आ गया 2026 : सुंदरता के पोस्टकार्ड से बाहर का उत्तराखंड और विकास की असली तस्वीर

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हिमांशु जोशी

उत्तराखंड को अक्सर प्राकृतिक सुंदरता, पर्यटन और आध्यात्मिक यात्रा के तौर पर पहचाना जाता है. लेकिन साल 2026 की शुरुआत में खड़े होकर जब पहाड़ और तराई में बसे गांवों और कस्बों की तरफ देखा जाता है, तो यह तस्वीर पोस्टकार्ड से बिल्कुल अलग दिखाई देती है. टनकपुर जैसे सीमावर्ती कस्बे हों या केदारनाथ के नजदीक बसा बड़ासू गांव, हर जगह विकास, रोजगार, शिक्षा, पानी और सामाजिक बदलाव की अपनी जमीनी कहानी है.

यह रिपोर्ट साल 2024 की अस्कोट–आराकोट यात्रा से मिले अनुभवों और 2025 के दौरान उत्तराखंड के अलग–अलग इलाकों में मेरे द्वारा की गई यात्राओं पर आधारित है. इसमें उन आवाज़ों को दर्ज किया गया है, जो अक्सर विकास की बड़ी योजनाओं, सरकारी आंकड़ों और पर्यटन की चमक में दब जाती हैं. यह उत्तराखंड को किसी आदर्श रूप में नहीं, बल्कि 2026 की दहलीज पर खड़े एक समाज को वास्तविक स्थिति में देखने की कोशिश है. उम्मीद यही है कि इस साल सब कुछ बदलेगा.

टनकपुर विकास की राह में पीछे क्यों छूट गया! सड़क, बाजार और मजदूरी की बदलती तस्वीर

हल्द्वानी की तरह ही टनकपुर को भी नदी-पहाड़ प्रकृति से गिफ्ट में मिले हैं, इसके बावजूद यह क्षेत्र विकास से अब तक महरूम रहा है. आइए जानते हैं टनकपुर में विकास की रफ्तार किन मोड़ों पर थम गई. ऊंचीहार उत्तर प्रदेश से सुरेश साहू के पिता रामनारायण वर्ष 1955 में रोजगार की तलाश में टनकपुर आए थे. वह टनकपुर में मजदूरी किया करते थे. सुरेश बताते हैं कि 1984 में नेपाल बॉर्डर पर पुल बनना टनकपुर के लिए एक बड़ा मोड़ था. मजदूरों, कर्मचारियों और व्यापारियों की वजह से बाजार चमका. लोगों ने घरों को किराए पर देना शुरू किया. सुरेश साहू ने भी उसी साल वीसीआर किराए पर देने और किराए की दुकान में एक सिलाई मशीन लेकर सिलाई का काम शुरू किया. 1991 में पुल का काम खत्म होते ही बाजार की गति दोबारा धीमी पड़ने लगी. 2005 में अपनी दुकान खरीदी. उनकी बेटियां आईआईटी, आईआईएम और एमसीए जैसी उच्च शिक्षा लेकर आगे बढ़ गईं लेकिन शहर का कारोबार वह प्रगति नहीं कर पाया.

सड़क की वजह से शहर का बदलता स्वरूप

सुरेश ने टनकपुर के बाजार की बुरी स्थिति के बारे में बात करते हुए आगे बताया कि टनकपुर के पास स्थित पूर्णागिरी धाम की भीड़ से कभी चैत्र नवरात्र की भीड़ से शहर भरा रहता था. बसें और यात्री टनकपुर के भीतर तक आते थे जिससे बाजार में रौनक बनी रहती थी. अब सड़कें सुधरने के बाद लोग सीधे धाम तक चले जाते हैं. शहर के अंदर तक भीड़ नहीं आती. यही स्थिति ऑल वेदर रोड की वजह से भी हुई है, पहाड़ के लिए अब रात भर गाड़ियां चलती हैं तो टनकपुर रुक कर खरीददारी कम ही लोग करते हैं.

ऑनलाइन बाजार का असर

सुरेश की सिलाई दुकान में कोरोना से पहले दस कारीगर काम करते थे. अब केवल चार रह गए हैं. इसके साथ ही ऑनलाइन खरीददारी ने स्थानीय बाजार को और कमजोर कर दिया है. सुरेश अपनी दुकान के सामने खड़े होकर आसपास की खाली पड़ी दुकानों की ओर इशारा करते हैं. वह कहते हैं कि पहले इन दुकानों में भीड़ रहती थी. आज ग्राहक ऑनलाइन खरीद लेते हैं और दुकानें खाली पड़ी रहती हैं. उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले तक रेलवे क्षेत्र में हाथ से पत्थर तोड़ने का बड़ा काम था. मजदूरों की आवाजाही रहती थी. बाद में क्रेशर लगने लगे. क्रेशर मशीनें पत्थर को तेज़ी से तोड़ देती हैं जिससे मजदूरों की जरूरत कम हो गई और यह काम लगभग खत्म हो गया.

टनकपुर से भी पलायन

सुरेश कहते हैं कि लोग पहाड़ से पलायन की बात करते हैं जबकि टनकपुर स्वयं भी पलायन की मार झेल रहा है. वह कहते हैं कि यहां युवाओं के लिए कोई रोजगार नहीं है. व्यापार करो तो भी मन में हमेशा अनिश्चितता रहती है कि यह कब तक चलेगा. युवाओं की बड़ी संख्या पढ़ाई या काम के लिए बाहर ही चली जाती है. उन्होंने यह भी बताया कि भोटिया समुदाय के दस पंद्रह परिवार कभी बाजार में टॉफी और छोटी मोटी वस्तुएँ बेचते थे. अब सिर्फ एक परिवार इस काम में बचा है.

