क्या आपने कभी उस मिट्टी को महसूस किया है जिसमें सभ्यता बसती है, जहां इतिहास करवट लेता है? बिहार की धरती सिर्फ एक भूगोलिक नक्शा नहीं है. यहां वो रोशनी है जो नालंदा से दुनिया भर में फैली, और बोधगया की छाया में बुद्ध ने शांति का रास्ता ढूंढ़ा था. गंगा की लहरें, मगध का हौसला, मिथिला की कलाएं - इस मिट्टी में सब कुछ है. हर साल 22 मार्च को बिहार अपनी पहचान का जश्न मनाता है.
1912 में जब बिहार बंगाल से अलग हुआ और अपनी पहचान मिली, तो जैसे नया दौर शुरू हो गया. आज यहां एक अजीब सा संघर्ष है. ऊंचाइयों को छूने की बेचैनी भी है और अपनी जड़ों से जुड़ने की जिद भी.
अभी बिहार ऐसे मोड़ पर है जहां इसकी मेधा, यानी हुनर, तो ग्लोबल है - सिलिकॉन वैली से लेकर देश के बड़े ओहदों तक बिहारी छाए हुए हैं. लेकिन राज्य के अंदर मौके आज भी बहुत कम हैं. असली जीत तब होगी जब यहां के युवाओं को खुद बिहार में ऐसा माहौल मिले, ऐसी मजबूती मिले, कि उन्हें इतिहास बनाने के लिए बाहर जाने की जरूरत ही न पड़े.
ये एक पुरानी टीस...
बिहार की ट्रेनें सिर्फ लोगों को नहीं ले जातीं, वो हजारों सपनों को भी लिए दौड़ती हैं. उन सपनों को, जिन्हें अपनी ही धरती पर आसमान नहीं मिला. बेरोजगारी यहां सिर्फ आंकड़ा नहीं है, ये एक पुरानी टीस है जो हर पीढ़ी को विरासत में मिली है. गांवों की गलियों में आज सन्नाटा है, जहां कभी युवाओं की आवाज गूंजती थी, अब वे पंजाब या दिल्ली-मुंबई की जमीन पर अपना पसीना बहा रहे हैं.
सोचिए, जिस राज्य ने शून्य खोजा, लोकतंत्र की मिसाल दी, आज उसी की संतानें दो वक्त की रोटी के लिए भटक रही हैं. मां की चौखट पर गिरा वो विदाई का आंसू हर सत्ता के वादे पर सवाल बनकर टिका है. सरकारें आईं, वादे हुए, चेहरे बदले, लेकिन गांव के बाहर लटकते ताले आज भी गवाही दे रहे हैं कि 'बिहारी मेधा' को अपनी ही धरती पर बेगाना बना दिया गया है. ये सिर्फ बिहार की बात नहीं, ये उस सम्मान की लड़ाई है, जिसमें हर बिहारी चाहता है कि अपने ही घर में खुद्दारी के साथ जिए.
इसी जमीन पर चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक पैदा हुए
बिहार - ये सिर्फ नाम नहीं, बल्कि सभ्यता का सोने का कलश है, जहां से ज्ञान, हिम्मत और अध्यात्म की नदी बहती रही. जब दुनिया बंट गई थी, तब इसी जमीन पर चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक पैदा हुए, जिन्होंने टुकड़े-टुकड़े भारत को एक किया.
यही वो भूमि है जहां बोधगया के पेड़ तले बुद्ध ने ज्ञान पाया और शांति का संदेश चारों तरफ पहुंचाया. वैशाली की हवा में आज भी लोकतंत्र की पहली गूंज सुनाई देती है. नालंदा के खंडहर बोलते हैं कि यहां पर दुनिया भर की मेधा ने माहौल पाया. पटना की गलियों में गुरु गोविंद सिंह के प्रकाश पर्व की याद अब भी ताजा है.
अब जब इन ऐतिहासिक पन्नों से वर्तमान को देखते हैं, तो सवाल उठता है, वो चमक कहां गई? वो धरती जो दुनिया को रास्ता दिखाती थी, आज खुद अपनी पहचान की लड़ाई क्यों लड़ रही है? विरासत तो हमारे पास है, मगर क्या हम उसकी जड़ों को अपनी मेहनत से सींच रहे हैं? बिहार का गौरव सिर्फ किताबों में बंद रखने के लिए नहीं है, यही प्रेरणा है दोबारा उठने की, फिर से दुनिया को दिशा देने की.
(लेखक NDTV में कार्यरत हैं.)
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.














