बॉर्डर की चिंता या विक्टिम कार्ड का पैंतरा....लोकसभा में राहुल के भाषणों की मंशा को समझिए

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संजीव कुमार मिश्र

भारतीय लोकतंत्र की नींव विचार-विमर्श, तर्क और सम्मानजनक विरोध पर टिकी है. लेकिन हाल के वर्षों में राजनीतिक विमर्श का स्तर जिस तरह गिरा है, वह चिंताजनक है. विशेषकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के संदर्भ में यह देखना हतप्रभ करता है कि वो किस कदर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर होने के उत्साह में अक्सर 'व्यक्तिगत मर्यादा' की उस महीन रेखा को लांघ जाते हैं, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है. कभी 'चौकीदार चोर है' का नारा, कभी 'वोट चोरी' का संगीन आरोप, तो कभी 'पनौती' जैसे अशोभनीय शब्दों का प्रयोग- राहुल गांधी की राजनीति का यह पैटर्न बार-बार सामने आता रहा है. कहावत है कि 'दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है', लेकिन राहुल गांधी के मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अपनी पिछली गलतियों और उनसे मिली चुनावी हार से कोई सबक नहीं सीखा है. जब-जब उन्होंने मर्यादा की सीमा तोड़ी है, जनता ने उन्हें 'मर्यादा का पाठ' पढ़ाया है, फिर भी संसद से लेकर सड़क तक उनके आचरण में बदलाव की कमी खटकती है.

सोमवार को संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान जो कुछ भी हुआ, वह राहुल गांधी की उसी पुरानी कार्यशैली का नया अध्याय था. चर्चा की शुरुआत में ही माहौल तब गरमा गया जब राहुल गांधी ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे के एक 'अप्रकाशित संस्मरण' का हवाला देना शुरू किया.संसदीय नियमों के अनुसार, किसी भी ऐसी सामग्री को सदन के पटल पर उद्धृत नहीं किया जा सकता जिसकी प्रामाणिकता सिद्ध न हो या जो सार्वजनिक रूप से प्रकाशित न हुई हो. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत इस पर आपत्ति जताई. उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस पुस्तक का अस्तित्व ही अभी सार्वजनिक नहीं है, उसे आधार बनाकर देश की सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बात करना नियमों के विरुद्ध है.

क्या संसदीय नियम तोड़ सकते हैं राहुल गांधी

विवाद केवल रक्षा मंत्री की आपत्ति तक सीमित नहीं रहा. गृह मंत्री अमित शाह ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सदन नियमों और प्रक्रियाओं से चलता है, किसी भी सदस्य को- चाहे वह कितना ही बड़ा पद क्यों न रखता हो- नियम तोड़ने की छूट नहीं दी जा सकती. राहुल गांधी का तर्क था कि उनके पास मौजूद सामग्री प्रामाणिक है और वे देश की सुरक्षा का सवाल उठा रहे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष ने कांग्रेस की देशभक्ति पर सवाल उठाए हैं, इसलिए उन्हें जवाब देना पड़ा. इस पर अमित शाह ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि बीजेपी की ओर से किसी की देशभक्ति पर संदेह नहीं किया गया था, बल्कि पिछली सरकारों की 'नीतियों और दिशा' पर आलोचनात्मक चर्चा हुई थी. 

लोकसभा अध्यक्ष ने भी बार-बार हस्तक्षेप किया और स्पष्ट किया कि जिन विषयों की चर्चा कार्यसूची में नहीं है और जिनसे देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को ठेस पहुंच सकती है, उनसे बचना चाहिए. लेकिन राहुल गांधी भारत-चीन संबंधों और सीमा की स्थिति जैसे संवेदनशील विषयों पर अप्रमाणित दावों के साथ अड़े रहे.

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बाद में आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने न केवल नियमों का उल्लंघन किया, बल्कि वे अध्यक्ष के निर्देशों की भी अवहेलना करते रहे. यह स्थिति केवल एक राजनेता की जिद नहीं, बल्कि उस संस्था के अपमान जैसा था, जिसके वे खुद एक महत्वपूर्ण स्तंभ (नेता प्रतिपक्ष) हैं.

