ईरान न तो अफगानिस्तान है और न इराक, क्या केवल 'धमकी' दे रहा है अमेरिका

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अज़ीज़ुर रहमान आज़मी


पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंका कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर संकट अपने साथ कुछ नए सबक लेकर आता है. हाल के हफ्तों में अमेरिका और ईरान के तनाव काफी बढ़ गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से शक्तिशाली युद्धपोत ईरान की ओर भेजे जाने की चेतावनी के बाद से वैश्विक बहस को फिर से तेज कर दिया है. अमेरिका का पश्चिम एशिया में युद्धपोतों की तैनाती, युद्ध अभ्यास और सख्त बयानबाजी के जरिए इस क्षेत्र में युद्ध जैसा माहौल दिखता है.ऐसे में सवाल वही है, क्या युद्ध होने वाला है?

अमेरिका ने अब तक ईरान के खिलाफ कौन कौन से कदम उठाए हैं

अमेरिका ने अब तक जो कदम उठाए हैं, उनका उद्देश्य ईरान पर दवाब बनाना और अपने क्षेत्रीय साझेदारों को आश्वस्त करना है. लेकिन इसे पूर्ण रूप से युद्ध की तैयारी के रूप में नहीं देखा जा सकता है. इसमें न तो जमीन पर सैनिकों की व्यापक तैनाती हुई है और न ही युद्ध-स्तर पर लोगों को हटाया गया है, जैस देश आम तौर पर अपने नागरिकों को उन देशों से हट जाने की सलाह देते हैं, जहां खतरा होता है. दीर्घकालिक सैन्य संलग्नता को वैध ठहराने के लिए घरेलू राजनीतिक में कोई पहल भी नहीं हुई है. जब डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था,''बहुत बड़े, ताकतवर जहाज ईरान की ओर बढ़ रहे हैं.''. उनका यह बयान डर पैदा करने वाला लगा. उनका यह बयान सुर्खियां बना, बाजारों में हलचल हुई और युद्ध की अटकलें तेज हो गईं. लेकिन उनके इस बयान की परतें उघाड़ने पर तस्वीर साफ होती है. दरअसल यह युद्ध की तैयारी नहीं,बल्कि रणनीतिक दबाव है.

नौसैनिक तैनाती वह माध्यम है जिससे अमेरिका बिना स्थायी प्रतिबद्धता के ताकत दिखा सकता है. युद्धपोत आसानी से आगे-पीछे किए जा सकते हैं, हमला भी कर सकते हैं और लौट भी सकते हैं. इन्हें क्षेत्रीय हवाई क्षेत्र की जरूरत नहीं पड़ती जो आज के संदर्भ में अहम है, क्योंकि खाड़ी के कई देश ईरान के खिलाफ किसी अमेरिकी हमले में सहयोग देने से हिचक रहे हैं. इसका मतलब यह हुआ कि जहाज अधिकतम दबाव और न्यूनतम जोखिम का औजार है.

अमेरिका ईरान से चाहता क्या है

ट्रंप वास्तव में क्या मांग रहे हैं? न तो सत्ता परिवर्तन, न समर्पण. ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे न बढ़े. आंतरिक विरोध प्रदर्शनों पर हिंसक दमन रोका जाए. बातचीत के लिए ईरान मजबूर हो. असल में बातचीत के लिए ऊंची आवाज में रखी गई शर्तें हैं. यह कोर्सिव डिप्लोमेसी (दबाव कूटनीति) का क्लासिक तरीका है- संकेत तेज करो, ताकि परिणाम नरम निकले.

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ईरान की प्रतिक्रिया बताती है कि तेहरान इस संकेत को समझ रहा है. बयानबाजी कड़ी है, लेकिन व्यवहार संयमित. न हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा, न अमेरिकी ठिकानों पर सीधा हमला और मध्यस्थों के जरिए कूटनीतिक रास्ते तलाशने के संकेत ये सब संयम की ओर इशारा करते हैं, घबराहट की ओर नहीं.

