बंगाल के पहले चरण में बंपर मतदान, महिलाएं और सरकारी योजनाएं क्या गुल खिलाएंगी?

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Yashwant Deshmukh

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 92 फीसदी से अधिक वोटिंग हुई. इस बहुत ज़्यादा वोटिंग को समझने में पहली गलती यह हो सकती है कि लोग पुराने टीवी वाले आसान निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि ज्यादा वोटिंग का मतलब सरकार के खिलाफ नाराज़गी (एंटी-इंकम्बेंसी) है. लेकिन भारतीय राजनीति में अब यह सोच काफी पुरानी हो चुकी है. पिछले कुछ साल के चुनावों में हमने देखा है कि ज्यादा वोटिंग कभी सरकार को नुकसान पहुंचा सकती है, लेकिन कई बार उसे फायदा होता हुआ भी दिखा है. सिर्फ वोटिंग का आंकड़ा अपने आप में कुछ खास नहीं बताता है, जब तक हम यह न समझें कि कौन लोग वोट देने आए, वे क्यों आए और किन सामाजिक समूहों ने वोटिंग में ज्यादा भाग लिया. हाल के चुनाव विश्लेषण भी यही कहते हैं कि ज्यादा वोटिंग को सीधे सरकार के खिलाफ फैसला मान लेना सही नहीं है.

मतदान में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

पिछले दो साल में जिस चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा है, वह है महिलाओं की वोटिंग में बढ़ोतरी. कहा जा सकता है कि 2024 के बाद के चुनावों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने कई चौंकाने वाले नतीजे दिए हैं. कई राज्यों में, खासकर जहां महिलाओं के लिए सरकारी योजनाएं ज्यादा चल रही हैं जैसे केरल, तमिलनाडु आदि वहां महिलाओं की ज्यादा वोटिंग से अक्सर सरकार को फायदा हुआ है. पहले यह माना जाता था कि ज्यादा वोटिंग का मतलब सरकार के खिलाफ माहौल है, लेकिन हाल के आंकड़े बताते हैं कि जब महिलाएं पुरुषों से ज्यादा संख्या में वोट देती हैं, तो इससे सरकार को स्थिरता मिल सकती है या उसे फायदा हो सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि महिलाएं अक्सर उन सरकारों को समर्थन देती हैं जो उन्हें योजनाओं के जरिए लगातार लाभ पहुंचाती हैं, जैसे आर्थिक मदद, मुफ्त सुविधाएं, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी सहायता.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अब महिला मतदाता ही चुनाव में सबसे बड़ा फैसला करने वाली बन गई हैं? बिल्कुल, अगर महिलाओं की वोटिंग पुरुषों से काफी ज्यादा होती है, तो चुनाव का नतीजा उसी तरफ झुक सकता है. यह रुझान अब बार-बार देखने को मिल रहा है. जो पार्टियां इस बदलाव को नजरअंदाज करती हैं, वे खतरा उठा रही हैं. कई राज्यों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से 4-6 फीसदी तक ज्यादा रही है. इससे चुनावी नतीजे पारंपरिक 'सरकार विरोधी लहर' वाली सोच से अलग हो रहे हैं.

क्या बंगाल में सरकार विरोधी लहर है

बंगाल में यह बदलाव और भी ज्यादा साफ दिखता है. यहां अक्सर महिलाएं पुरुषों से ज्यादा वोट करती हैं, क्योंकि कई पुरुष रोजी-रोटी के राज्य से बाहर चले जाते हैं, जबकि महिलाएं घर पर रहकर नियमित रूप से वोट करती हैं. इससे बूथ स्तर पर वोटिंग का पैटर्न भी बदल जाता है. इसके अलावा ममता बनर्जी का महिलाओं के साथ एक खास जुड़ाव है, जो उन्हें अलग बनाता है. इसलिए बंगाल को सिर्फ 'सरकार विरोधी लहर' के नजरिए से समझना ठीक नहीं है. बंगाल में वेलफेयर (सरकारी योजनाएं) सिर्फ कागज़ी नीति नहीं है, बल्कि यह घर के खर्च और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है. 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं और दूसरी सरकारी मदद ने तृणमूल कांग्रेस के लिए एक मजबूत और टिकाऊ समर्थन तैयार किया है.इसे अक्सर लोग कम करके आंकते हैं.