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टनकपुर का बदलता बाजार और खेती का असर

गुलशन भी बाजार में मिले. वह अब ई रिक्शा चलाते हैं. उनका परिवार पहले टनकपुर में सब्जी उगाकर बेचता था. वह बताते हैं कि अब सब्जी बाहर से आती है. स्थानीय खेती लगभग खत्म हो गई है क्योंकि लोगों ने सब्जियों की जगह जमीन पर प्लॉटिंग कर दी है. खेती घटने से शहर की सब्जी मंडी की स्थानीय पहचान भी खत्म होती जा रही है.

पर्यटन और रेल लाइन की उम्मीद

सुरेश साहू कहते हैं कि चूका गांव तक शारदा नदी के किनारे बनने वाली सड़क को लोग पर्यटन की एक नई संभावना बताते हैं. चूका गांव का प्राकृतिक सौंदर्य और आसपास के जंगल मिलकर इसे एक छोटे पर्यटन केंद्र के रूप में पहचान दिला सकते हैं. सालों से चर्चा में टनकपुर बागेश्वर रेल लाइन भी यहाँ की सबसे बड़ी उम्मीदों में से एक है. इसका सर्वे अंग्रेजों के समय हुआ था लेकिन योजना आज भी आगे ही बढ़ती जा रही है. रेल लाइन बन जाए तो टनकपुर की रौनक वापस लौट सकती है. यात्रियों की आवाजाही बढ़ेगी और बाजार फिर चल पड़ेगा.

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मालधन चौड़ में पहाड़ के शिल्पकार समुदाय की बसावट : ढेला नदी का डर और अधूरी बुनियादी जरूरतें

इतिहासकार पद्मश्री डॉ शेखर पाठक के कहने पर मैं मालधन चौड़ पहुंचा, वह चाहते हैं कि लगभग छह दशक पहले जाति के आधार पर बसाए गए इस इलाके की मौजूदा स्थिति को दर्ज किया जाए. उत्तराखंड में काशीपुर और रामनगर से लगभग 20 किलोमीटर स्थित मालधन चौड़ साल 1966-67 में  पहाड़ के शिल्पकार समुदाय को बसाया गया था. आज भी यह इलाका ढेला नदी के कटाव, बाढ़ के इतिहास, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और वन ग्रामों की उपेक्षा से जूझ रहा है. यह रिपोर्ट स्थानीय निवासियों कमला, मोहनलाल आर्य, महेश चंद्र की बातचीत पर आधारित है.

पुरानी बस्ती की कमला : लड़कियों की पढ़ाई, महिलाओं की सेहत,  बदले हुए सामाजिक तौर-तरीके

कमला पुरानी बस्ती की रहने वाली हैं. उनकी शादी भी यहीं हुई. वह बताती हैं कि पहले यहां लड़कियों की शादी 14 और 15 साल में कर देते थे. अब शादी 18 साल के बाद होती है. उनकी उम्र करीब 40 से 45 वर्ष है. कमला कहती हैं कि लड़कियों के लिए पढ़ाई का माहौल पूरी तरह बदला है. अब लड़कियां इंटर कॉलेज तक जाती हैं. कई ग्रेजुएशन कर रही हैं. पहले जंगल और स्कूल दूर के कारण पढ़ाई छूट जाती थी. महिलाओं की सेहत पर वह बताती हैं कि मालधन चौड़ के अस्पताल में लेडी डॉक्टर तो है. लेकिन कई वर्षों तक एक्स रे और ब्लड टेस्ट जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं. कैंसर और महिलाओं से जुड़ी बीमारियों के बारे में जागरूकता पहले बहुत कम थी. अब धीरे-धीरे बढ़ रही है. कई बार इलाज के लिए काशीपुर जाना पड़ता था.

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कमला कहती हैं कि गरीब परिवारों में महिला समूह ने कुछ मदद दी है. लेकिन कई सरकारी योजनाएं वन ग्रामों तक अब भी पहुंच नहीं सकीं हैं. सामाजिक बदलावों का जिक्र करते हुए वह कहती हैं कि पहले पीरियड और प्रसूति के बाद महिलाओं को कुछ दिनों तक अलग रखा जाता था. अब यह प्रचलन लगभग खत्म है. पैड का इस्तेमाल बढ़ा है, कपड़े का प्रयोग कम हुआ है. मेंस्ट्रुअल कप की जानकारी यहां की महिलाओं को कम ही है. जाति को लेकर कमला बताती हैं कि पूरी बस्ती शिल्पकार समुदाय की है. इसलिए जातिगत तनाव नहीं है.

