कांग्रेस की राजनीति में समय का संयोग बहुत कम देखने को मिलता है. बाहर से देखने में जो अचानक लगता है, वह अक्सर महीनों के संकेतों, खंडनों, विरामों, संदेशों और प्रतिसंदेशों के बाद लिया गया एक फैसला होता है. कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन कांग्रेस की इसी पुरानी परंपरा का हिस्सा है. यह एक नई बात को भी दर्शाता है, वह है राहुल गांधी की अब निर्णायक कार्रवाई करने की इच्छा, जबकि पहले वे परामर्श के नाम पर अनिश्चितता को बढ़ावा देते थे.
राहुल गांधी का बढ़ता आत्मविश्वास
कर्नाटक में सिद्धारमैया का इस्तीफा और डीके शिवकुमार का अगला मुख्यमंत्री होने की कहानी केवल एक मुख्यमंत्री और एक उपमुख्यमंत्री तक सीमित नहीं है. यह चार मई के बाद राहुल गांधी में आए आत्मविश्वास की कहानी है. उस दिन दक्षिण की राजनीतिक में कांग्रेस को प्रोत्साहन और मार्गदर्शन दोनों मिला था. केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी की. कांग्रेस ने 63 सीटें जीतीं और उसके गठबंधन ने आसानी से बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया. वहीं तमिलनाडु में, विजय की टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. कांग्रेस ने राज्य में दशकों तक सत्ता से बाहर रहने के बाद नई सरकार में दो मंत्री पद हासिल कर पुरानी यादों के बजाय व्यावहारिकता को चुना.
ये घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि राहुल गांधी अब कर्नाटक को केवल बेंगलुरु की राजनीति के नजरिए से नहीं देख रहे हैं. वे इसे दक्षिणी राज्य के एक हिस्से के रूप में देख रहे हैं. कर्नाटक में 2028 में चुनाव होंगे, उसके बाद 2029 में लोकसभा चुनाव होंगे. पांचों दक्षिणी राज्य और पुडुचेरी मिलकर संसद में इतना प्रभाव रखते हैं कि यह तय कर सकता है कि विपक्ष केवल विरोध-प्रदर्शन करने वाली पार्टी बनकर न रह जाए बल्कि सत्ता का एक मजबूत दावेदार बन जाए. इसलिए कर्नाटक केवल एक राज्य सरकार नहीं है. वह कांग्रेस के लिए एक मंच है.
कर्नाटक में सीएम पद पर डीके शिवकुमार की दावेदारी का मामला पिछले काफी समय से लटका हुआ था. कांग्रेस नेतृत्व ने शिवकुमार के पक्ष में फैसला लेकर कड़ा संदेश देने की कोशिश की है.
कर्नाटक में किसे मिले था जनसमर्थन, सिद्धारमैया या शिवकुमार को
सिद्धारमैया की मुश्किलें इस सप्ताह शुरू नहीं हुईं. ये उस दिन शुरू हुईं जब कांग्रेस ने 2023 में कर्नाटक में शानदार जीत हासिल की. पार्टी ने 224 सदस्यीय विधानसभा में 135 सीटें जीतीं. दशकों में कर्नाटक में कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन था. लेकिन इस सफलता में एक अनसुलझा विरोधाभास भी छिपा था- सिद्धारमैया के पास जनसमर्थन और सामाजिक गठबंधन था, जबकि शिवकुमार के पास संगठनात्मक शक्ति और पार्टी मशीनरी को जीवित रखने वाले व्यक्ति के रूप में एक मजबूत दावा था. साल 2023 के समझौते के तहत सिद्धारमैया मुख्यमंत्री और शिवकुमार उपमुख्यमंत्री बने. औपचारिक रूप से सत्ता हस्तांतरण की व्यवस्था हुई थी या नहीं, इस बात को हमेशा नकारा गया, इस पर बहस हुई या इसे जानबूझकर अस्पष्ट रखा गया. लेकिन राजनीति अक्सर ऐसे समझौतों पर चलती है जिन्हें कभी आधिकारिक तौर पर दर्ज नहीं किया जाता. नवंबर 2025 तक, जब सरकार ने ढाई साल पूरे किए, शिवकुमार खेमे को लगा कि सत्ता परिवर्तन का समय आ गया है. उस समय की खबरों के मुताबिक उनके करीबी विधायक सत्ता साझा करने के संभावित फार्मूले को लागू करवाने के लिए दिल्ली गए थे.