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इसका मतलब यह नहीं है कि बीजेपी बंगाल में बढ़ी नहीं है. उल्टा, बीजेपी ने लगातार अपनी पकड़ मजबूत की है, पहले जो अंतर बहुत बड़ा लगता था, उसे उसने काफी हद तक कम कर दिया है. लेकिन सिर्फ बढ़ना और सत्ता में आ जाना एक ही बात नहीं है. मेरे चुनाव पूर्व विश्लेषण में बार-बार यह बात सामने आई कि ममता बनर्जी का काम अपने विरोधियों के मुकाबले आसान दिख रहा था, भले ही बीजेपी ने दूरी कम कर ली हो. इसे एक और तरीके से समझें अगर बीजेपी 40 फीसदी वोट तक भी पहुंच जाए, तब भी वह अपने आप जीत नहीं जाती, क्योंकि ममता को अल्पसंख्यक वोटों का एकजुट समर्थन मिलता है और उनका आधार उतना कमजोर नहीं है, जितना उनके आलोचक मानते हैं. इसलिए बंगाल में मुकाबला तो कड़ा है, लेकिन अभी भी यह पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में नहीं गया है.

देश में पिछले कुछ चुनावों में महिला वोटर निर्णायक साबित हुई हैं.

चुनाव में एसआईआर की कितनी बड़ी भूमिका है

अब बात आती है एसआईआर (Special Intensive Revision) की. यहां भी चीजों को बहुत आसान बनाकर देखना सही नहीं है. चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया में बंगाल की वोटर लिस्ट से करीब 91 लाख नाम हटा दिए गए. इससे कुल मतदाताओं की संख्या काफी कम हो गई. जब वोटर लिस्ट साफ होती है तो वोटिंग फीसद अपने आप बढ़ा हुआ दिख सकता है. बिहार में भी ऐसा ही हुआ था, जहां एसआईआर के बाद मतदान फीसद बढ़ा था. लेकिन एसआईआर केवल आंकड़ों का मामला नहीं है, यह लोगों की भावनाओं और राजनीति से भी जुड़ा है. कई जगह ऐसा हो सकता है कि जिन परिवारों के नाम हटे, उनमें गुस्सा पैदा हो और उसका नुकसान बीजेपी को हो. बिहार में ऐसे उदाहरण भी मिले, जहां एसआईआर का असर ज्यादा था, वहां बीजेपी को नुकसान हुआ. यानी एसआईआर वोटिंग फीसदी तो बढ़ा सकता है, लेकिन इसके साथ ही यह लोगों के भरोसे, नाराज़गी, चुनावी माहौल और कहानी, सब कुछ बदल सकता है.

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ज्यादा वोटिंग की इस कहानी में एक और पहलू है, जिसे कई लोग नजरअंदाज कर देते हैं- डर भी लोगों को उतना ही वोट देने के लिए प्रेरित कर सकता है, जितना उम्मीद करता है. कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई कि जो लोग दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, सूरत जैसे शहरों में काम करते हैं, वे घर वापस आकर वोट देने लगे, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर उन्होंने वोट नहीं दिया, तो भविष्य में उनका नागरिकता से जुड़ा अधिकार भी प्रभावित न हो जाए. जब ऐसा डर परिवारों में फैलता है तो वोट देना एक सामान्य काम नहीं रह जाता, बल्कि बहुत जरूरी बन जाता है. जो लोग घर लौटे, वे मतदान के दिन वोट दिए बिना नहीं रहे होंगे. इसके अलावा केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी तैनाती से कई मतदाताओं को बूथ पर ज्यादा सुरक्षित लगा. इन सब कारणों से भी वोटिंग में बढ़ोतरी हुई. इसमें भावनाएं और प्रशासन दोनों की भूमिका रही.