मोहनलाल आर्य : कैसे बसा मालधन चौड़ और बदलती ढेला नदी

मोहनलाल आर्य, ग्रामसभा आनन्द नगर  के निवासी हैं. रिटायर्ड पोस्टमास्टर मोहनलाल कहते हैं कि मालधन चौड़ साल 1966 और 1967 में बसाया गया. उस समय ढेला नदी केवल लगभग 50 फीट चौड़ी थी और आज यह कटाव बढ़कर लगभग एक किलोमीटर तक फैल गया है. उन्होंने बताया शुरुआत में चंद्रनगर, मालधनचौड़ नंबर दो, गांधी नगर नंबर तीन सहित सात गांव बसाए गए थे और बाद में बाढ़ से विस्थापित लोगों के लिए नथावली और पटरानी जैसे वन ग्राम बने. मोहनलाल बताते हैं कि स्वर्गीय खुशीराम शिल्पकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के निर्णय के बाद पहाड़ के शिल्पकार समुदाय को यहां बसने का अवसर मिला और हर परिवार को पांच एकड़ जमीन, दो बैल मिले और हल मिला.  मोहनलाल कहते हैं आनन्द नगर और देवीपुरा में खेती की जमीन ढेला नदी से कटते गई और अब पूरी तरह रेत से भर गई है. उन्होंने कहा साल 1978 की बाढ़ में गांव के कई जानवर मर गए और कुछ बच्चे भी बहे. अफसरों ने तब गांव वालों को ऊंची जगहों पर जाने के लिए कहा. नथावली और पटरानी जैसे नए गांव जंगल के बीच बसाए गए और आज वहां ऐसे दस से बारह वन ग्राम हैं. बाढ़ से प्रभावित परिवारों को तब जमीन देने का आश्वासन मिला था लेकिन आज तक वह जमीन नहीं मिली, वन ग्राम की जमीन पट्टे पर नहीं है. ढेला नदी को लेकर मोहनलाल चिंतित हैं. उनका कहना है कि नदी लगातार रास्ता बदल रही है. बारिश में यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कटाव अगली बार किस दिशा में जाएगा. वो कहते हैं तुमरिया बांध भर जाता है तो फाटक खोलने पर नदी की तेज धारा सीधे गांवों की ओर आती है और बड़ा नुकसान करती है. सबसे ज्यादा नुकसान गोपालनगर गांव में हो रहा है.

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क्षेत्र में पर्यटन की संभावना तो वन ग्रामों की सबसे बड़ी मुश्किल सड़क

महेश चंद्र देवीपुरा गांव के निवासी हैं. वह मालधन चौड़ में टू व्हीलर सर्विस और होंडा एजेंसी चलाते हैं. महेश कहते हैं कि मालधन चौड़ में सरकारी नौकरी वाले पांच प्रतिशत से भी कम लोग हैं. तुमरिया बांध को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए तो यहां नैनीताल जैसा पर्यटन विकसित हो सकता है. उन्होंने कहा यह क्षेत्र जिम कॉर्बेट पार्क से जुड़ा हुआ है और अत्यधिक सुंदर है लेकिन इसकी पब्लिसिटी नहीं की गई. अपनी बात समाप्त करते महेश कहते हैं कि मुख्य गांव में तो सड़क और लाइट की स्थिति बेहतर है. लेकिन वन ग्रामों में हालत बेहद खराब है, नथावली, पटरानी जैसे गांवों में बच्चों का स्कूल जाना, चक्की तक पहुंचना और पानी लाना आज भी बड़ी चुनौती है. हाथियों और जंगली जानवरों का डर हमेशा रहता है. यहां स्थित मिलिट्री की लगभग तीन हजार एकड़ जमीन पर कोई उद्योग या फैक्ट्री लग जाए तो रोजगार के लिए जूझ रहे बीए और बारहवीं पास युवाओं के लिए रोजगार की संभावनाएं खुल जाएगी.

केदारनाथ के नजदीक बड़ासू गांव. यात्रा पर टिकी रोजी, पानी का संकट और टूटा ढांचा

रुद्रप्रयाग जिले के उखीमठ ब्लॉक में स्थित बड़ासू गांव केदारनाथ धाम के नजदीक है. लगभग बारह सौ की आबादी वाला यह गांव खेती से निकलकर अब पूरी तरह केदारनाथ यात्रा पर निर्भर हो चुका है. सड़क से करीब आठ सौ मीटर दूर बसे इस गांव के सामने आजीविका, शिक्षा, पानी और आपदा से जुड़े सवाल आज भी जस के तस हैं.

आबादी, खेती और बदलती आजीविका

बड़ासू गांव में करीब 180 परिवार रहते हैं. एक घर में औसतन तीन कमरे हैं. गांव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कभी कृषि था, लेकिन बंदर और सुअर की बढ़ती समस्या ने खेती को लगभग नुकसानदेह बना दिया है. यहां गेहूं और धान की खेती होती है. सर्दियों में हल्की बर्फ भी गिरती है, जिससे खेती का समय सीमित हो जाता है. गांव के नरेंद्र सिंह बर्तवाल का होटल राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही है, अपने होटल में वह बताते हैं कि बड़ासू में लगभग सभी लोग सामान्य जाति से हैं. खेती से आय घटने के बाद गांव के लोगों की निर्भरता केदारनाथ यात्रा पर बढ़ गई है. कई ग्रामीणों ने सड़क किनारे होटल बनाए हैं, जिन्हें चार से पांच लाख रुपये में लीज पर दिया जाता है. इनमें हर साल एक से दो लाख रुपये तक का खर्च सिर्फ मेंटिनेंस में चला जाता है. कई परिवार घोड़े-खच्चरों के व्यवसाय से भी जुड़े हैं. एक व्यक्ति के पास तीन से चार घोड़े तक हैं. एक जोड़ी घोड़े की कीमत चार से छह लाख रुपये तक होती है. ये घोड़े नजीबाबाद से मंगाए जाते हैं. घोड़े को खिलाने और नेपाली मजदूर को भुगतान करने के बाद साल भर में एक घोड़े से लगभग एक लाख रुपये की बचत होती है. हालांकि घोड़ों के लिए घास लाने में जोखिम भी है और कई बार महिलाएं पहाड़ियों से फिसलकर गिर जाती हैं.