सिद्धारमैया उस मुश्किल घड़ी से बच गए. पार्टी सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने उन्हें छह महीने का और समय दिया, आंशिक रूप से उनके कद का सम्मान करते हुए और आंशिक रूप से इसलिए कि समय से पहले बदलाव सरकार को अस्थिर कर सकता था. वह समय सीमा अब खत्म हो चुकी है. 26 मई को शीर्ष नेतृत्व के साथ लंबी बातचीत के बाद, सत्ता हस्तांतरण के सवाल ने फिर जोर पकड़ा. कुछ खबरों में कहा गया कि सिद्धारमैया पद छोड़ने के लिए तैयार हैं, जबकि आधिकारिक रुख इस मामले को अटकलबाजी बताकर खारिज करता रहा. अंततः, 28 मई की सुबह सिद्धारमैया ने 'डीकेएस' और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ नाश्ते पर हुई बैठक में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की पुष्टि की. कहा यह जा रहा है कि सिद्धारमैया ने पार्टी की ओर से राज्यसभा सीट के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया है. इस घोषणा से पहले का विरोधाभास असामान्य नहीं था. कांग्रेस में, इनकार अक्सर निर्णय का विपरीत नहीं होता. यह निर्णय की प्रक्रिया का हिस्सा है. यह निवर्तमान नेता को गरिमा, आने वाले दावेदार को धैर्य और हाई कमान को आगे बढ़ने का अवसर देता है.
कांग्रेस विधायक और हाई कमान में संबंध
कई राजनीतिक विश्लेषक उन राज्यों में कांग्रेस विधायकों के व्यवहार को गलत समझते हैं, जहां पार्टी को भारी बहुमत मिला है. वे विधायकों को किसी न किसी गुट की संपत्ति मानते हैं. जबकि सच यह है कि कांग्रेस विधायक अक्सर टीवी की बहसों की तुलना में अधिक लचीले, अधिक सतर्क और दिल्ली से मिलने वाले संकेतों के प्रति अधिक सजग होते हैं.
जब कोई मुख्यमंत्री लोकप्रिय, चुनावी नजरिए से उपयोगी और अगले चुनाव में पार्टी का नेतृत्व करने में सक्षम दिखता है, तो अधिकांश विधायक उसके समर्थक लगते हैं. वे उसकी सभाओं में भाग लेते हैं, उसकी कल्याणकारी योजनाओं की प्रशंसा करते हैं और सभी अटकलों को खारिज कर देते हैं. लेकिन जब उन्हें लगता है कि हाईकमान उसकी उपयोगिता पर पुनर्विचार कर रही है, तो वे जरूरी नहीं कि प्रतिद्वंद्वी खेमे में चले जाएं. वे तटस्थ रुख अपना लेते हैं. कांग्रेस की भाषा में कहें तो वे हाईकमान के लिए उपलब्ध रहते हैं.
सिद्धारमैया सामाजिक न्याय के नेता हैं. उन्हें पिछड़े वर्ग के सशक्तिकरण, कल्याणकारी राजनीति, हिंदुत्व का वैचारिक विरोध और जनता से जुड़ाव के लिए जाना जाता है.
पंजाब इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है. एक समय ऐसा लगता था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को विधायक दल में लगभग पूर्ण निष्ठा प्राप्त है. लेकिन जब समय बदला और वे चुनावी रूप से कमजोर दिखने लगे, तो उनका समर्थक ढांचा आश्चर्यजनक रूप से ध्वस्त हो गया. उनके समर्थक विधायकों ने किसी एक नेता का अनुयायी बनने की जगह पार्टी हाईकमान के फैसले का समर्थन किया.
कर्नाटक में भी कुछ ऐसा ही पैटर्न दिखाई दे रहा है. यह मानना जरूरी नहीं है कि विधायक अचानक शिवकुमार के कट्टर समर्थक बन गए हैं. कई विधायकों ने बस यह संकेत दिया कि यदि राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान यह फैसला लेता है कि पार्टी के भविष्य के लिए परिवर्तन जरूरी है तो वे परिवर्तन को स्वीकार करेंगे. कांग्रेस की यही पारंपरिक कार्यप्रणाली रही है. गुटबंदी स्थायी होती है और गठबंधन सशर्त होता है.
सिद्धारमैया और शिवकुमार की राजनीति कैसी है
सिद्धारमैया और शिवकुमार केवल प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं. वे कांग्रेस के भीतर दो अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. सिद्धारमैया सामाजिक न्याय के नेता हैं, पिछड़े वर्ग का सशक्तिकरण, कल्याणकारी राजनीति, हिंदुत्व का वैचारिक विरोध और जनता से जुड़ाव. उनकी जगह लेना आसान नहीं है. उनके साथ नाइंसाफी करना भारी पड़ सकता है, खासकर तब जब कांग्रेस को कर्नाटक और उससे बाहर पिछड़े वर्ग को एकजुट करने की जरूरत है.
