नहीं थे, पर एक-दूसरे से बहुत दूर भी नहीं थे. गांधी जी नौ सितंबर 1947 को कोलकाता से दिल्ली आने के बाद अलबुर्कर रोड (अब तीस जनवरी मार्ग) पर स्थित बिड़ला हाउस (अब गांधी स्मृति) में रहने लगे. इससे पहले वे मंदिर मार्ग पर स्थित वाल्मिकी मंदिर में रहे थे – यानी 1946 से 1947 तक करीब 214 दिन वहां गुजारे. बाबा साहेब पहले 1, हार्डिंग लेन (अब तिलक मार्ग) पर रहते थे, फिर 22, पृथ्वीराज रोड पर. ये सभी जगहें दिल्ली के केंद्र में ही हैं, एक-दूसरे से महज चार-पांच किलोमीटर के दायरे में.
पर इन दोनों महान विभूतियों के बीच दिल्ली में कोई प्रत्यक्ष मुलाकात का रिकॉर्ड नहीं मिलता. ये सोचना गलत होगा कि दोनों एक-दूसरे से मिलने से बच रहे होंगे. दोनों बहुत बड़े कद के नेता थे, इसलिए उनके बारे में हल्की-फुल्की बातें करना पाप के समान है. असल में दोनों अपने-अपने कामों में इतने व्यस्त थे कि मुलाकात का मौका ही नहीं बना. गांधी जी दिन-रात सांप्रदायिक दंगों को शांत कराने में लगे हुए थे, दिल्ली के दंगाग्रस्त इलाकों में घूम-घूमकर शांति का संदेश दे रहे थे. तब दिल्ली के करोल बाग, किशनगंज, दरियागंज वगैरह में दंगे भड़के हुए थे. वहीं डॉ. आंबेडकर राष्ट्र-निर्माण के बड़े काम में जुटे थे.
क्या गांधी जी ने की थी डॉक्टर आंबेडकर की सिफारिश
15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद संविधान सभा का काम तेज हो गया. 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने सर्वसम्मति से डॉ. भीमराव आंबेडकर को प्रारूप समिति का अध्यक्ष बना दिया. इस समिति में सात सदस्य थे. बाबा साहेब देश के नए संविधान को तैयार करने में पूरी तरह जुट गए.
यहां एक अहम बात यह है कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल संवैधानिक मामलों के मशहूर ब्रिटिश विद्वान सर इवोर जेनिंग्स को संविधान बनाने के लिए बुलाने पर विचार कर रहे थे. इसी सिलसिले में वे गांधी जी से मिले. एचवी हांडे की किताब 'Ambedkar And The Making Of The Indian Constitution' में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि आजादी से दो महीने पहले नेहरू और पटेल ने गांधी जी से पूछा कि संविधान बनाने की जिम्मेदारी किसे दें. गांधी जी ने इवोर जेनिंग्स के बजाय आंबेडकर का नाम लिया और कहा कि देश के अपने विद्वान को यह काम सौंपना चाहिए.
Add image caption here
इसी तरह, नेहरू की कैबिनेट में विधि मंत्री के रूप में आंबेडकर को शामिल करने में भी गांधी जी की सिफारिश ने बड़ी भूमिका निभाई. बाबा साहेब ने जगजीवन राम से अनुरोध किया कि वे गांधी जी से उनकी कैबिनेट में शामिल होने की सिफारिश करें. जगजीवन राम पहले सरदार पटेल से बात करते हैं, फिर गांधी जी से. गांधी जी ने आंबेडकर की विद्वता को देखते हुए नेहरू को उनका नाम सुझाया. इस बारे में इंद्राणी जगजीवन राम ने अपनी किताब 'Milestones: A Memoir' में विस्तार से लिखा है. इंद्राणी जी बाबू जगजीवन राम की पत्नी थीं.
