आस्था बनाम राजनीति: सबरीमाला पर सुनवाई से पहले माकपा ने क्यों बदला अपना स्टैंड

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Nilanjan Mukhopadhyay

भारत में चुनाव के समय धर्म और राजनीति का नैरेटिव कभी-कभी एक-दूसरे से जुड़ा रहता है तो कभी-कभी एक-दूसरे के जुदा. इसलिए यह हैरानी की बात नहीं है कि जैसे ही केरल में विधानसभा चुनाव का प्रचार मंगलवार को खत्म हुआ, वैसे ही पिछले कई सालों से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर जारी विवाद पर कानूनी बहस फिर से तेज हो गई. इसमें सिर्फ सबरीमाला ही नहीं बल्कि दूसरे धर्मों से जुड़े मामलों का भी कानूनी समाधान निकलने की उम्मीद है. 

इस महत्वपूर्ण सुनवाई के पहले चरण में सुप्रीम कोर्ट उन पक्षों को सुनेगा, जिन्होंने 2018 के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है या उसका समर्थन कर रहे हैं. इस फैसले में महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी. देश की सर्वोच्च अदालत और चुनाव आयोग ने अपने-अपने महत्वपूर्ण फैसलों की तारीख तय करते समय शायद एक-दूसरे के कार्यक्रम पर ध्यान नहीं दिया होगा, लेकिन दोनों के समय के एक साथ आना को नजरअंदाज करना मुश्किल है.

कौन कर रहा है सबरीमला मामले की सुनवाई 

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अगुवाई में नौ जजों के संविधान पीठ ने सबरीमाला और उससे जुड़े संवैधानिक मुद्दों पर सुनवाई शुरू की. वहीं दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने उसी राज्य में मतदान की तारीख तय की, जहां लोग परंपरागत रूप से बड़ी संख्या में वोट डालते हैं और अपनी पसंद के उम्मीदवार और पार्टी को चुनते हैं. हालांकि यह सिर्फ एक संयोग है, लेकिन केरल के सबसे श्रद्धेय मंदिरों और देवताओं में से एक से जुड़े इस महत्वपूर्ण कानूनी मामले की सुनवाई नौ अप्रैल, यानी मतदान के दिन तक तीन दिन चलेगी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट उन पक्षों की दलीलें सुनेगा जो पुनर्विचार याचिका का विरोध कर रहे हैं. आखिर में 21 अप्रैल को अदालत दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें सुनेगी और अगले दिन न्यायाधीश एमिकस क्यूरी (अदालत के सलाहकार) वरिष्ठ वकील के परमेश्वर और वकील शिवम सिंह की राय सुनेगी.

साल 2018 के फैसले की समीक्षा के लिए दायर याचिकाओं पर चल रही सुनवाई आगे भी जारी रहेगी. उस फैसले में पांच जजों की पीठ ने 4-1 के बहुमत से 10 से 50 साल की महिलाओं (जिन्हें प्रजनन आयु माना जाता है) के मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था. सुप्रीम कोर्ट इस साल फरवरी में तय की गई इस सुनवाई की समय सीमा के मुताबिक इसे 22 अप्रैल तक पूरा करेगा. इसके बाद फैसला सुरक्षित रखा जा सकता है. हालांकि जजों का अंतिम फैसला कब आएगा, यह कहना मुश्किल है.

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर कहां कहां पड़ेगा

सबरीमाला मामले की अंतिम चरण की सुनवाई बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक तरफ व्यक्तिगत अधिकारों और दूसरी तरफ कुछ समुदायों की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़े मुद्दों को संतुलित करना है. अक्सर ये दोनों एक-दूसरे के खिलाफ होते हैं. यह सुनवाई और इसका फैसला इसलिए भी अहम है, क्योंकि इसका असर मस्जिदों और पारसी अग्नि मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश जैसे मामलों पर भी पड़ सकता है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नौ जजों की मौजूदा पीठ का फैसला इस बहस को हमेशा के लिए खत्म कर देगा कि क्या आस्था (धर्म) के आधार पर महिलाओं को किसी धार्मिक स्थल में जाने से रोका जा सकता है.

इस सवाल का जवाब आसान नहीं है, क्योंकि यह कानूनी नजीरों (Precedents) की जटिल व्याख्या और भारत के मुख्य न्यायाधीश के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है. तकनीकी रूप से इससे भी बड़ी पीठ बनाई जा सकती है, लेकिन मौजूदा नौ जजों के पीठ को पहले ही एक असाधारण संविधान पीठ माना जा रहा है. इतिहास में इससे बड़ी पीठें भी बनी हैं. अब तक की सबसे बड़ी 13 जजों की पीठ केशवानंद भारती मामले में बनी थी. इसी मामले में जजों ने 'बेसिक स्ट्रक्चर' (मूल ढांचा) का सिद्धांत दिया था, जो आज भी काफी चर्चा में रहता है.

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विडंबना यह है कि 1991 में केरल हाई कोर्ट में जिन बुनियादी सवालों पर पहली बार सुनवाई शुरू हुई थी, करीब 35 साल बाद भी वो सवाल आज भी बने हुए हैं. मुख्य सवाल यह है कि क्या किसी खास वर्ग (महिलाओं) को किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश से रोकना, वह भी इस आधार पर यह संविधान बनने से पहले की परंपरा रही है, उनके अधिकारों का उल्लंघन नहीं है? 

