ईरान Vs अमेरिका-इजरायल युद्ध और वर्ल्ड वॉर 2 काल में क्या समानताएं हैं?

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प्रियदर्शन

क्या डोनाल्ड ट्रंप की तुलना एडॉल्फ़ हिटलर से की जा सकती है? निस्संदेह ऐतिहासिक तथ्यों के लिहाज से यह बहुत अतिरेकी तुलना लग सकती है, ट्रंप भी उस नस्ली घृणा और आत्ममोह से ग्रस्त और संचालित दिखाई पड़ते हैं जिससे हिटलर ग्रस्त था. ट्रंप ने श्वेत श्रेष्ठता के भाव को कभी छुपाया नहीं तो हिटलर ने आर्य श्रेष्ठता का दंभ दिखाते हुए यहूदियों के बर्बर सफाये की ऐसी मुहिम चलाई जिसकी चीख, कालिख और जिसके अपराध-बोध से दुनिया अब तक मुक्त नहीं हो पाई है.

यह सच है कि आज का अमेरिका बीती सदी के चौथे दशक का जर्मनी नहीं है. ट्रंप इस अमेरिका में बहुत सारी छूट ले सकते हैं लेकिन शायद वे ऐसे गैस चैंबर नहीं बनवा सकते जिनमें लोगों को भर कर मारा जा सके. मगर उन्होंने अपनी ज़िद और सनक में तेहरान को एक गैस चैंबर में ज़रूर बदल दिया है. इज़रायली और अमेरिकी बमबारी में तबाह हुए ईरान के तेल कुओं में लगी आग ने पहले आसमान काला कर दिया और फिर तेज़ाबी बारिश करवा दी.

अमेरिका-इजरायल और ईरान में युद्ध क्यों हो रहा है

लेकिन यह युद्ध हुआ क्यों? दरअसल यही वह प्रश्न है जो ट्रंप और हिटलर की तुलना करने को, दूसरे विश्वयुद्ध की स्मृति ताज़ा करने को मजबूर करता है. दूसरे विश्वयुद्ध के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल ने विश्वयुद्ध पर छह खंडों में लिखी अपनी किताब 'द गैदरिंग स्टॉर्म' की भूमिका में एक दिलचस्प बात लिखी है. उनसे अमेरिकी राष्ट्रपति रूज़वेल्ट ने पूछा कि इस युद्ध को क्या कहना चाहिए. चर्चिल ने कहा कि ये एक ग़ैरज़रूरी युद्ध था. इसे रोकना किसी भी दूसरे युद्ध को रोकने से ज़्यादा आसान था. हालांकि बरसों बाद पैट्रिक बुकानन ने अपनी किताब 'चर्चिल, हिटलर ऐंड अननेसेसरी वार' में लिखा कि चर्चिल ने आधा सच कहा, पूरा सच यह है कि चर्चिल ने एक के बाद एक भूलें कीं जिनकी वजह से यह युद्ध बड़ा होता चला गया.

क्या बीते कुछ सालों में हम जिन युद्धों के साक्षी बन रहे हैं, वे सब इसी तरह लड़े जा रहे गैरज़रूरी युद्ध नहीं हैं जिनकी वजह से दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर आ खड़ी हुई है? क्या रूस और यूक्रेन का युद्ध टाला नहीं जा सकता था? क्या हमास के भयावह आतंकी हमले के बाद इज़रायल ने गाज़ा पट्टी को पूरी तरह ज़मींदोज़ करने की जो कार्रवाई की, उसे कुछ पहले रोकना उचित नहीं होता? और क्या ख़ुद हमास ने इज़रायल और अरबों के बीच चल रही और लगभग एक समझौते तक पहुंचती बातचीत को पटरी से उतारने के लिए यह हमला नहीं किया था? शुक्र है कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसी स्थिति दो-तीन दिन बाद ही स्थगित हो गई, लेकिन यह संयम बाक़ी मामलों में दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहा. अमेरिका-इज़रायल के हमलों से घायल ईरान की रणनीति युद्ध को अधिकतम फैलाने की है. उसने पश्चिम एशिया के उन तमाम मुल्कों पर मिसाइलें दाग़ी हैं, जहां उसके मुताबिक अमेरिका के सैन्य ठिकाने हैं. यही नहीं, वह होर्मुज की खाड़ी में जहाज़ों की आवाजाही रोकने के अलावा उन बड़े कारोबारी संस्थानों पर हमले की बात कर रहा है जिनमें अमेरिकी पैसा लगा है. यानी अब माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी कंपनियां भी उसके निशाने पर हैं.