बापू की हत्या पर क्या बोले थे डॉक्टर आंबेडकर
इन दोनों किताबों और कई अन्य ऐतिहासिक स्रोतों से साफ पता चलता है कि गांधी जी बाबा साहेब की विधिविद्या और संवैधानिक ज्ञान का गहरा सम्मान करते थे. भले ही 1932 के कम्यूनल अवॉर्ड जैसे मुद्दों पर मतभेद रहे हों, लेकिन 1947 तक दोनों के बीच परस्पर आदर का भाव साफ दिखने लगा था. गांधी जी की सलाह-सिफारिश पर ही बाबा साहेब को भारत सरकार के विधि मंत्री और संविधान की प्रारूप समिति की कमान संभालने का मौका मिला. जाहिर है कि बाबा साहेब को भी यह पता चल गया होगा कि उनकी इस भूमिका में गांधी जी का योगदान रहा है.
समय बीतता गया और 30 जनवरी 1948 का वो काला दिन आ गया. एक विक्षिप्त शख्स ने बापू की हत्या कर दी. देश बिलख उठा. बाबा साहेब भी इस खबर से स्तब्ध रह गए. दलित चिंतक देवी दयाल अपनी किताब 'डॉ. आंबेडकर की दिनचर्या' में लिखते हैं कि 'बापू की हत्या का समाचार सुनकर बाबा साहेब पांच-छह मिनट तक सामान्य नहीं हो पाए. फिर कुछ संभलते हुए बोले– बापू का इतना हिंसक अंत नहीं होना चाहिए था.''
गांधी और आंबेडकर में किस बात पर था मतभेद
दरअसल, 1932 के कम्यूनल अवॉर्ड में दोनों के बीच मतभेद जरूर उभरे थे. अवॉर्ड ने दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया था. बाबा साहेब इसके पक्ष में थे, क्योंकि वे मानते थे कि इससे दलितों की आवाज मजबूत होगी. लेकिन गांधी जी इसके खिलाफ थे. उन्होंने 20 सितंबर 1932 से आमरण अनशन शुरू कर दिया. आखिरकार 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट हुआ. इसके बाद पृथक निर्वाचन की जगह आरक्षित सीटों का प्रावधान कर दिया गया.
लेकिन वक्त के साथ दोनों में एक-दूसरे के प्रति आदर बढ़ा. गांधी जी विकास के मॉडल में गांवों को केंद्र में रखते थे– उनका मानना था कि बिना गांवों के विकास के भारत खुशहाल नहीं हो सकता. वहीं डॉ. आंबेडकर का विश्वास था कि बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण, आधुनिक शिक्षा और शहरी विकास से ही देश आगे बढ़ेगा. यानी कई मुद्दों पर उनकी सोच अलग थी, फिर भी दोनों राष्ट्र-निर्माण में एक-दूसरे के पूरक बन गए. आज जब हम इन दोनों महान व्यक्तियों को याद करते हैं, तो यही लगता है कि मतभेदों के बावजूद उन्होंने एक-दूसरे की विद्वता और देशभक्ति का सम्मान किया. यही तो सच्ची महानता है.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
पाठकों से अपील: अगर आप भी किसी विषय पर लेख लिखना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. आप अपने पसंद के विषय पर लेख लिखकर हमें भेजें. लेख की शब्द सीमा 1500 शब्द है. लेख मंगल फॉन्ट में टाइप होना चाहिए. एक जरूरी बात, लेख मौलिक होना चाहिए, वह कहीं और प्रकाशित नहीं होना चाहिए, वह पूरा या आंशिक तौर पर भी कहीं से कॉपी किया हुआ या AI की मदद से तैयार किया हुआ नहीं होना चाहिए. लेख पसंद आने पर उसे हम अपने ब्लॉग सेक्शन में जगह देंगे. लेख को आप हमारी ईमेल आईडी पर Edit.Blogs@ndtv.com पर भेज सकते हैं.