समानता के सिद्धांत के आधार पर किसी भी नागरिक या किसी भी धर्म के अनुयायी को मंदिर, मस्जिद, पारसी अग्नि मंदिर या किसी भी पूजा स्थल में जाने से नहीं रोका जाना चाहिए. लेकिन दूसरी तरफ, देश में बहुत से लोग मानते हैं कि आस्था (धर्म) हमेशा तर्क से नहीं चलती. 'अंधविश्वास' शब्द कब और किन परिस्थितियों में आम भाषा का हिस्सा बना, यह ठीक-ठीक कहना मुश्किल है, लेकिन ज्यादातर विद्वानों का मानना है कि इसका इस्तेमाल करीब 500 साल पहले से हो रहा है. 

भारत की राजनीति में धर्म की भूमिका

पिछले करीब 40 सालों से भारतीय राजनीति में धर्म एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है, खासकर 1980 के दशक के मध्य में अयोध्या का राम मंदिर–बाबरी मस्जिद विवाद सामने आने के बाद. हालांकि पहले भी राजनीति और चुनाव में धर्म की भूमिका थी, लेकिन अयोध्या आंदोलन के बाद यह और ज्यादा गहरा और तीखा हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने जब सात अप्रैल को लंबे समय से चल रहे सबरीमाला मंदिर मामले की अंतिम सुनवाई शुरू की, तो राजनीतिक नजरिए से एक अहम बात यह थी कि इस मुद्दे पर केरल सरकार और माकपा के रुख में बदलाव आया है.

केरल की पिनराई विजयन सरकार का सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले की समीक्षा की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं का समर्थन करना, उसकी रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है. केरल में 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही यह बदलाव साफ दिखने लगा. हालांकि इसकी शुरुआत पहले ही हो चुकी थी, जब 2018 के फैसले (जिसमें महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी) पर वाम मोर्चे (एलडीएफ) सरकार का सख्त प्रगतिशील रुख धीरे-धीरे नरम पड़ने लगा. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में एलडीएफ के खराब प्रदर्शन के बाद माकपा की आक्रामक धर्मनिरपेक्षता भी कम होती नजर आई.अब बड़ा सवाल यह है कि जब पहले चरण की सुनवाई खत्म होने के दिन मतदान होगा, तो क्या इस रणनीति का फायदा एलडीएफ को मिलेगा? इसका जवाब चार को मई को पता चलेगा, जब चुनाव के नतीजे आएंगे. 

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माकपा की रणनीति क्या है

स्पष्ट है कि माकपा ने समझ लिया था कि वह अपने पारंपरिक 'हिंदू वोट बैंक' को पूरी तरह नाराज नहीं कर सकती, जो लंबे समय से उसका समर्थन करता रहा है. इसी वजह से यह कदम उन संगठनों और उनके समर्थकों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जैसे नायर सर्विस सोसाइटी, जो 2018 के फैसले का खुलकर विरोध करती रही है,इसी तरह, एझावा समुदाय (जिसका प्रतिनिधित्व श्री नारायण धर्म परिपालना योगम करता है) भी सरकार के 'परंपरा-विरोधी'  रुख से खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा था. यह समुदाय माकपा की जमीनी ताकत का महत्वपूर्ण आधार है. हालांकि इस बदलाव से पार्टी के अपने वैचारिक समर्थकों का एक हिस्सा नाराज हो गया है,इससे कांग्रेस को उम्मीद जगी है कि उसे इसका फायदा मिल सकता है. लेकिन कांग्रेस ने भी 2018 के फैसले का खुलकर समर्थन नहीं किया है. इस तरह बीजेपी समेत करीब सभी राजनीतिक दल समीक्षा की मांग करने वालों के साथ खड़े नजर आते हैं.

भारतीय राजनीति में धर्म की केंद्रीय भूमिका को देखते हुए, यह अजीब नहीं है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने नई रणनीतियों पर काम करना शुरू किया. आखिरकार, राज्य सरकार ने धार्मिक मामलों में 'परंपरा और रीति-रिवाज' का हवाला देने वालों का साथ देना शुरू कर दिया.इससे वामपंथ के कट्टर समर्थकों में निराशा पैदा हुई.

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सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने से कुछ दिन पहले ही केरल सरकार ने कोर्ट को बता दिया था कि वह 2018 के फैसले की समीक्षा का समर्थन करती है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कदम 'हिंदू मतदाताओं' को एलडीएफ की ओर खींचने के लिए काफी होगा. क्या इससे 'धर्मनिरपेक्ष' मतदाताओं और खासकर मुस्लिम समुदाय के संभावित दूरी बनाने के असर को संतुलित किया जा सकेगा? 

अंत में, चुनाव नतीजे ही तय करेंगे कि क्या कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) दो बार सत्ता से बाहर रहने के बाद फिर सत्ता में लौटेगा या एलडीएफ तीसरी बार जीत हासिल करेगा.

(डिस्क्लेमर: लेखक देश के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. उन्होंने 'नरेंद्र मोदी: दी मैन एंड दी टाइम्स' के अलावा भी कई किताबें लिखी हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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