शिक्षा, स्वास्थ्य और पानी की दिक्कत

नरेंद्र सिंह बताते हैं कि गांव में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति कमजोर है. गांव में केवल प्राइमरी स्कूल है. इसके बाद हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए बच्चों को लगभग सात किलोमीटर दूर फाटा जाना पड़ता है. क्षेत्र के लगभग हर गांव में यही स्थिति है कि पढ़ाई के लिए चार से पांच किलोमीटर दूर जाना मजबूरी है. आठवीं के बाद खर्च वहन न कर पाने की वजह से कई लड़के और लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है. यह पलायन का एक बड़ा कारण भी बनता है. लोग अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए गांव छोड़कर बाहर चले जाते हैं. स्वास्थ्य सेवाओं के लिए श्रीनगर अस्पताल सबसे नजदीक है, जो लगभग अस्सी किलोमीटर दूर पड़ता है. गांव में पानी की समस्या लगातार बनी रहती है. घरों में शौचालय बने हैं, लेकिन पाइपलाइन बार-बार टूटने से पानी की नियमित आपूर्ति नहीं हो पाती. गांव के नीचे नदी बहती है, जिससे जलाने की लकड़ी तो मिल जाती है, लेकिन पीने के पानी का संकट बना रहता है. महिलाओं की स्थिति भी आसान नहीं है. परंपरा के अनुसार पीरियड्स के दौरान अब भी कई महिलाओं को घर से बाहर नहाना पड़ता है, क्योंकि उन दिनों घर में बने बाथरूम का उपयोग वर्जित माना जाता है.

आपदा की यादें और टूटता बुनियादी ढांचा

साल 2013 में आई केदारनाथ आपदा से बड़ासू गांव भी गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था. नरेंद्र सिंह बर्तवाल ने इस विषय पर बात करते हुए कहा कि उस आपदा में गांव के 24 से 25 लोगों की मौत हुई थी. कई बच्चे घोड़ों के साथ केदारनाथ यात्रा पर जाते थे, इस वजह से मरने वालों में बच्चों की संख्या ज्यादा थी. आपदा के दौरान गांव की पुरानी सीढ़ियां पूरी तरह टूट गईं. आज भी गांव के भीतर आने-जाने के रास्ते पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए हैं. ऊपर राष्ट्रीय राजमार्ग का काम चल रहा है और उसका मलबा नीचे गांव की ओर गिरता रहता है, जिससे पहले से खराब रास्ते और ज्यादा बिगड़ गए हैं. केदारनाथ यात्रा से जुड़ी उम्मीदों के बावजूद बड़ासू गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं, सुरक्षित रास्तों और स्थायी आजीविका के इंतजार में खड़ा है. पूरे साल में सिर्फ दो महीने ऐसे होते हैं, जब केदारनाथ यात्रा के दौरान कुछ कमाई और हलचल होती है. बाकी समय गांव का जीवन सीमित संसाधनों और अनिश्चित आय पर टिका रहता है.

मोरी में गुज्जर समुदाय के कुछ परिवार, पशुपालन मुख्य आय और एक सामाजिक नियम है कमाल

उत्तरकाशी जिले के मोरी ब्लॉक में रास्ते से गुजरते हुए सांद्रा गांव में गुज्जर समुदाय के तीन से चार परिवार रहते हैं. इस डिजिटल दौर में अब गुज्जर भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं. उनके कुछ सामाजिक नियम महिलाओं के लिए लाभकारी भी हैं.

रहन-सहन, आय और शिक्षा

सांद्रा गांव में सड़क के किनारे तीन - चार गुज्जर परिवार पट्टे पर मिली जमीन में लकड़ी और टिन से बनी झोपड़ियों में रहते हैं, उनके घरों के पास ही पंद्रह से बीस गाय और भैंस बंधी देखी. घर की महिलाओं में से एक जुबैदा बताती हैं कि दूध बेचकर परिवार की आय होती है और दूध नजदीक ही मोरी के बाजार में बिक जाता है. वहीं खड़े कुतुबद्दीन कहते हैं कि अब महीने में आठ से दस हजार रुपए की कमाई वाले दूध के कारोबार पर निर्भर रहना मुश्किल हो रहा है इसलिए वह गाड़ी चलाने का काम भी कर रहे हैं. बाकी कुछ परिवार अब भी सिर्फ पशुपालन पर निर्भर हैं. पहली पीढ़ी खासकर महिलाएं स्कूल नहीं गईं लेकिन अब बच्चे पढ़ रहे हैं, प्राथमिक स्कूल पास में ही है. जुबैदा ने बताया कि नजदीक गांवों में रहने वाले समुदाय के कुछ लड़के कॉलेज भी पढ़ रहे हैं. आधार और राशन कार्ड सबके बने हैं और वे मोरी पते पर दर्ज हैं.

स्वास्थ्य सेवाओं की समस्या लेकिन सामाजिक नियम कमाल के

जुबैदा ने बताया कि क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधा सीमित है और ज्यादातर प्रसव घरों में होते हैं. माहवारी को लेकर पारंपरिक मान्यताएं अब भी कायम हैं पर यह महिलाओं के लिए फायदे की ही हैं. समुदाय की महिलाओं को माहवारी के दौरान कहीं चार दिन तो कहीं दस-पंद्रह दिन तक सामान्य कामों से दूर रखा जाता है और इस समय खाना भी पुरुष बनाते हैं. परिवार इस अवधि को महिलाओं के आराम करने का समय और जरूरी परंपरा मानते हैं. प्रसव के बाद तो महिलाओं की यह छुट्टी तीस से चालीस दिन लंबी हो जाती है. कुछ गुज्जर महिलाएं अब सैनिटरी पैड इस्तेमाल करती हैं लेकिन कई अभी भी कपड़ा उपयोग करती हैं. जुबैदा का कहना है कि आंगनवाड़ी से उन्हें न पैड मिलता है और न बच्चों का पोषण राशन. शिकायत करने के बावजूद कोई बदलाव नहीं हुआ है. परिवारों के पास टीवी और फ्रिज नहीं है पर मोबाइल अब लगभग सभी के पास है और युवा व्हाट्सऐप चला लेते हैं. उन्होंने आगे बताया कि शौचालय तो पक्के हैं लेकिन पानी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो पाती.

