हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत पर टॉरपीडो हमला-अमेरिका से भारत का एक करार भारत के लिए बड़ी चुनौती

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Sayantan Haldar

हिंद सागर के अंदर अमेरिका ने ईरान के एक युद्धपोत को टॉरपीडो मारकर डुबा दिया. लिहाजा अब मिडिल ईस्ट के आसमान में लड़ी जा रही लड़ाई भारत के पड़ोस में पहुंच गई है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हिंद महासागर में यह पहली बड़ी नौसैनिक कार्रवाई बताई जा रही है. ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी हमले का असर हिंद महासागर की सुरक्षा स्थिति और इस क्षेत्र में भारत के हितों पर भी पड़ सकता है.


कोलंबो में दो अन्य जहाज रुके

फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम में हुए भारतीय नौसेना के बेड़ा समीक्षा और मिलन अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद यह ईरानी जहाज अपने देश लौट रहा था। उसी दौरान इस पर टॉरपीडो से हमला हुआ. हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार श्रीलंका की नौसेना और वायुसेना ने तुरंत खोज और बचाव अभियान शुरू किया. इस घटना में जहाज पर सवार कम से कम 87 लोगों की मौत हो गई. बचे हुए लोगों का इलाज श्रीलंका में चल रहा है. बताया जा रहा है कि दो अन्य ईरानी युद्धपोत कोलंबो में शरण लेकर खड़े हैं. यह घटना भारत के समुद्री क्षेत्र के पास हुई और यह जहाज भारतीय नौसेना के अभ्यास में शामिल होने के तुरंत बाद लौट रहा था. इसलिए नई दिल्ली में इस घटना के असर और इससे निपटने के तरीकों पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो गया है.


LEMOA समझौता

नई दिल्ली के लिए स्थिति को थोड़ा जटिल बनाने वाला एक कारण भारत और अमेरिका के बीच 2016 में हुआ लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) भी है. इस समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच ईंधन भरने और दूसरी रसद सेवाओं में सहयोग को आसान बनाना है. सरल शब्दों में, इस समझौते के तहत अमेरिका अपनी नौसेना के जहाजों को ईंधन और आपूर्ति के लिए भारतीय बंदरगाहों और ठिकानों का इस्तेमाल कर सकता है और भारत भी अमेरिकी सुविधाओं का उपयोग कर सकता है. ऐसे समय में जब अमेरिकी नौसेना की कार्रवाइयों से भारत में चिंता बढ़ सकती है, नई दिल्ली को यह सावधानी बरतनी होगी कि भविष्य में अमेरिका को अपनी सुविधाएं कितनी और कैसे दी जाएं. राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार अपने सहयोगियों से अमेरिका की अपेक्षाएं पूरी करने की बात करते रहे हैं. इसलिए भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह सीधे या परोक्ष रूप से इस संघर्ष का हिस्सा न बन जाए. यह खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का पड़ोस भी इस संघर्ष में फंस सकता है. सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा समझौते को देखते हुए यह चर्चा भी बढ़ रही है कि क्या पाकिस्तान इस टकराव में शामिल हो सकता है.


हिंद महासागर में बढ़ता तनाव

भारत और अमेरिका ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सहयोग को काफी बढ़ाया है ताकि नियमों पर आधारित व्यवस्था कायम रह सके. लेकिन अमेरिका के इस ताजा हमले ने हिंद महासागर को ईरान के खिलाफ उसकी कार्रवाई का नया केंद्र बना दिया है. इससे इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने का खतरा है। अगर तनाव बढ़ता है तो समुद्री रास्तों और व्यापारिक मार्गों में रुकावट आ सकती है. इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत के हित हिंद  महासागर में खुले और सुरक्षित समुद्री रास्तों से जुड़े हैं.


भारत सबसे बड़ा खिलाड़ी

भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण होने के कारण हिंद महासागर की सुरक्षा और स्थिरता भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति का मुख्य लक्ष्य है. इसके अलावा, हिंद महासागर के कई देशों की क्षमताएं और संसाधन सीमित हैं. इसलिए इस क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के मामले में भारत एक बड़ा और महत्वपूर्ण भागीदार है. ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी हमला दशकों में इस क्षेत्र में सैन्य टकराव का सबसे बड़ा उदाहरण है. ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए लगातार कोशिश करता रहे. इसके लिए नई दिल्ली को सभी पक्षों से बातचीत जारी रखनी चाहिए ताकि हिंद महासागर में संघर्ष और न बढ़े.

हवा से समुद्र तक?

एक और महत्वपूर्ण बात सामने आ रही है. अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहा टकराव अब समुद्र तक भी पहुंचता दिख रहा है. अब तक इजराइल और अमेरिका की कार्रवाई मुख्य रूप से हवाई हमलों और मिसाइलों के जरिए हुई है. ईरान ने हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा की थी, जो इस संघर्ष में समुद्री क्षेत्र की पहली बड़ी भूमिका थी. लेकिन ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी टॉरपीडो हमले के बाद यह आशंका बढ़ गई है कि यह संघर्ष समुद्र में भी फैल सकता है. आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नौसेनाएं इस टकराव को किस हद तक प्रभावित करती हैं.

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(लेखक सयांतन हलदार ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं. यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं और एनडीटीवी का इससे सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है)

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