11 और 13 मई 1998 की तारीख भारत की परमाणु शक्ति बनने की यात्रा में मील का पत्थर है. 'ऑपरेशन शक्ति' के तहत किए गए परमाणु परीक्षणों ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित कर चुका है. उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि भारत की परमाणु क्षमता सुरक्षा और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए है.
परमाणु हथियारों के तीन युग
पोकरण-II की 28वीं वर्षगांठ ऐसे समय आई है, जब दुनिया फिर से परमाणु प्रतिस्पर्धा के नए युग में प्रवेश करते दिख रही है. साल 2022 के बाद से उच्च-तीव्रता वाले संघर्षों के प्रसार ने सैन्य मामलों के लगभग प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है. परमाणु प्रतिरोधक क्षमता भी इस भू-स्त्रातजिक उथल-पुथल से अछूती नहीं रही है.विश्व अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जिसकी भविष्यवाणी फ्रांस की प्रसिद्ध स्त्रातजिक चिंतक रेसे डेलपेच (Thérèse Delpech) ने अपनी पुस्तक Nuclear Deterrence in the 21st Century में 'तृतीय परमाणु युग' के रूप में की थी.
प्रथम परमाणु युग की शुरुआत 1945 की त्रासदी हिरोशिमा और नागासाकी से हुई थी तो द्वितीय परमाणु युग 1989 में बर्लिन दीवार के पतन के बाद आरंभ हुआ, जब परमाणु निरस्त्रीकरण और शस्त्र नियंत्रण की नीतियों पर विशेष बल दिया गया. किंतु आज विश्व उस 'तृतीय परमाणु युग' में प्रवेश कर चुका है, जिसे डेलपेच ने 'स्त्रातजिक डकैती' (Strategic Piracy) का युग कहा था. इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं,
- नियमों का अभाव: फरवरी 2026 में न्यू स्टार्ट संधि समाप्त हो चुकी है. उसके स्थान पर कोई नई प्रभावी व्यवस्था अस्तित्व में नहीं आई है. परिणामस्वरूप अमेरिका और रूस के परमाणु शस्त्रागार पर कानूनी सीमाएं लगभग खत्म हो गई हैं. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता और महाशक्तियों के बीच बढ़ते अविश्वास ने वैश्विक परमाणु नियंत्रण व्यवस्था को और कमजोर किया है.
- छल और अस्पष्टता: ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश परमाणु अप्रसार संधि (NPT) व्यवस्था को खुली चुनौती दे रहे हैं. इससे किसी भी देश की वास्तविक परमाणु क्षमता, इरादों और सैन्य तैयारी का सटीक आकलन करना लगातार कठिन होता जा रहा है.
- प्रभावी प्रतिरोध बनाए रखने की कठिनाई: हाइपरसोनिक मिसाइलें, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर युद्ध और अंतरिक्ष-आधारित सैन्य प्रणालियों ने पारंपरिक और परमाणु युद्ध के बीच की सीमाओं को धुंधला कर दिया है. विशेषज्ञों के मुताबिक AI, अंतरिक्ष तकनीक और परमाणु क्षमताओं का परस्पर संबंध भविष्य में आकस्मिक संघर्ष और अनियंत्रित तनाव वृद्धि का सबसे बड़ा कारण बन सकता है.
'तृतीय परमाणु युग' अपने पूर्ववर्ती युगों की तुलना में अधिक जटिल, बहुध्रुवीय और अनिश्चित बन चुका है. विश्व अब ऐसे परमाणु दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां प्रतिरोध, स्थिरता का माध्यम कम और स्त्रातजिक दबाव का उपकरण अधिक बनता जा रहा है. नियम-आधारित व्यवस्था को गंभीर चुनौतियों, अमेरिका की पारंपरिक सुरक्षा गारंटी पर घटते भरोसे, अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता, ईरान–अमेरिका तनाव, उत्तर कोरिया की परमाणु महत्वाकांक्षाएं और दक्षिण एशिया में भारत–पाकिस्तान संघर्ष ने वैश्विक स्त्रातजिक असुरक्षा को और गहरा कर दिया है. इन परिस्थितियों ने परमाणु खतरे को पुनः वैश्विक रणनीति और शक्ति-संतुलन के केंद्र में ला खड़ा किया है. इससे कई देश परमाणु हथियारों को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की अंतिम गारंटी के रूप में देखने लगे हैं. इससे परमाणु प्रतिरोध और हथियारों की होड़ दोनों बढ़ सकता है.