शिवकुमार में एक और गुण है, जिसकी कांग्रेस को भी जरूरत है, वह है दृढ़ता. वे संगठनात्मक रूप से आक्रामक, साधन संपन्न, जुझारू और राजनीति को एक खेल की तरह खेलने के लिए तैयार रहते हैं. उन्होंने धैर्य रखा, बातचीत की, सहन किया और हाई कमान को याद दिलाया कि वफादारी का अंततः इनाम मिलना ही चाहिए. एक ऐसी पार्टी के लिए जिस पर अक्सर अपने कार्यकर्ताओं को हल्के में लेने का आरोप लगता है, शिवकुमार की पदोन्नती कर्नाटक से परे एक संदेश देगा.
राहुल गांधी की चुनौती यह है कि इस बदलाव को गुटबाजी के समझौते की तरह कम और रणनीतिक नवीनीकरण की तरह ज़्यादा दिखाया जाए.राज्य सभा भेजकर या पार्टी संगठन में कोई बड़ा पद देकर यदि सिद्धारमैया को कोई भूमिका दी जाती है तो कांग्रेस एक साथ दो बातें कह सकती है, पहला यह कि अनुभव का सम्मान किया जा रहा है और दूसरी बात यह कि पीढ़ीगत बदलाव का प्रयास किया जा रहा है.
यह संतुलन बहुत नाजुक है. शिवकुमार खेमे का विजयोन्माद सिद्धारमैया समर्थकों को ठेस पहुंचा सकता है. वहीं सिद्धारमैया के प्रति अत्यधिक उदारता शिवकुमार को यह विश्वास दिला सकती थी कि कांग्रेस में वादे केवल टालने के लिए किए जाते हैं. राहुल का काम किसी एक व्यक्ति को चुनकर दूसरे को दरकिनार करना नहीं है. बल्कि एक व्यापक दक्षिणी रणनीति के तहत दोनों को फिर से व्यवस्थित करना है.
राहुल गांधी की बदली नेतृत्व क्षमता
राहुल गांधी के आलोचक उन्हें सालों से संगठनात्मक नेतृत्वकर्ता की जगह नैतिक टिप्पणीकार बताते रहे हैं. कर्नाटक इस आरोप का खंडन हो सकता है, क्योंकि अब वे समय की बेहतर समझ के साथ काम करते दिखाई दे रहे हैं. उन्होंने देखा है कि कांग्रेस दक्षिण के राज्यों में जीत सकती है, वहां व्यावहारिक रूप से सरकार बना सकती है, वरिष्ठ नेताओं को संभाल सकती है और युवा मतदाताओं से जुड़ सकती है. लेकिन अगर दक्षिण का सबसे महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक आंतरिक रूप से कमजोर हो जाता तो इनमें से किसी भी बात का कोई महत्व नहीं होता.
चार मई को पांच विधानसभाओं के चुनाव परिणाम आने के बाद से कांग्रेस नेता राहुल गांधी का आत्मविश्वास और बढ़ा हुआ नजर आ रहा है.
बीजेपी इस बात को भली-भांति समझती है. वह कांग्रेस की हर झिझक, सिद्धारमैया के हर वफादार की हर शिकायत, शिवकुमार के हर समर्थक की उकसावे वाली हर हरकत और प्रशासन की हर गलती पर नजर रखेगी. कर्नाटक सिर्फ 2028 के विधानसभा चुनाव का मामला भर नहीं है. यह इस बात का सवाल है कि क्या कांग्रेस 2029 में खुद को एक ऐसी पार्टी के रूप में पेश कर पाएगी जो शासन करने, खुद को नया रूप देने और अनुशासन बनाए रखने में सक्षम हो.
इसलिए 26 मई को सिर्फ एक बैठक की तारीख से कहीं अधिक के रूप में याद किया जा सकता है. यह वह मोड़ साबित हो सकता है, जब राहुल गांधी ने कर्नाटक में उत्तराधिकार के सवाल को अनसुलझा न छोड़ने का फैसला किया. कर्नाटक के लिए आगे जो भी हो, फिलहाल दिल्ली से संदेश बिल्कुल साफ है. सिद्धारमैया को जनादेश, उनका रुतबा और उनका कार्यकाल विस्तार मिल चुका है. अब शिवकुमार की बारी है. और राहुल गांधी, शायद लंबे समय बाद पहली बार, कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी के रूप में व्यवहार करने के लिए प्रेरित करते नजर आ रहे हैं जो समय के महत्व को समझती है.
(डिस्क्लेमर: रशीद किदवई देश के जाने-माने पत्रकार, राजनीतिक समिक्षक और लेखक हैं. वो कांग्रेस की राजनीति के जानकार हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है. )