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यहीं यह खयाल आता है कि क्या सारे युद्ध अंततः बहुत सारे लोगों को बरबाद करने के अलावा कुछ लोगों और राष्ट्रों को समृद्ध करने का खेल नहीं है जिनमें सबसे ज़्यादा चोट मनुष्यता खाती है? बर्ट्रेंड रसल का मशहूर वाक्य है कि युद्ध यह नहीं बताता कि कौन सही है, वह यह बताता है कि कौन बचा रह गया.

पहले विश्व युद्ध की यादें

चाहें तो याद कर सकते हैं कि सौ साल से कुछ ऊपर जो पहला विश्वयुद्ध हुआ था, वह कुछ तात्कालिक राजनीतिक कारणों के अलावा दीर्घकालिक आर्थिक दबावों का भी नतीजा था. उन्नीसवीं सदी के अंत तक आते-आते यूरोप के आपसी युद्ध निबट चुके थे और एशिया-अफ़्रीका के मुल्कों पर साम्राज्यवादी चौधराहट की हिस्सेदारी सुनिश्चित हो चुकी थी और लग रहा था कि अब ज़्यादातर युद्ध यूरोप की ज़मीन के बाहर लड़े जाएंगे, तब तक नई महत्वाकांक्षाओं ने सिर उठाया- नई गोलबंदियां बनने लगीं और बीसवीं सदी के दूसरे दशक में हमने पांच साल चला युद्ध देखा जिसमें तीन करोड़ लोग मारे गए. इसके पीछे राष्ट्रवादी उबाल भी थे, नस्लवादी भावनाएं भी थीं और आर्थिक हितों के संरक्षण का भी खयाल था. यह पहला विश्वयुद्ध था जिसके बाद लगा कि अब दुनिया नए युद्धों से बाज़ आएगी. लेकिन महज दो दशक बाद फिर दुनिया युद्ध में उलझी हुई थी. इस बार भी आर्थिक महामंदी के बाद दुनिया खड़ा होने की कोशिश कर रही थी, जर्मनी के राष्ट्रवादी और नस्लवादी मंसूबे अपने चरम पर थे, हिटलर की महत्वाकांक्षाओं के आगे दुनिया के बड़े कहलाने वाले देश घुटने टेक रहे थे, साम्राज्यवाद के विरुद्ध उपनिवेशों में संघर्ष आख़िरी दौर में था. इन सबके बीच हुए युद्ध ने कम से कम छह करोड़ लोगों की जान ले ली.

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इसके बाद जो विश्व-व्यवस्था बनी, उसमें भी शीत युद्ध का लंबा दौर चला और सोवियत विस्तारवाद और अमेरिकी दादागीरी का भी. हंगरी-पोलैंड से लेकर अफ़ग़ानिस्तान तक सोवियत संघ ने जो रुख़ अख़्तियार किया, वह सारी वैचारिक मजबूरियों के बावजूद लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता. लेकिन अमेरिका इस पूरे दौर में क्यूबा से लेकर वियतनाम तक में जो कुछ करता रहा, उसे भुलाया नहीं जा सकता. वियतनाम पर हमला उसकी दादागीरी का सबसे डरावना उदाहरण था जब अमेरिका ने वहां क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं और इसके बावजूद वहां से पराजित-अपमानित लौटने को मजबूर हुआ. फिर उसने डब्ल्यूएमडी यानी सामूहिक विनाश के हथियारों की तलाश के बहाने इराक को बरबाद किया और 9/11 का बदला लेने के नाम पर तथ्यों की अनदेखी करते हुए आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का एलान कर अफ़ग़ानिस्तान में तबाही मचाई.