पंचायत सहभागिता और योजनाओं तक पहुंच

कुतुबद्दीन कहते हैं कि ग्रामसभा की बैठकों में समुदाय की उपस्थिति कम है और उन्हें बैठकों की जानकारी भी नहीं मिलती. पंचायत रजिस्टर में नाम दर्ज होने के बावजूद योजनाओं का लाभ उनके लिए सीमित ही है और सरकारी सुविधाएं कागज तक सीमित हैं. इसके बावजूद समुदाय को बदलाव महसूस हो रहा है. बच्चों की शिक्षा, मोबाइल तकनीक और सरकारी पहचान पत्रों ने उनके जीवन को नई दिशा दी है. कुतुबद्दीन का मानना है कि अगर योजनाएं जमीन तक पहुंचीं तो आने वाली पीढ़ी का जीवन मौजूदा स्थिति से कहीं बेहतर हो सकता है.

त्यूणी : बदलते पहाड़ की जमीनी सच्चाई

देहरादून जिले के सीमांत इलाके त्यूणी में बाजार भले छोटा हो, लेकिन आसपास के 22 से 30 गांवों की ज़रूरतें इसी पर टिकी हैं. हिमाचल की चार से पांच पंचायतों और उत्तराखंड की करीब 26 पंचायतों का आवागमन यहां होता है. यहां आने वाले लोग आम पर्यटक नहीं बल्कि मुख्य रूप से महासू देवता के दर्शन के लिए आते हैं, इसलिए व्यापार स्थानीय मांग पर आधारित है. स्थानीय मान्यता के मुताबिक महासू देवता चार भाई थे और सेडकुलिया महाराज उनके वजीर थे. लोककथाएं और धार्मिक विश्वास आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में प्रमुख हैं. त्यूणी में नेपाली मूल की आबादी बड़ी है. रायगी गांव के रहने वाले किशन प्रसाद पिछले आठ साल से यहां दुकान चला रहे हैं, वह बताते हैं कि उनके पूर्वज 1922 में नेपाल से यहां आए थे और तब से उनकी तीसरी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है. फिर भी कुछ लोग उन्हें आज भी बाहरी मानते हैं. वह कहते हैं कि कुछ गांवों के मंदिरों में दलित समुदाय का प्रवेश अब भी प्रतिबंधित है, हालांकि नई पीढ़ी इस परंपरा को बदलने की सोच रखती है.

शिक्षा मौजूद लेकिन उच्च पढ़ाई के लिए देहरादून ही विकल्प

किशन ने बताया कि त्यूणी में सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूल हैं. एक डिग्री कॉलेज भी है, लेकिन बेहतर विकल्पों और संसाधनों की कमी के कारण उच्च शिक्षा के लिए छात्र अब भी देहरादून जाना चुनते हैं. स्थानीय बोली और भाषा अब भी परिवारों में जिंदा है और उसके साथ ही पारंपरिक जीवनशैली भी बनी हुई है. स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो प्राथमिक उपचार और छोटे ऑपरेशन यहां हो जाते हैं, लेकिन गंभीर बीमारियों में मरीजों को रोड़ू, देहरादून या शिमला भेजना पड़ता है.

बदलता बाजार और डिजिटल भुगतान की बढ़ती भूमिका

त्यूणी का बाजार पहले लकड़ी की दुकानों के लिए जाना जाता था. साल 2005 में अग्निकांड में कई दुकानें जलने के बाद बाजार का स्वरूप बदला और अब पक्की दुकानों की संख्या बढ़ गई है. दो साल से कपड़ों का कारोबार करने वाले मनोज शर्मा कहते हैं कि क्षेत्र में ऑनलाइन शॉपिंग का असर अभी सीमित है, लेकिन यूपीआई भुगतान तेजी से बढ़ा है. त्यूणी का बाजार मछली, सेब और टमाटर के लिए लोकप्रिय है. पास से बहने वाली टौंस और पब्बर नदी की मछली यहां की पहचान मानी जाती है.

महिलाएं, रोजगार और बदलता सामाजिक ढांचा

किशन प्रसाद की बेटी भी दुकान में ही थीं, उन्होंने बताया कि त्यूणी में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है. लड़कियां टेलरिंग और हस्तशिल्प सीख रही हैं और एक दुकान में पांच से छह महिलाएं नियमित सिलाई का काम कर रही हैं. उन्होंने आगे बताया कि अब महिलाएं पीरियड्स के दौरान सैनिटरी पैड का इस्तेमाल कर रही हैं. बड़ी उम्र की महिलाएं अभी भी मोबाइल एप और यूपीआई भुगतान का इस्तेमाल कम करती हैं. यहां कई पारंपरिक मान्यताएं अभी भी कायम हैं. जैसे प्रसव के बाद महिलाओं को 22 दिन तक अलग रखने की प्रथा कई घरों में जारी है, लेकिन नई पीढ़ी इसे लेकर सवाल करने लगी है.