सबसे अहम तथ्य पर्दे के पीछे हैं- क्षेत्रीय अनिच्छा. सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों के सहयोग के बिना किसी बड़े अमेरिकी हवाई अभियान की व्यवहारिकता घट जाती है, वह धीमा, महंगा और राजनीतिक रूप से अलग-थलग हो जाता है. यही वास्तविकता तनाव की सीमा तय करती है.

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क्या जोखिम शून्य है? 

नहीं. असली खतरा गलतफहमी का है किसी प्रॉक्सी हमले, समुद्री घटना या संकेत के गलत पढ़े जाने से सीमित टकराव हो सकता है. लेकिन इरादा निर्णायक होता है. उद्देश्य  दबाव बनाकर बातचीत की ओर धकेलने का है. ट्रंप की चेतावनी युद्ध की घोषणा नहीं, बल्कि मोलभाव का हथियार है. यह संकेतों का संकट है युद्ध की उलटी गिनती नहीं हालांकि तनावग्रस्त क्षेत्र में हर संकेत को सावधानी से संभालना ही समझदारी है.

ईरान से तनाव के बीच अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपने कई नौसैनिक बेड़ों को तैनात किया है.

असल में आक्रामक भाषा का अर्थ अनिवार्य रूप से युद्ध की तैयारी नहीं होता. अमेरिका ने हाल के दिनों में नौसैनिक तैनाती, सैन्य अभ्यास और कड़े बयान जरूर दिए हैं, लेकिन यदि इसे वास्तविक युद्ध-तैयारी के मानकों पर परखा जाए, तो तस्वीर अलग दिखती है. युद्ध की तैयारी आम तौर पर तीन स्तरों पर दिखती है-

  • जमीनी सेनाओं की बड़े पैमाने पर तैनाती
  • नागरिकों और राजनयिकों की व्यापक निकासी
  • घरेलू राजनीतिक और संसदीय वैधता हासिल करना 

इनमें से कोई भी तत्व इस समय स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं है. इसका अर्थ यह है कि अमेरिका युद्ध का विकल्प खुला रखना चाहता है, लेकिन उसी समय उससे बचना भी चाहता है. यह रणनीति दबाव बनाने के लिए है न कि सीधे टकराव के लिए.

अमेरिकी नौसैनिक शक्ति युद्ध का साधन नहीं, संदेश का माध्यम

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जहाजों पर दिया गया जोर प्रतीकात्मक है. नौसेना आधुनिक कूटनीति में एक ऐसा उपकरण है जो शक्ति दिखाता है, लेकिन स्थायी प्रतिबद्धता नहीं बनाता. खाड़ी देशों द्वारा हवाई क्षेत्र देने से इनकार के बाद नौसेना अमेरिका के लिए लगभग एकमात्र ऐसा विकल्प है जिससे वह ताकत दिखा सकता है, बिना क्षेत्रीय समर्थन पर निर्भर हुए. इसलिए जहाजों की मौजूदगी को युद्ध की घोषणा नहीं, बल्कि बातचीत में वजन बढ़ाने का तरीका समझना चाहिए.

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अमेरिका को इस बार खाड़ी के देशों में उस तरह से समर्थन मिलता हुआ नहीं दिख रहा है, जैसा कि पहले उसे मिलता रहा है.

अमेरिका के खिलाफ ईरान की रणनीति क्या है

आक्रामकता के भीतर संयम दिखाने का ईरान का रवैया इस संकट में सबसे अधिक गलत समझा गया पहलू है. बाहर से देखने पर उसकी भाषा आक्रामक लग सकती है, लेकिन व्यवहार में वह बेहद सावधानी बरत रहा है. क्योंकि ईरान जानता है कि

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  • हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद करना वैश्विक युद्ध को न्योता देना होगा.
  • अमेरिकी ठिकानों पर सीधा हमला उसे नैतिक और कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर देगा.
  • इसलिए वह असममित रणनीति अपनाता है. प्रॉक्सी समूह, साइबर क्षमताएं और राजनीतिक संदेश. इसका उद्देश्य युद्ध जीतना नहीं, बल्कि युद्ध को महंगा और जटिल बनाना है.
  • यह रणनीति सीधे टकराव से बचते हुए विरोधी को थकाने पर आधारित है.