Add image caption here
क्या परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ी है दुनिया
डूम्सडे क्लॉक( Doomsday Clock) मानवता के सामने मौजूद वैश्विक खतरों का प्रतीकात्मक संकेत है. इसे 1947 में परमाणु वैज्ञानिकों ने शुरू किया था. इसमें 'Midnight' वैश्विक तबाही का प्रतीक है, जबकि 'Seconds to Midnight' यह दर्शाते हैं कि दुनिया विनाश के कितने करीब पहुंच चुकी है. साल 2025 में इसे '90 Seconds to Midnight' पर रखा गया, इसे अब तक का सबसे खतरनाक स्तर माना गया. इसका प्रमुख कारण परमाणु तनाव, रूस- यूक्रेन और पश्चिम एशिया संकट, AI आधारित सैन्य तकनीक और जलवायु परिवर्तन है. यह घड़ी दुनिया को चेतावनी देती है कि मानवता को जिम्मेदार नेतृत्व, कूटनीति और वैश्विक सहयोग की आवश्यकता है. आज की परमाणु दौड़ शीत युद्ध की तरह केवल हथियारों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है. अब प्रतिस्पर्धा तकनीकी श्रेष्ठता, सेकंड स्ट्राइक क्षमता, मिसाइल रक्षा प्रणाली और हाइपरसोनिक तकनीक को लेकर है.
रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को यह दिखा दिया कि परमाणु हथियार केवल युद्ध रोकने का माध्यम नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव बनाने का उपकरण भी हैं. रूस ने कई बार अप्रत्यक्ष रूप से परमाणु संकेत देकर पश्चिमी देशों को सीधी सैन्य भागीदारी से दूर रखने की कोशिश की. इससे 'Nuclear Signalling' की राजनीति फिर चर्चा में आ गई. वहीं दूसरी ओर चीन तेजी से अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार कर रहा है. वह नए मिसाइल साइलो (जमीन के अंदर मिसाइलें रखने की जगह) बना रहा है, परमाणु पनडुब्बियों की संख्या बढ़ा रहा है और लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइलों पर काम कर रहा है. चीन की यह रणनीति केवल अमेरिका को चुनौती देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत की सुरक्षा गणनाओं पर भी पड़ता है.
पश्चिम एशिया में ईरान–अमेरिका तनाव ने परमाणु युद्ध की आशंका को और बढ़ा दिया है. इस संघर्ष ने यह धारणा मजबूत की है कि यदि ईरान के पास परमाणु हथियार होते, तो अमेरिका उस पर प्रत्यक्ष सैन्य हमला करने से बचता. यह स्थिति एक असुरक्षित वैश्विक वातावरण का संकेत देती है, जहां अनेक देश अपनी सुरक्षा के अंतिम कवच के रूप में परमाणु हथियारों को देखने लगे हैं. परिणामस्वरूप, कई राष्ट्र परमाणु हथियार बनाने अथवा ऐसी तकनीकी क्षमता प्राप्त करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं, जिससे भविष्य में परमाणु प्रसार और वैश्विक अस्थिरता दोनों बढ़ने की आशंका है. इस स्थिति ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. जिन देशों के पास पहले से परमाणु हथियार हैं, वे अपने शस्त्रागार का आधुनिकीकरण कर रहे हैं, जबकि अन्य देश सुरक्षा कारणों से परमाणु विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.
