नक्सलवाद का अंत और 'हजार चौरासी की मां' की चेतावनी, जिस पर सरकार को ध्यान देना होगा

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विवेक शुक्ल

नरेंद्र मोदी सरकार की देश से नक्सलवाद के खत्म करने को लेकर 31 मार्च की डेडलाइन दी है. इससे एक दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में नक्सलवाद पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि ये नरेंद्र मोदी की सरकार है, जो भी हथियार उठाएगा, उसे खत्म कर दिया जाएगा. अमित शाह पहले कई बार कह चुके हैं कि 31 मार्च 2026, देश से नक्सलवाद के अंत की तारीख होगी.लेकिन सवाल उठता है क्या यह समाप्ति सच्ची और स्थायी होगी? या फिर यह 1970 के दशक की तरह एक दमनकारी अभियान का नया रूप है, जिसकी गहराई को महाश्वेता देवी ने अपने उपन्यास 'हजार चौरासी की मां' में बताया था. 

कब लिखा गया था उपन्यास 'हजार चौरासी की मां'

महाश्वेता देवी का 1974 में आया उपन्यास'हजार चौरासी की मां' नक्सलवादी आंदोलन के उस चरम काल पर आधारित है जब पश्चिम बंगाल में युवा क्रांतिकारी 'वर्ग ' के खात्मे की मुहिम चला रहे थे. अगर आपने उपन्यास को पढ़ा होगा तो आपको याद होगा कि इस उपन्यास में नायिका सुजाता एक मध्यमवर्गीय  महिला है. वह कामकाजी महिला है. वो एक दिन सुबह उठती है और तो उसे पता चलता है कि उसका बेटा ब्रती, जिसे अब मात्र 'लाश नंबर 1084' कहा जा रहा है पुलिस एन्काउंटर में मारा गया है. ब्रती नक्सलवादी था, लेकिन परिवार के लिए वह 'गुमराह' युवा था.

महाश्वेता देवी का उपन्यास सुजाता की आंतरिक यात्रा है. एक ओर वह अपने बेटे की मौत की सच्चाई जानने की कोशिश करती है, दूसरी ओर पूरे मध्यमवर्गीय समाज, पुलिस व्यवस्था और राज्य की दोमुंही नीति को देखती है. महाश्वेता देवी ने यह उपन्यास नक्सल आंदोलन के दौरान लिखा था. यह वह दौर था जब सैकड़ों युवा 'एन्काउंटर' का शिकार बने थे. यह कोई रोमांचक क्रांतिकारी कहानी नहीं है; यह एक मां की पीड़ा, एक वर्ग की उदासीनता और एक राज्य की क्रूरता की कहानी है.

जल, जंगल और जमीन की लड़ाई

अब इसे वर्तमान से जोड़ें. आज 2026 के मार्च में, जब सरकार 31 मार्च की डेडलाइन की बात कर रही है, तो 'हजार चौरासी की मां' हमें याद दिलाती है कि नक्सलवाद की जड़ें 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से चली आ रही हैं. वह आंदोलन आदिवासी किसानों की भूमि और जंगल के अधिकारों की लड़ाई था. महाश्वेता देवी  ने अपने लेखन में बार-बार दिखाया कि नक्सलवाद शहरी बुद्धिजीवियों का फैशन नहीं, बल्कि ग्रामीण-जनजातीय शोषण का प्रतिकार था. उपन्यास में ब्रती का विद्रोह मध्यमवर्गीय आराम की जिंदगी से टकराता है. वह कहता है  कि इस व्यवस्था में 'मौत ही एकमात्र सजा है जो विश्वासघातियों को मिलती है'.

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आज भी, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा के आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद की बची-खुची जड़ें उसी शोषण से जुड़ी हैं. वहां पर खनिज संसाधनों के लिए भूमि अधिग्रहण, वन अधिकारों का हनन और विकास के नाम पर विस्थापन आम है. सरकार की 'सुरक्षा-केंद्रित रणनीति' और 'आधारभूत संरचना' के दावे सराहनीय हैं, लेकिन उपन्यास हमें चेतावनी देता है कि यदि इनके साथ सामाजिक न्याय नहीं जुड़ा, तो यह 'समाप्ति' अस्थायी होगी.