खाड़ी देशों की भूमिका: क्षेत्रीय राजनीति का नया अध्याय

इस संकट का सबसे बड़ा बदलाव खाड़ी देशों की भूमिका में दिखाई देता है. सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की ओर से ईरान के खिलाफ किसी भी हमले के लिए अपने हवाई क्षेत्र से इनकार करना एक ऐतिहासिक संकेत है.

  • पहले: खाड़ी देश अमेरिकी रणनीति के स्वाभाविक साझेदार माने जाते थे
  • अब: वे अपने राष्ट्रीय हित, आर्थिक स्थिरता और आंतरिक सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं

उन्होंने स्पष्ट रूप से समझ लिया है कि अमेरिका–ईरान युद्ध की स्थिति में पहला नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ेगा. तेल प्रतिष्ठान, बंदरगाह, एयरपोर्ट और नागरिक ढांचा. इसीलिए उन्होंने युद्ध पर एक तरह का क्षेत्रीय अवरोध खड़ा कर दिया है.

यह युद्ध इराक या अफगानिस्तान युद्ध जैसा क्यों नहीं होगा

आम जनमानस अक्सर इराक 2003 या अफगानिस्तान 2001 की तुलना करता है, लेकिन यह तुलना भ्रामक है, क्योंकि

  • ईरान एक संगठित, केंद्रीकृत और राष्ट्रवादी राज्य है. इराक युद्ध (2003) सैन्य अड्डों, हवाई क्षेत्र और क्षेत्रीय सहयोग पर निर्भर था. लेकिन वो परिस्थितियां आज मौजूद नहीं हैं.
  • ईरान भौगोलिक रूप से विशाल है. जनसंख्या के लिहाज से बड़ा है. वह सैन्य रूप से आक्रमण की बजाय रक्षा के लिए तैयार है.
  • आक्रमण के लिए भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती, लंबी आपूर्ति श्रृंखलाओं और क्षेत्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी- इनमें से कोई भी आज मौजूद नहीं है.
  • अमेरिका और उसके सहयोगियों, दोनों में ही कब्जे के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है.

ईरान क्षेत्रीय स्तर पर जवाब देने की क्षमता रखता है. इसलिए न तो तेहरान पर चढ़ाई संभव है, न ही कब्जा. अगर संघर्ष होता भी है, तो वह सीमित, क्षेत्रीय और अप्रत्यक्ष होगा. हालांकि पूर्ण युद्ध की संभावना कम है, लेकिन जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता. इतिहास बताता है कि कई युद्ध इरादे से नहीं, बल्कि दुर्घटना से शुरू हुए हैं. यही कारण है कि मौजूदा स्थिति को खतरनाक स्थित कहा जा सकता है.

यह संकट हमें यह बताता है कि आज की दुनिया में युद्ध उतना आसान नहीं रही, जितना पहले थी. शक्ति अब केवल हथियारों से नहीं, बल्कि संयम, संकेत और क्षेत्रीय संतुलन से भी परिभाषित होती है. अमेरिका दबाव बनाना चाहता है, लेकिन फंसना नहीं चाहता. ईरान प्रतिरोध दिखाना चाहता है, लेकिन तबाही नहीं. खाड़ी देश सुरक्षा चाहते हैं, लेकिन युद्ध नहीं. यही त्रिकोण इस संकट को नियंत्रित कर रहा है. सबसे बड़ा सबक यह है कि आधुनिक युद्ध अक्सर उन लड़ाइयों से पहचाने जाते हैं, जो लड़ी ही नहीं जातीं और मौजूदा अमेरिका–ईरान संकट इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है.

डिस्क्लेमर:अज़ीज़ुर रहमान आज़मी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वेस्ट एशिया एंड नार्थ अफ़्रीकन स्टडीज विभाग में पढ़ाते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना ज़रूरी नहीं है.