अधिक मतदान का संकेत क्या है

तो 92.59 फीसदी की वोटिंग आखिर में क्या बताती है? यह बताती है कि बंगाल भारत के सबसे ज्यादा राजनीतिक रूप से जागरूक और सक्रिय राज्यों में से एक है. यहां पार्टियों का संगठन मजबूत है, समाज के अलग-अलग समूह सतर्क हैं, पहचान से जुड़े मुद्दे (जैसे जाति, धर्म आदि) लगातार चर्चा में रहते हैं, सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाले लोग जागरूक हैं और स्थानीय समस्याओं को वोटिंग में बदलने की क्षमता बहुत ज्यादा है. इतना जरूर कहा जा सकता है कि इतनी ज्यादा वोटिंग लोगों की सक्रिय भागीदारी और एसआईआर के असर को दिखाती है, लेकिन सिर्फ इससे यह नहीं पता चलता कि चुनाव कौन जीतेगा. चुनाव आयोग ने इसे आज़ादी के बाद की सबसे ज्यादा वोटिंग बताया है, इसलिए यह ऐतिहासिक है. लेकिन ऐतिहासिक होने का मतलब यह नहीं है कि इसका मतलब साफ-साफ समझ आ जाए. बंगाल में यह आंकड़ा कई भावनाओं को एक साथ दिखा सकता है-नाराज़गी, डर, समर्थन, सरकारी योजनाओं का फायदा और बदलाव की उम्मीद.

पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव में उन जगहों में बीजेपी को परेशानी ज्यादा हुई थी, जहां एसआईआर का असर ज्यादा था.

इसीलिए तुरंत इस मतदान का नतीजा निकालना ठीक नहीं होगा. रिकॉर्ड वोटिंग कोई भविष्यवाणी नहीं होती, बल्कि यह सिर्फ उस दिन की स्थिति का संकेत देती है. अगर महिलाओं ने बड़ी संख्या में वोट दिया है, अल्पसंख्यक वोट एकजुट रहे हैं और ममता बनर्जी की सरकारी योजनाओं पर भरोसा बना हुआ है, तो ज्यादा वोटिंग से सरकार को नुकसान नहीं बल्कि फायदा भी हो सकता है. लेकिन अगर भ्रष्टाचार को लेकर गुस्सा, सरकार से थकान और विरोधी वोट एकजुट हो गए हैं तो यही ज्यादा वोटिंग बदलाव का संकेत भी बन सकती है. चुनाव नतीजों से पहले मेरी समझ यही रही है कि ममता के पास बढ़त है, लेकिन वह अजेय नहीं हैं. यह कहना अलग बात है कि विपक्ष मजबूत हुआ है. यह कहना अलग है कि सरकार का समर्थन पूरी तरह टूट गया है. अभी तक बंगाल में पहला वाला संकेत ज्यादा दिखा है, दूसरा पूरी तरह साबित नहीं हुआ है.

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इससे एक बड़ी सीख भी मिलती है, जो सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है. भारत के चुनाव अब उन शांत लेकिन अहम बदलावों से प्रभावित हो रहे हैं, जिन पर टीवी की बहसों में कम ध्यान दिया जाता है जैसे महिलाओं का एक स्वतंत्र मतदाता के रूप में उभरना, सरकारी योजनाओं पर लोगों का भरोसा बनना, एसआईआर जैसे प्रशासनिक कदमों का असर और पार्टियों की यह क्षमता कि वे लोगों की असुरक्षा को समर्थन में बदल दें. इसलिए बंगाल की यह वोटिंग सिर्फ एक बड़ा आंकड़ा नहीं है, बल्कि बदलते लोकतंत्र का संकेत है. यह दिखाता है कि 'खामोश मतदाता' अब उतना खामोश नहीं रहा, वोटिंग को अब सिर्फ जाति या धर्म से नहीं बल्कि महिलाओं की भागीदारी से भी समझना होगा. चुनावी विश्लेषण के पुराने तौर-तरीके अब हमारी आंखों के सामने ही खत्म हो रहे हैं.

(डिस्क्लेमर: लेखक देश के जाने-माने राजनीतिक और चुनाव विश्लेषक हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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