कांग्रेस हाईकमान ने काफी टाममटोल के बाद सिद्धारमैया को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए कथित तौर पर कह दिया है. यह एक 'साहसिक' फैसला है या लापरवाही में उठाया गया कदम, इसका फैसला अगले दो-तीन दिन में हो जाएगा.
मंगलवार को दिल्ली में क्या क्या हुआ
मंगलवार को नई दिल्ली में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की बैठक हुई. सिद्धारमैया गुट ने इस बैठक को मुख्यमंत्री पद पर डीके शिवकुमार के दावे को टालने के लिए कांग्रेस नेतृत्व की ओर से बुलाई गई एक सामान्य बैठक समझा. लेकिन दोपहर में इस बैठक ने अप्रत्याशित और नाटकीय मोड़ ले लिया. एक पर्यवेक्षक के मुताबिक सिद्धारमैया इससे स्तब्ध रह गए. यह सब तब हुआ जब नेता लंच के लिए चले गए और राहुल गांधी भी खाना खाने अपने घर चले गए, वहां उन्होंने मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका गांधी से बातचीत की. खबरों के मुताबिक राहुल ने उन्हें बताया कि उन्होंने कर्नाटक में राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव के नामांकन पर चर्चा की, उन्होंने सिद्धारमैया और शिवकुमार के साथ अलग से विचार-विमर्श किया, जिसमें कोई खास नतीजा नहीं निकला.
सोनिया ने राहुल को शिवकुमार से किए गए अपने 'वादे' की याद दिलाई. उन्होंने सुझाव दिया कि अब उस वादे को निभाने का समय आ गया है. प्रियंका हमेशा से शिवकुमार की समर्थक रही हैं,कथित तौर पर उन्होंने कहा कि पार्टी के प्रति शिवकुमार की लंबे समय से चली आ रही निष्ठा और निरंतर समर्थन को देखते हुए,अब उन्हें नेतृत्व करने का मौका मिलना चाहिए, खासकर इसलिए भी क्योंकि अगले विधानसभा चुनाव तक सिद्धारमैया 80 साल के हो जाएंगे.
राहुल गांधी ने कैसे सुनाया फैसला
लंच के बाद कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खरगे, केसी वेणुगोपाल, रणदीप सुरजेवाला, सिद्धारमैया और शिवकुमार फिर से जमा हुए. इसके कुछ मिनट बाद आए राहुल गांधी ने अपनी सीट पर बैठते हुए सिद्धारमैया की ओर सीधे देखा और उनसे कहा, ''सिद्धारमैया जी, मैं आपसे पार्टी के हित में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का अनुरोध करता हूं. मुझे विश्वास है कि आप मेरा साथ देंगे.''
ऐसा लगता है कि राहुल के मुंह से यह बात सुनकर सिद्धारमैया स्तब्ध रह गए. उन्होंने हमेशा राहुल गांधी को अपना सबसे मजबूत समर्थक माना था, जिन्होंने उनके मुख्यमंत्री बनने के दोनों अवसरों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और हमेशा उनका साथ दिया.
कर्नाटक के मुख्यमंत्री अपने फैसले का ऐलान अगले कुछ दिन में करने वाले हैं. कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें अपने फैसले से अवगत करा दिया है.
इस बैठक के दौरान कमरे में मौजूद किसी भी व्यक्ति ने भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल वरिष्ठ नेताओं को इंदिरा भवन से बाहर ले गए. उन्होंने बैठक में लिए गए फैसला का इंतज़ार कर रही मीडिया से कहा कि केवल चुनावी मुद्दों पर चर्चा हुई है और बाकी बातें आपकी (मीडिया की) अटकलें हैं.
क्या सिद्धारमैया की सम्मानजनक विदाई होगी
एक घंटे से भी कम समय में, कांग्रेस के शीर्ष सूत्रों ने मीडिया को बताना शुरू कर दिया कि सिद्धारमैया को पद छोड़ने के लिए कहा गया है. डीके शिवकुमार उनकी जगह लेंगे. यह दुनिया को फैसले की जानकारी देने और सिद्धारमैया को इस फैसले को समझने और अपने सम्मानजनक विदाई पर बातचीत करने के लिए समय देने की एक सोची-समझी रणनीति थी. सिद्धारमैया अपने भरोसेमंद सहयोगियों, परमेश्वर, केजे जॉर्ज, एचसी महादेवप्पा और बायराथी बसवराज के साथ दिल्ली स्थित जॉर्ज के बंगले के लिए रवाना हुए. वहां इन नेताओं ने बैठक की. ठीक उसी समय शिवकुमार अपने समर्थकों के साथ रणनीति बनाने कर्नाटक भवन चले गए.