आखिर राहुल गांधी चाहते क्या हैं- चर्चा या विवाद

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि सोमवार को बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या के उस भाषण से तैयार हुई थी, जिसमें उन्होंने कांग्रेस के 10 साल के शासन को 'बहानों की सरकार' बताया था. सूर्या ने युवाओं को दिशाहीन करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि 2014 के बाद देश 'परंपरा और प्रौद्योगिकी' के साथ आगे बढ़ा है. राहुल गांधी ने इसी भाषण को आधार बनाकर अपनी देशभक्ति के आहत होने का दावा किया. फिर उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर बोलना शुरू कर दिया. सत्ता पक्ष के वरिष्ठ मंत्रियों का राहुल को बार-बार रोकना केवल एक राजनीतिक अवरोध नहीं था, बल्कि यह एक स्पष्ट संकेत था कि सेना, सीमा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों को बिना ठोस आधार के 'राजनीतिक फुटबॉल' नहीं बनने दिया जाएगा. मंत्रियों ने यहां तक कहा कि सदन की गरिमा 'किसी भी परिवार' से ऊपर है.

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सोमवार को लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर पेश धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान अपनी बात रखते नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी.

सवाल यह उठता है कि राहुल गांधी बार-बार अधूरी जानकारी या विवादित स्रोतों के सहारे क्यों बोलते हैं? इसके पीछे दो प्रमुख कारण नजर आते हैं:

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  • चर्चा का केंद्र बनने की लालसा: उनके आलोचकों का मानना है कि तीखे और सनसनीखेज आरोप लगाकर वे मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खियों में बने रहना चाहते हैं.
  • सहानुभूति की राजनीति: जब वे सीधे तर्कों में घिर जाते हैं, तो वे यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि पूरी सरकार और तंत्र मिलकर एक व्यक्ति (राहुल) को चुप कराना चाहता है. इस तरह वो विक्टिम कार्ड खेलने लगते हैं.

सेना और सुरक्षा: राजनीति से ऊपर का विषय

सेना और देश की सुरक्षा जैसे मुद्दे भावनात्मक होने के साथ-साथ अत्यंत गंभीर भी होते हैं. संसद में कही गई हर बात 'आधिकारिक रिकॉर्ड' का हिस्सा बनती है और इसे दुनिया भर में सुना जाता है. जब एक जिम्मेदार नेता अप्रमाणित किताबों या संस्मरणों के आधार पर सेना के मनोबल या सीमा की स्थिति पर सवाल उठाता है, तो उसका नुकसान केवल सरकार को नहीं, बल्कि पूरे देश की छवि को होता है. राजनाथ सिंह और अमित शाह की आपत्तियां इसी 'मर्यादा रेखा' को बचाने की कोशिश थी. सेना को राजनीतिक वार-पलटवार का औजार बनाना किसी भी लोकतंत्र के लिए आत्मघाती हो सकता है.

राहुल गांधी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती खुद को एक 'गंभीर राष्ट्रीय नेता' के रूप में स्थापित करने की है. शब्दों की धार से सुर्खियां तो मिल सकती हैं, लेकिन विश्वसनीयता केवल तथ्यों की ठोस जमीन पर ही खड़ी होती है.'चौकीदार चोर है' से लेकर 'संसद के ताजा प्रकरण' तक, उनके राजनीतिक सफर में एक निरंतरता दिखी है, मर्यादा का उल्लंघन. उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि देश उनमें एक विपक्ष का नेता देखता है जो सरकार से तीखे सवाल पूछे, उसकी खामियों को उजागर करे, लेकिन साथ ही 'संवेदनशील सीमाओं' को भी समझे. जब बात सेना और राष्ट्र की सुरक्षा की हो, तो हर नेता के शब्द तराजू पर तुले होने चाहिए.

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(डिस्क्लेमर: लेखक देश की राजनीति पर पैनी नजर रखते हैं. वो राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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