोट छापने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्लेट उपलब्ध कराईं? अगर यह सच है, तो क्या इसे सहजता से बच कर जाने दिया जा सकता है? एक सही फैसले पर किसी जज के खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है, तो पूर्व मंत्री से सवाल-जवाब क्यों नहीं हो सकता? क्या इस तरह की घटना अपना में आप में देशद्रोह नहीं है? देश के साथ इतने बड़े छल को कैसे किसी बाउंसर की तरह डक किया जा सकता है? अगर रणबीर सिंह की लंबी जु्ल्फों, मांसल शरीर वाला पर्दे का हीरो और अक्षय खन्ना का उम्दा अभिनय इस सच (अगर यह है) को दबाने में सफल रहता है, या समाज की मनोदशा, चेतना को झकझोरने में नाकाम रहता है, तो अलग-अलग बातों में दिखने वाला राष्ट्रवाद भी खोखला सरीखा ही है, तो यह बताता भी है समाज बौद्धिक रूप से कहां खड़ा है.
क्या कहीं कोई सड़क पर आम जनता का विरोध प्रदर्शन दिखाई पड़ा? क्या ऐसी चर्चा होती दिखाई पड़ी कि जब एक सरकार ने ऑपरेशन धुरंधर चलाने को हरी झंडी दिखा दी थी, तो अगले दस साल इस पर काम क्यों नहीं हुआ? क्या इसे इरादतन रोका गया? क्यों समाज या इसके एक बड़े या बड़े बुद्धिजीवी वर्ग में इस तरह की घटनाओं को लेकर गुस्सा नहीं ही दिखाई पड़ा? कौन जानता है कि ऑपरेशन सही समय पर अपना काम करता, तो साल 2008 में मुंबई आतंकी हमले जैसी घटना नहीं ही होती? इतना बड़ा होने के बावजूद यही समाज अक्षय कुमार को लॉर्ड बनाने और बहरीन के रैप पर रील्स बनाने में व्यस्त है. मानो पर्दे का आनंद, मस्ती ही सबकुछ है. हम कहां खड़े हैं? क्या सब कुछ सरकार भरोसे छोड़ा जा सकता है? समाज की कुछ जिम्मेदारी है, या नहीं है?
'वास्तविक धुरंधरों' की सूची करीब 1960 के दशक में रवींद्र कौशिक से लेकर आज तक बहुत ही लंबी है.जयपुर के रवींद्र कौशिक सिर्फ 25 साल की उम्र में पाकिस्तान सेना में मेजर बन गए थे और उन्होंने ऐसी-ऐसी जानकारी भारत को दीं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ब्लैक डायमंड का नाम दिया था. कुछ पल रुकिए...ठहरिए... अब धुरंधर मूवी में एक पकड़े गए एक भारतीय जासूस का टॉर्चर किए जाने के सीन को याद कीजिए. आप सोचिए साठ के दशक में रवींद्र कौशिक का जो हश्र पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) या उसकी सेना ने किया होगा, यह दृश्य उसका दस फीसद भी नहीं है. तब से लेकर आज तक अनगिनत हजारों रॉ एजेंटों ने किसी उम्मीद के दुश्मन की धरती पर अपने परिवार, पहचान, रिश्ते-नाते सब कुछ गंवाकर तन्हाइयों और पल-पल मौत के रास्ते को गले लगाया, लेकिन इन्हें बदले में मिला क्या? या इन्हें मिलता क्या है?असल धुरंधर अपना खामोशी से अपना काम करते रहे,कर रहे हैं और देश दशकों से पर्दे के धुरंधरों की कहानियों में खुद की कल्पना कर गर्वीला होता रहा, या लंबे-लंबे छक्को का लुत्फ उठाता रहा.
हाल ही में भारत दौरे पर आए महान फुटबॉलर लियोनेल मेसी को देखने के लिए 15 हजार रुपये के टिकट, फोटो खिंचवाने के लिए दस लाख रुपये और हर महीने किसी वास्तविक धुरंधर के लिए 30-50 रुपये सैलरी से देने या यह कर्तव्य निभाने के बीच जमीन-आसमान के बीच से भी कही ज्यादा दूरी का अंतर है!हो सकता है कि मेसी, किसी बॉलीवुड स्टार या क्रिकेट के प्रति ऐसी दीवानगी एक बार सही हो, लेकिन सवाल यही है कि गली-गली, नुक्कड़-नुक्कड़ किसी कुकुरमुत्ते की तरह 'युवा नेताओं' की बढ़ती भीड़ का दृष्टिकोण क्या है? यह समाज और देश को किस ओर ले जा रहा है? कुछ साल पहले बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने सरकार के साथ मिलकर महीने में कम से कम तीस रुपये सेना के लिए देने की अपील की थी. इसका आगाज भी हुआ था, लेकिन आज यह अभियान कहां खड़ा है, किसी को कुछ नहीं मालूम? क्या यह अभियान वर्तमान में 'जिंदा'भी है? क्या कुछ ऐसा ही अभियान 'असल धुरंधरों' के लिए शुरू नहीं किया जा सकता?
सिनेमा संदेश ही दे सकता है, इसे ग्रहण करना, आत्मसात करना समाज के ऊपर है! ISI करीब 77 साल पहले अपनी स्थापना (1 जनवरी, 1948) के बाद से ही भारत के खिलाफ 'अलग-अलग तरह के युद्ध' छेड़े हुए है. ऐसे-ऐसे युद्ध, जिनकी आप एक बार को कल्पना भी नहीं कर सकते. फिर चाहे पंजाब के बड़े हिस्से को हेरोइन/चरस में 'डुबोना' हो या फिर पंजाब में "गन सॉन्ग" (यह अलग तरह का हथियार है) संस्कृति से एक पीढ़ी का सत्यनाश करने की साजिश हो, या फिर देश के अलग-अलग हिस्सों में फैले हजारों 'स्लीपर-सेल हों या फिर 'हनी ट्रैप तंत्र'. ऐसे ही अनगित खेलों में आईएसआई के कर्नल/मेजर/ब्रिगेडियर 24 गुणा 7 ड्यूटी पर लगे हैं. पड़ोसी खुफिया एजेंसी का फिलहाल एजेंडा बांग्लादेश में शरीयत कानून लागू कर इसे दूसरा पाकिस्तान बनाने का है! इसमें कुछ और देशों की भी एजेंसियां शामिल हैं. विश्वास कीजिए, आप कई पहलुओं से युद्ध में हैं! पर्दे के आनंद और तीन घंटे कॉफी/पॉपकॉर्न के आनंद से बाहर निकलकर बॉलीवुड नायकों में छिपे "असल हीरो", उनके त्याग, पीड़ा को शिद्दत से महसूस कीजिए. अगर कहीं 26 रुपये की थैली का दूध चढ़ा रहे हैं, भंडारा करा रहे हैं, तो उसका एक हिस्सा इन नायकों को समर्पित कीजिए! ये हैं, तो पर्दे के हीरो हैं, ये हैं, तो आप आनंद उठा रहे हैं, मुदगल कमेटी की रिपोर्ट में बंद हीरो (?) के चौकों-छ्क्कों का लुत्फ ले रहे हैं. ये ही रियल धुरंधर हैं! इन्हें, इनके त्याग, साधना को महसूस कीजिए.
(मनीष शर्मा ndtv.in में डिप्टी न्यूज़ एडिटर हैं...)
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