रात करीब 8:30 बजे, जब सिद्धारमैया को ले जा रही एसयूवी जॉर्ज के घर से निकली, यह देखकर वहां इंतजार कर रहे कैमरामैन और पत्रकार उन पर टूट पड़े. उनसे पत्रकारों ने पूछा,''क्या आप इस्तीफा दे रहे हैं. क्या आपको इस्तीफा देने के लिए कहा गया है.'' इन सवालों पर सिद्धारमैया ने कुछ नहीं कहा.उदास चेहरा से उन्होंने कार की बंद खिड़की के पीछे से मीडियाकर्मियों को देखा और बिना कुछ बोले वहां से चले गए.
कैसे हटाए गए थे एस बंगारप्पा
मंगलवार रात टीवी स्क्रीन पर जो तस्वीरें दिखाई देने लगीं, उन्हें देखकर मुझे 1992 की एक ऐसी ही घटना की याद आई. मैं नई दिल्ली में अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' का विशेष संवाददाता था.मैं कुछ केंद्रीय मंत्रालयों, राज्यसभा और कर्नाटक से संबंधित घटनाक्रमों को कवर करता था. पिछड़े वर्ग के एक लोकप्रिय नेता एस बंगारप्पा को अनुभवी नेता वीरेंद्र पाटिल की जगह मुख्यमंत्री बनाया गया था. वो अपनी ही पार्टी के सदस्यों के विरोध का सामना कर रहे थे. हर दो-तीन सप्ताह में विधायकों के समूह बंगारप्पा सरकार के कथित भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ आरोपपत्र लेकर दिल्ली आते थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव, जो अल्पमत की सरकार चलाने की तमाम चुनौतियों से जूझ रहे थे, वो कर्नाटक की समस्याओं से बेहद परेशान थे.एक दिन उन्होंने बंगारप्पा को बैठक के लिए दिल्ली बुलाया.
साल 1992 की उस सर्द भरी रात में, जब बंगारप्पा प्रधानमंत्री आवास में दाखिल हुए तो राव प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा मुख्यमंत्री के खिलाफ शिकायतों की जांच के बाद तैयार की गई एक मोटी फाइल के साथ तैयार थे. उन्होंने एक-दो शिकायतें पढ़कर सुनाईं और बंगारप्पा से उनकी प्रतिक्रिया पूछी.जब मुख्यमंत्री चुप रहे, तो राव ने कथित तौर पर उनसे कहा, ''मैं आपको मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त कर रहा हूं. कृपया बेंगलुरु स्थित राजभवन जाकर अपना इस्तीफा सौंप दें.''
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पिछले काफी समय से मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी जता रहे हैं.
उस रात मैं प्रधानमंत्री आवास के बाहर इंतजार कर रहे कुछ गिने-चुने पत्रकारों में शामिल था. हम पहले से ही जानते थे कि बंगारप्पा के लिए बैठक अच्छी नहीं रही थी. बंगारप्पा को ले जा रही गाड़ी के निकलते ही हम सब उनके पास दौड़ पड़े और पूछने लगे,''क्या आपको इस्तीफा देने के लिए कहा गया है?'', ''आपका अगला कदम क्या होगा?''
प्रधानमंत्री आवास से निकलकर बंगरप्पा चाणक्यपुरी स्थित कर्नाटक भवन पहुंचे. वहां उन्होंने अपने समर्थक मंत्रियों और विधायकों के साथ बैठक की. ऐसा लगता है कि वे प्रधानमंत्री से बहुत नाराज थे. उन्होंने अपने समर्थकों से कहा,''मैं इस बूढ़े को दिखाऊंगा कि बंगारप्पा कौन है!'' उन्होंने बेंगलुरु में कुछ फोन किए और अपने खास लोगों को निर्देश दिया कि वे सभी कांग्रेस विधायकों को लाखों समर्थकों के साथ बेंगलुरु हवाई अड्डे पर पहुंचाएं.
जब बंगरप्पा को दिखी सच्चाई
बंगरप्पा को पूरा विश्वास था कि पिछड़े वर्गों के लोग पार्टी आलाकमना के खिलाफ गुस्से में भड़क उठेंगे और विधायकों के समर्थन से वे एक ऐसा राजनीतिक संकट पैदा कर देंगे, जिससे प्रधानमंत्री को अपना फैसला वापस लेना पड़ेगा. अगली सुबह जब बंगरप्पा को लेकर विमान हवाई अड्डे पर उतरा, तो वहां उनकी पार्टी के छह विधायक और कुछ सौ समर्थक नारे लगा रहे थे. इसके बाद बंगरप्पा ने राजभवन जाकर अपना इस्तीफा सौंपने में जरा भी देर नहीं की.
अब आते हैं मई 2026 में. सिद्धारमैया कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनने वाले पिछड़ा वर्ग के दूसरे व्यक्ति हैं. उन्होंने सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड बनाया है.पूरी दुनिया उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रही है. कांग्रेस हाई कमान की ओर से फैसला लिए जाने के बाद से वे चुप्पी साधे हुए हैं. उन्होंने गुरुवार को अपनी बात सामने रखने का वादा किया है. उन्हें अपना समय और स्थान मिलना चाहिए.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