पोरा गांव में 21–22 में बना भव्य मंदिर, गांव में पढ़ाई लिखाई का माहौल

उत्तरकाशी जिले के रामासिराई क्षेत्र का पोरा गांव अपनी सामाजिक संरचना, शिक्षा और खेती के लिए पहचाना जाता है. गांव की आबादी करीब 1200 है और सरकारी नौकरी में लगभग 50 लोग कार्यरत हैं. यहां स्वर्ण और दलित जाति के परिवार साथ रहते हैं. घरों में आपसी आना जाना है, केवल खाने को लेकर परहेज रखा जाता है. गांव में एक ही गोत्र में विवाह नहीं होता और शादियां पोरा के साथ साथ भाबर क्षेत्र में भी होती हैं. गांव में सबसे खास बात इसमें बना भव्य मंदिर है.

डोडा कश्मीरा से आए देवता, गांव में बना भव्य मंदिर

पोरा गांव के लोकदेवता डोडा कश्मीरा माने जाते हैं. स्थानीय मान्यता के अनुसार देवता डोडा कश्मीरा क्षेत्र से यहां आए थे, कुछ लोगों का ये मानना भी है कि डुंडा होने के कारण यह गोठा महाराज का रूप भी हैं. पहले यहां छोटा लकड़ी का मंदिर था, जिसे समय समय पर बदला गया. वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण वर्ष 2021–22 में हुआ. हर साल 4 अगस्त से 7 अगस्त तक क्षेत्र में मेला लगता है, जिसमें आसपास के कुछ गांवों के लोग शामिल होते हैं. रामा गांव में शुरू होकर यह मेला पोरा में 7 अगस्त को लगता है. मेले में पारंपरिक पूजा, नृत्य और लोकगीत होते हैं. यह आयोजन पूरे क्षेत्र का सामूहिक धार्मिक उत्सव माना जाता है.

स्कूल गांव के पास, डिग्री कॉलेज के लिए पुरोला जाना मजबूरी

पोरा गांव में प्राइमरी स्कूल की सुविधा है. इंटर कॉलेज गुंदियाट और मोलताड़ी में है. डिग्री कॉलेज के लिए छात्रों को पुरोला जाना पड़ता है. गांव की युवती प्रविता बताती हैं कि गांव की लगभग सभी लड़कियां पढ़ाई कर रही हैं और परिवार अब बेटियों की शिक्षा को लेकर सजग हैं. उच्च शिक्षा के लिए कुछ युवा बाहर जाते हैं, लेकिन बुनियादी पढ़ाई गांव और आसपास ही हो जाती है.

महिलाएं समूह से जुड़ीं, एनजीओ सक्रिय, फ्रूट जाम और पिरुल से उत्पाद

पोरा गांव में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं और एक एनजीओ भी सक्रिय है. महिलाएं फ्रूट जाम बनाती हैं और पिरुल से भी कुछ उत्पाद तैयार किए जाते हैं. इससे गांव में सीमित स्तर पर रोजगार के अवसर बने हैं. प्रविता बताती हैं कि गांव की महिलाएं मोबाइल और सोशल मीडिया का उपयोग कर रही हैं. मम्मियां भी फेसबुक और इंस्टाग्राम चलाती हैं, हालांकि रोजगार से जुड़े किसी एप का उपयोग फिलहाल नहीं हो रहा.

गांव के सामाजिक नियम, शिक्षा और खेती पर एक नजर

गांव में परंपरा के अनुसार पीरियड्स के दौरान विवाहित महिलाएं किचन और पूजा में नहीं जातीं. सामाजिक रूप से गांव में शांति बनी हुई है. कुछ साल पहले पुरोला में हिंदू मुस्लिम तनाव हुआ था, लेकिन अब वहां स्थिति सामान्य है. यहां शादियां आसपास के गांवों और भाबर क्षेत्र में होती हैं. दलित समाज में दूसरी जाति में शादी होने पर कई बार परिवार को बहिष्कार का सामना करना पड़ता है.

खेती में लाल चावल प्रमुख फसल है, जिसे हिमाचल प्रदेश तक भेजा जाता है. गांव के लोग बताते हैं कि पहले मोटे अनाज का भाव नहीं मिलता था, लेकिन अब स्थिति कुछ बेहतर हुई है. प्रविता के अनुसार उनके दादा खिलानंद बिल्जवाण क्षेत्र के शुरुआती शिक्षित लोगों में शामिल रहे हैं. उनकी कुछ किताबें भी प्रकाशित हुई थीं, उनके समय में आठवीं से परीक्षा देने चकराता जाना पड़ता था और क्षेत्र में स्कूल भी कम थे इसलिए उन्होंने आगे की पढ़ाई चकराता से पूरी की. रिटायर्ड लेक्चरर डॉक्टर राधे श्याम बिल्जवाण की दो किताबें ‘मध्य हिमालय की रियासत में ग्रामीण जनसंघर्षों का इतिहास' और ‘ये वक्त की पुकार है' इन्हीं दिनों आई हैं, वह कहते हैं कि पोरा में पढ़ाई लिखाई का अच्छा माहौल है और गांव के कई युवा वर्तमान में महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर नियुक्त भी हैं.