कितना बड़ा है अमेरिका का अहंकार और दबदबा

अब इन सारे युद्धों को याद करने का मक़सद बस यह याद दिलाना है कि हम फिर अमेरिका के दबदबे और अहंकार की सज़ा भुगतने को मजबूर लग रहे हैं. यह सोचना कुछ हैरान करता है कि महज कुछ ही बरस पहले ये भ्रम हो रहा था कि अरब देशों और इज़रायल के बीच एक सर्वमान्य समझौता हो सकता है, लेकिन पहले हमास के हमले और फिर बौखलाए इज़रायल के अमानवीय गाज़ा युद्ध ने सबकुछ बदल दिया. अभी हम इस मलबे से जूझ ही रहे थे और अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत चल ही रही थी कि ट्रंप ईरान पर टूट पड़े. वे ईरान में लोकतंत्र बहाली की बात कर रहे हैं और अपने देश में लोकतंत्र को कमज़ोर कर रहे हैं. माना जा रहा है कि एप्सटीन फाइलों से ध्यान भटकाने के लिए उन्होंने यह युद्ध छेड़ा है. इन फाइलों से वे दस्तावेज निकल रहे हैं जो डोनाल्ड ट्रंप को सीधे-सीधे कई घृणित अपराधों का संदिग्ध मुजरिम करार देते हैं.

कायदे से कोई दूसरा नेता होता तो अब तक शर्मसार हो कम से कम इस्तीफ़ा देकर चल देता. शायद कोई दूसरा दौर भी होता तब भी ऐसे नेता के खिलाफ़ एक बड़ा आंदोलन चल पड़ा होता. दुर्भाग्य से जो एप्सटीन फाइलें हैं, उनमें दुनिया भर के कई ताकतवर नेताओं, उद्योगपतियों और बौद्धिकों के भी नाम हैं. इससे पता चलता है कि हम कैसे बीमार पूंजी-केंद्रित दौर की गिरफ़्त में हैं.

डोनाल्ड ट्रंप की मनमानियां

ईरान पर हमला दरअसल इसी नस्लवादी, मर्दवादी, बीमार पूंजीवाद द्वारा ख़ुद को बचाने की कोशिश है. इसी बीमार मानसिकता का प्रदर्शन ट्रंप ने तब किया जब हिंद महासागर में डुबोए गए ईरान के जहाज़ को लेकर टिप्पणी की कि ऐसा करने में उनके सिपाहियों को मज़ा आता है. उनकी सत्ता-मदांधता का आलम यह है कि वे चाहते हैं कि ईरान में भी वही शासक हो जिस पर अमेरिका मुहर लगाए. इसके पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अगवा कर उन्होंने बताया कि वे अंतरराष्ट्रीय क़ायदे-क़ानूनों को बिल्कुल ठेंगे पर रखते हैं. दरअसल ट्रंप ने पूरी विश्व-व्यवस्था को उलट-पुलट दिया है. वे दुनिया भर के नेताओं को अपमानित कर रहे हैं. वे अपने लिए नोबेल प्राइज़ मांग रहे हैं. वे यूरोप और नाटो को याद दिला रहे हैं कि वह दोनों अमेरिका के रहमो करम पर हैं. वह संयुक्त राष्ट्र की बहुत सारी कल्याणकारी परियोजनाओं का फंड बंद कर चुके हैं- मानते हुए कि अमेरिका को इनकी ज़रूरत नहीं है. वे फिलिस्तीन और वेनेजुएला के बाद ईरान पर हमला कर चुके और क्यूबा पर हमले का इशारा भी कर रहे हैं.

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यह वही व्यक्तिवादी चरम है जो हिटलर और ट्रंप को एक-दूसरे के क़रीब ले आता है. जर्मनी ने हिटलर पर भरोसा करके जो कुछ भुगता और बाक़ी दुनिया को भुगतने पर मजबूर किया, क्या अमेरिका भी ट्रंप पर ऐसा ही भरोसा करके ऐसी ही नियति चुनेगा? उम्मीद करनी चाहिए कि इतिहास के सबक उसे याद रहेंगे और एक हद के बाद वहां की जनता अपने इस फ्रैंकेस्टाइन जैसे नेता को नकार देगी. लेकिन जब तक वह दिन नहीं आता, तब तक बुरे दिन मान कर चलिए. यह सारी दुनिया से ज़्यादा अमेरिकी लोकतंत्र का इम्तिहान है.

( डिस्क्लेमर:लेखक NDTV इंडिया के सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.)

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