भारत की परमाणु नीति क्या है
पोकरण-II के बाद भारत ने अपनी परमाणु नीति के तीन मुख्य स्तंभ स्थापित किए
- विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध
- पहले प्रयोग नहीं (NO First Use-NFU)
- व्यापक प्रतिशोध
भारत ने उपरोक्त के द्वारा स्वयं को एक 'विश्वसनीय परमाणु शक्ति' के रूप में प्रस्तुत किया और दुनिया को यह संदेश दिया कि उसकी परमाणु नीति आक्रामक विस्तारवाद पर नहीं बल्कि विश्वसनीय प्रतिरोध (Credible Deterrence) पर आधारित है. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के रूप में मान्यता प्राप्त है.
पाकिस्तान का न्यूक्लियर ब्लफ़
दक्षिण एशिया की परमाणु राजनीति को समझने के लिए पाकिस्तान की रणनीति को समझना आवश्यक है. पाकिस्तान ने परमाणु हथियारों को केवल प्रतिरोधक क्षमता के रूप में नहीं, बल्कि आतंकवाद को संरक्षण देने वाले स्त्रातजिक ढाल के रूप में प्रयोग किया है. उसका मानना है कि परमाणु युद्ध के भय से भारत सीमित सैन्य कार्रवाई से भी बचेगा. इसी रणनीति को प्रायः पाकिस्तान का 'न्यूक्लियर ब्लफ़' कहा जाता है.
पाकिस्तान की परमाणु रणनीति का प्रमुख उद्देश्य भारत को उसकी पारंपरिक सैन्य श्रेष्ठता का उपयोग करने से रोकना है. भारत के 'Cold Start Doctrine' को निष्प्रभावी करने के लिए पाकिस्तान ने सामरिक परमाणु हथियारों (Tactical Nuclear Weapons-TNWs), जिसमें नस्र मिसाइल जैसी कम दूरी की मिसाइलों (60–120 किमी रेंज) शामिल हैं, को अपनी रक्षा नीति का हिस्सा बनाया. ये कम क्षमता वाले परमाणु हथियार युद्धक्षेत्र में सीमित और लक्षित उपयोग के लिए डिजाइन किए गए हैं. ये स्त्रातजिक परमाणु हथियारों से भिन्न होते हैं. लेकिन भारत ने संयमित लेकिन प्रभावी सैन्य प्रतिक्रियाओं के माध्यम से इस धारणा को भी चुनौती दी है. बालकोट हमले और ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों के जरिए भारत ने यह संदेश दिया कि आतंकवाद केवल कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है.
अग्नि-MRV और भारत की नई स्त्रातजिक क्षमता
हाल के सालों में भारत ने अग्नि-V सहित अग्नि श्रृंखला की मिसाइलों में MIRV/MRV क्षमता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति दिखाई है. Multiple Independently Targetable Re-entry Vehicles (MIRV) ऐसी तकनीक है, जिसमें एक ही बैलिस्टिक मिसाइल कई परमाणु वारहेड लेकर अलग-अलग लक्ष्यों को निशाना बना सकती है. यह क्षमता विरोधी की मिसाइल रक्षा प्रणाली को निष्प्रभावी करने में सहायक मानी जाती है. भारत का MIRV क्षमता की ओर बढ़ना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण स्त्रातजिक संदेश भी है कि भारत अपने परमाणु प्रतिरोध तंत्र को अधिक विश्वसनीय और टिकाऊ बना रहा है. विशेष रूप से चीन की बढ़ती सैन्य और परमाणु क्षमता के संदर्भ में यह विकास महत्वपूर्ण है. इसके साथ ही भारत अपने परमाणु त्रिकोण (Nuclear Triad) को भी मजबूत कर रहा है. भूमि-आधारित अग्नि मिसाइलें, वायुसेना के Dassault Rafale और Sukhoi Su-30MKI जैसे प्लेटफॉर्म और समुद्र-आधारित INS Arihant श्रेणी की परमाणु पनडुब्बियां इस त्रिकोण के प्रमुख स्तंभ हैं. परमाणु पनडुब्बियां दुश्मन के प्रथम हमले के बाद भी जवाबी हमला सुनिश्चित कर द्वितीय प्रहारक क्षमता की सबसे मजबूत गारंटी प्रदान करती हैं.