नंदगांव में खेती से पर्यटन तक का सफर, बुजुर्गों की स्मृतियों और युवाओं की उम्मीदों के बीच गांव

उत्तरकाशी जिले के नौगांव ब्लॉक में स्थित नंदगांव बीते कुछ वर्षों में तेजी से बदला है. यह गांव नौगांव नगर पंचायत से करीब 12 किलोमीटर, उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से लगभग 135 किलोमीटर और देहरादून से करीब 185 से 190 किलोमीटर दूर है. कभी पूरी तरह खेती पर निर्भर रहा नंदगांव अब पर्यटन, होटल और रिजॉर्ट के जरिए नई पहचान बना रहा है. गांव में आज करीब 250 से 300 परिवार रहते हैं और स्थानीय लोगों के अनुसार यहां से पलायन अपेक्षाकृत कम है. ग्रामीणों का कहना है कि गांव में सड़क और पानी की सुविधा मौजूद है और सीमित ही सही लेकिन रोजगार के कुछ अवसर भी हैं. इसी वजह से सेना, पुलिस और अन्य सरकारी सेवाओं में कार्यरत कई परिवार आज भी गांव में ही रहना पसंद कर रहे हैं. गांव के लगभग हर दूसरे परिवार से कोई न कोई सदस्य सरकारी नौकरी में है.

खेती से होटल तक, मनोज बिष्ट की पहल और बढ़ता पर्यटन

नंदगांव के निवासी मनोज बिष्ट बताते हैं कि उन्होंने करीब एक साल पहले अपनी ही जमीन पर होटल और पर्यटन से जुड़ा काम शुरू किया. इससे पहले वह पूरी तरह खेती पर निर्भर थे. उनका कहना है कि यह काम इसी पर्यटन सीजन से ठीक तरह से शुरू हुआ है और अब धीरे-धीरे बाहर से लोग यहां आने लगे हैं. मनोज बिष्ट के मुताबिक नंदगांव में अब करीब 15 से 20 रिजॉर्ट और होटल बन चुके हैं. इससे गांव के युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल रहा है और खेती के अलावा आजीविका का एक नया विकल्प सामने आया है. हालांकि वह यह भी कहते हैं कि पर्यटन से आय स्थायी होगी या नहीं, यह पूरी तरह आने वाले समय पर निर्भर करता है.

बुजुर्गों की स्मृतियों में पुराना नंदगांव, कम घर और ज्यादा खेती

गांव की 76 वर्षीय बुजुर्ग महिला कमला बिष्ट बताती हैं कि पहले नंदगांव में बहुत कम घर हुआ करते थे. उनके अनुसार उस समय करीब सौ के आसपास मकान थे, जबकि आज गांव काफी फैल चुका है. पहले ऊपर पहाड़ से लेकर नीचे सड़क तक ज्यादातर जमीन खेती के काम आती थी. कमला बिष्ट कहती हैं कि धान, गेहूं और राजमा की खेती खूब होती थी. अब हालात बदल गए हैं और बड़ी संख्या में खेत बंजर हो चुके हैं. बच्चे पढ़ लिखकर बाहर निकल गए हैं और गांव में अब ज्यादातर बुजुर्ग ही रह गए हैं. उन्होंने बताया कि उनका खुद का सेब का बगीचा भी था, लेकिन मेहनत ज्यादा और कमाई कम होने के कारण अब उन्होंने वह बगीचा छोड़ दिया है.
 

कोटि बनाल शैली के घर और जंगल से टूटता रिश्ता

कमला बिष्ट बताती हैं कि पहले गांव के घर कोटि बनाल शैली में बनाए जाते थे और घरों के फर्नीचर में देवदार की लकड़ी का इस्तेमाल आम था. वन कानूनों में बदलाव के बाद अब लकड़ी आसानी से उपलब्ध नहीं होती, इसी वजह से इस तरह के पारंपरिक घर बनना लगभग बंद हो गया है. उनका कहना है कि लोगों का जंगल से जुड़ाव भी पहले जैसा नहीं रहा है और जंगल में आग जैसी घटनाओं के समय सामूहिक भागीदारी भी कम हुई है.

शिक्षा गांव में सीमित, बाहर जाना मजबूरी

नंदगांव में प्राथमिक शिक्षा की सुविधा है, लेकिन पांचवीं के बाद बच्चों को पढ़ाई के लिए इसी ग्राम सभा क्षेत्र में आने वाले गंगनानी गांव जाना पड़ता है. पैदल रास्ते से यह दूरी करीब डेढ़ किलोमीटर है. गांव में डिग्री कॉलेज नहीं है. इसके लिए छात्रों को तटाओ गांव जाना पड़ता है. उच्च शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में युवा उत्तरकाशी और देहरादून का रुख करते हैं.

स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित, बड़कोट और देहरादून पर निर्भरता

नंदगांव में छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज आसपास और बड़कोट अस्पताल में हो जाता है, लेकिन गंभीर बीमारी और प्रसव के मामलों में लोगों को आज भी बड़कोट या देहरादून जाना पड़ता है. गांव के युवा सिद्धांत बिष्ट देहरादून में रहकर नीट की तैयारी कर रहे हैं, वह बताते हैं कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों को देहरादून पहुंचाने में साढ़े चार से पांच घंटे तक का समय लग जाता है. कमला बिष्ट कहती हैं कि पहले अस्पताल की सुविधा न होने के कारण गांव में गर्भवती महिलाओं की मौतें आम थीं. उन्होंने अपने जीवन में 20 से 25 ऐसे मामले देखे हैं. अब स्थिति पहले से बेहतर जरूर हुई है और सामान्य डिलीवरी तथा ऑपरेशन पास के अस्पतालों में हो जाते हैं, लेकिन जटिल मामलों में आज भी देहरादून जाना मजबूरी है.