महाश्वेता देवी की लेखनी हमें याद दिलाती है कि 1970 के दशक में भी सरकार ने 'ऑपरेशन' चलाकर आंदोलन को कुचला था, लेकिन नक्सलवाद 1980-90 के दशक में फिर लाल गलियारे में फैल गया. कारण? जड़ें नहीं काटी गईं. आज भी, यदि 31 मार्च तक केवल 'लाल आतंक' समाप्त होता है और आदिवासियों के हक, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की लड़ाई अधर में लटक जाती है, तो क्या यह वास्तविक विजय होगी?

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कब देखा गया नक्सल मुक्त भारत का सपना

महाश्वेता देवी का साहित्य मात्र नक्सलवाद तक सीमित नहीं. उनके अन्य कार्यों जैसे द्रौपदी में वे दिखाती हैं कि राज्य और पूंजीपति मिलकर कैसे जनजातीय संस्कृति और संसाधनों को लूटते हैं. हजार चौरासी की मां में सुजाता की जागृति स्त्री-मुक्ति और वर्ग-जागृति दोनों का प्रतीक है. वह अंत में चीख उठती है, 'तुम और कितने दिनों तक भागते रहोगे, ब्रती?...लाशें, जड़ हुई लाशें, तुम सब!' यह चीख आज के संदर्भ में प्रासंगिक है. सरकार विकास की बात करती है—रोड, स्कूल, अस्पताल, लेकिन उपन्यास पूछता है: विकास किसके लिए? यदि वह आदिवासी को उसकी जमीन से बेदखल करके लाया गया है, तो क्या वह विकास नहीं, बल्कि नया शोषण है? नक्सल मुक्त भारत का सपना तभी साकार होगा जब 'हजार चौरासी की मां' जैसी लाशों की कहानियां दोहराई न जाएं.

साहित्यिक दृष्टि से 'हजार चौरासी की मां' यथार्थवादी उपन्यास है. इसमें कोई नायक नहीं, केवल पीड़ा है. ब्रती का चरित्र आदर्श नहीं है; वह भी हिंसा का हिस्सा था. महाश्वेता न तो नक्सलियों को रोमांटिक बनाती हैं और न ही राज्य को. वे दोनों पक्षों की मानवीय विफलताओं को उजागर करती हैं. आज जब 31 मार्च की घड़ी नजदीक है, तो यह उपन्यास हमें सिखाता है कि सुरक्षा सफलता के साथ-साथ 'समस्या की जड़' पर भी ध्यान देना होगा. साल 2025 में 317 नक्सलियों के मारे जाने, 2000 से अधिक के आत्मसमर्पण के आंकड़े प्रभावशाली हैं, लेकिन यदि इनके पीछे आदिवासी युवाओं का असंतोष समाप्त नहीं हुआ, तो कल कोई नया 'ब्रती' उभर सकता है. महाश्वेता देवी की तरह हमें भी 'सबाल्टर्न' की आवाज सुननी चाहिए, वे आवाजें जो जंगल में दब जाती हैं. खैर, ये वक्त बताएगा कि देश से नक्सलवाद का खात्मा हुआ या नहीं ?

हजार चौरासी की मां बताती है कि नक्सलवाद की समाप्ति केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि न्याय, समानता और सम्मान से होती है. 31 मार्च 2026 को यदि हम सचमुच नक्सल-मुक्त भारत का जश्न मनाएंगे, तो वह जश्न तभी सार्थक होगा जब महाश्वेता जैसी लेखिकाओं की चेतावनी को याद रखा जाएगा कि राज्य की जीत तभी स्थायी है जब वह अपने नागरिकों, खासकर सबसे कमजोरों, को अपने साथ ले चलती है. अन्यथा, इतिहास दोहराएगा और '1084' की मां की पीड़ा फिर किसी मां की आखों में उतर आएगी. साहित्य इतिहास की गवाह है, यह हमें सिखाता है कि हिंसा का चक्र तोड़ने का एकमात्र रास्ता मानवीय संवेदना और न्याय है.

(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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