क्या भारत को NFU पर पुनर्विचार करना चाहिए?
आज भारतीय स्त्रातजिक समुदाय में सबसे बड़ी बहस यही है. 2003 में घोषित NFU नीति ने भारत को नैतिक और कूटनीतिक लाभ दिए हैं, परंतु अनेक स्त्रातजिक विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और पाकिस्तान की संयुक्त चुनौती, जिसका संकेत 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भी देखने को मिला, भारत के सुरक्षा परिवेश को अधिक जटिल बना रही है. पाकिस्तान की 'Full Spectrum Deterrence' और सामरिक परमाणु हथियारों (Tactical Nukes) की रणनीति के सामने NFU भारत को रणनीतिक रूप से बंधक बना सकती है. चीन के साथ सीमा तनाव और उसके आधुनिक MIRV और द्वितीय प्रहारक क्षमता को देखते हुए भी कई विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल प्रतिशोध पर निर्भर नीति पर्याप्त नहीं. इसीलिए कुछ विश्लेषक 'Strategic Ambiguity' का रास्ता सुझाते हैं कि सार्वजनिक रूप से NFU बनाए रखें, लेकिन विरोधियों को यह संकेत दें कि असाधारण परिस्थितियों में भारत सभी विकल्प खुला रखेगा. हालांकि विरोधी तर्क देते हैं कि NFU छोड़ने या अस्पष्ट करने से दक्षिण एशिया में परमाणु अस्थिरता बढ़ेगी, हथियारों की दौड़ तेज होगी और संकट में गलत आकलन का खतरा अधिक हो जाएगा. भारत के लिए चुनौती यह है कि विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध बनाए रखते हुए क्षेत्रीय वास्तविकताओं के अनुरूप नीति को लचीला कैसे बनाया जाए. NFU अभी भी मजबूत है, लेकिन उसकी व्याख्या और क्रियान्वयन पर गहन पुनर्विचार की मांग बढ़ रही है.
तकनीक, AI और परमाणु युद्ध का नया खतरा
आज का परमाणु युग शीत युद्ध से अलग है. अब केवल मानव निर्णय ही नहीं बल्कि Artificial Intelligence, साइबर युद्ध और स्वचालित सैन्य प्रणालियां भी स्त्रातजिक समीकरण का हिस्सा बन चुकी हैं. यदि किसी देश की चेतावनी प्रणाली पर साइबर हमला हो जाए या AI आधारित प्रणाली गलत संकेत दे, तो परमाणु संकट उत्पन्न हो सकता है. हाइपरसोनिक मिसाइलों ने निर्णय लेने का समय भी कम कर दिया है. इससे परमाणु युद्ध का सबसे बड़ा खतरा 'जानबूझकर हमला' नहीं बल्कि 'गलती या भ्रम' बनता जा रहा है.
पोकरण परीक्षण केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं बल्कि भारत की स्त्रातजिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय संप्रभुता की स्पष्ट घोषणा भी थी. इसने यह संदेश दिया कि भारत अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं और रणनीतिक हितों का निर्णय स्वयं करने में सक्षम है. आज करीब तीन दशक बाद, विश्व एक नए और अधिक जटिल परमाणु युग की ओर बढ़ रहा है, जहां परमाणु प्रतिरोध, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, AI आधारित सैन्य प्रणालियां और क्षेत्रीय संघर्ष वैश्विक सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं. ऐसी परिस्थितियों में भारत के सामने दोहरी चुनौती है, एक ओर उसे अपनी परमाणु प्रतिरोध क्षमता को आधुनिक, विश्वसनीय और टिकाऊ बनाए रखना होगा,वहीं दूसरी ओर उसे एक जिम्मेदार और संयमित परमाणु शक्ति की अपनी छवि भी बनाए रखनी होगी.
(डिस्क्लेमर: लेखक अलीगढ़ के डीएस कॉलेज के रक्षा और स्त्रातजिक अध्ययन विभाग में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है. )