परंपराएं, सामाजिक रिवाज और बदलती सोच

सिद्धांत बताते हैं कि गांव में एक खास सामाजिक रिवाज आज भी निभाया जाता है. किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर गांव के हर परिवार से एक व्यक्ति मुंडन कराता है. वह यह भी बताते हैं कि गांव के लगभग हर दूसरे परिवार से कोई न कोई सदस्य सरकारी नौकरी में है. कमला बिष्ट के अनुसार महिलाओं की स्थिति में भी समय के साथ बदलाव आया है. वह खुद सदरी, कमीज और धोती पहनती हैं, जबकि नई पीढ़ी की महिलाएं अब सूट, जींस, धोती या साड़ी पहन रही हैं. परंपराएं अब भी मौजूद हैं, लेकिन उनमें पहले जैसी सख्ती नहीं रही. उन्होंने बताया कि पीरियड्स के दौरान महिलाओं को सात दिन तक पूजा और धार्मिक कार्यों से दूर रखा जाता है, लेकिन अन्य किसी तरह के प्रतिबंध नहीं लगाए जाते. वहीं बच्चे के जन्म के बाद महिला को 21 दिन तक अलग रखा जाता है.

जलवायु परिवर्तन और खेती पर संकट

कमला बिष्ट कहती हैं कि पिछले एक-दो साल से गर्मी बेतहाशा बढ़ी है. अपने 75–76 साल के जीवन में उन्होंने ऐसी गर्मी पहले कभी नहीं देखी. इसका सीधा असर खेती पर पड़ा है. धान, गेहूं और राजमा जैसी फसलें जो पहले खूब होती थीं, अब बहुत कम हो रही हैं. पानी की कमी और मौसम के बदलते मिजाज ने खेती और पशुपालन दोनों को प्रभावित किया है.

ईशाली गांव में सिंचाई ठप, सड़क अधूरी और सेब पर टिकी अर्थव्यवस्था

उत्तरकाशी जिले का ईशाली गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है. गांव की खेती, स्वास्थ्य और बाजार तक पहुंच सीधे तौर पर सड़क और सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर है. स्थानीय लोगों के मुताबिक पलायन यहां कम है, लेकिन खेती लगभग खत्म होने की कगार पर है और बागवानी ही मुख्य सहारा बन चुकी है.

आराकोट से आने वाली नहर क्षतिग्रस्त, खेती पर गहरा असर

ईशाली के निवासी सुरेन्द्र बताते हैं कि लगभग दो किलोमीटर आराकोट से आने वाली नहर पूरी तरह गांव के आसपास क्षतिग्रस्त हो चुकी है. इस नहर से ही गांव की सिंचाई होती थी, लेकिन अब इसके टूटने से खेती पर बेहद नकारात्मक असर पड़ा है. सुरेन्द्र के मुताबिक नहर के ऊपर सड़क निर्माण के दौरान गिरने वाला मलबा भी इसके क्षतिग्रस्त होने का बड़ा कारण है. वह कहते हैं कि पहले हालात बिल्कुल अलग थे. हम 12 महीने अपना अनाज खाते थे. साल 1993 के आसपास हमारे पास 40 बोरी धान होता था, लेकिन अब एक भी नहीं है. नहर खराब होने के बाद खेत बंजर हो गए और अनाज उत्पादन लगभग समाप्त हो गया.

आराकोट थुनारा मोटर मार्ग अधूरा, सेब बिक्री और एंबुलेंस दोनों प्रभावित

स्थानीय निवासी कृपाल बताते हैं कि आराकोट से थुनारा को जोड़ने वाला मोटर मार्ग कई सालों से अधूरा पड़ा है. यह सड़क अलग अलग विभागों में बंटी होने की वजह से आज तक पूरी नहीं हो पाई है. उनका कहना है कि अगर यह मार्ग बन जाता है तो गांव की तस्वीर बदल सकती है. कृपाल के अनुसार ईशाली और आसपास के गांवों में हर सीजन करीब 50 हजार पेटी सेब का उत्पादन होता है. सड़क पूरी न होने की वजह से सेब को बाजार तक पहुंचाने में परेशानी होती है. सड़क बनने से न केवल सेब की बिक्री आसान होगी, बल्कि एंबुलेंस की पहुंच भी गांव तक हो सकेगी, जो अभी बड़ी चुनौती है.

शिक्षा और इलाज के लिए बाहर जाना मजबूरी

गांव की निवासी रोहिला राणा बताती हैं कि ईशाली के बच्चे पढ़ाई के लिए आराकोट जाते हैं. डिग्री कॉलेज के लिए छात्रों को त्यूणी जाना पड़ता है. शिक्षा की बुनियादी सुविधा आसपास है, लेकिन उच्च शिक्षा के विकल्प सीमित हैं. स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर रोहिला राणा कहती हैं कि छोटी मोटी बीमारियों का इलाज त्यूणी और आराकोट के अस्पतालों में हो जाता है. लेकिन गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीजों को हिमाचल के रोहड़ू या फिर देहरादून ले जाना पड़ता है, जिसमें समय और पैसे दोनों की समस्या आती है.

जातिवाद लगभग नहीं, महिलाओं को लेकर सोच में बदलाव

स्थानीय लोगों के अनुसार ईशाली गांव में जातिवाद न के बराबर है. सुरेन्द्र और कृपाल दोनों का कहना है कि गांव में जाति को लेकर कोई बड़ा भेदभाव देखने को नहीं मिलता. रोहिला राणा बताती हैं कि महिलाओं को लेकर सामाजिक सोच में भी बदलाव आया है. वह कहती हैं कि अब पीरियड्स के दौरान महिलाओं को अलग रखने की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है. बच्चा होने के बाद महिलाओं को 15 से 20 दिन तक आराम दिया जाता है और परिवार उनका सहयोग करता है.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है)

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