इस बार विश्व आदिवासी दिवस पर दक्षिण बस्तर जिले के सर्व आदिवासी समाज के मुख्य आयोजन में 'मेरिया विद्रोह' के नायक हिडमा मांझी के प्रतिमा का अनावरण किया जाएगा. वन मंत्री केदार कश्यप इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि होंगे. 'मेरिया' शब्द की उत्पत्ति पर विवाद है, पर यह शब्द मानव बलि से जुड़ा हुआ है. ऐसा कहा जाता है कि दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर में मानव बलि की परंपरा पुरानी है. हीरालाल अपनी रॉयल एसियाटिक सोसाइटी की पुस्तक में लिखते हैं कि राजापुरा कॉपर प्लेटस में ऐसा लिखा है कि 1065 साल में मानव बलि में सहयोग के कारण उस गांव को तत्कालीन नागवंशी राजाओं ने उस गांव को दान दिया था.
दंतेश्वरी देवी किसकी कुलदेवी हैं
दंतेश्वरी आंध्र के काकतीय वंश की कुलदेवी मानी जाती हैं, जो 1324 से बस्तर पर राज कर रहे थे.लेकिन कुछ जानकार कहते हैं कि उसके पहले की नागवंशियों की माणिक्यदेवी और दंतेश्वरी एक ही हैं. गोण्डी धर्मगुरु मोती रावण कंगाली कहते हैं दंतेश्वरी दरअसल गोंड परंपरा की स्थानीय प्रकांड तंत्र साधिका और तंत्र साधक भैरव (जिनके नाम से भैरमगढ़ शहर बना) की पत्नी वेन दाई हैं. वो भैरव को इलहामाल (मृत्युंजयी) और दँतेश्वरी को लेनगुमाली (वाणीसिद्धि की माता) भी कहते हैं. लेकिन वो नरबलि की किसी परंपरा का जिक्र नहीं करते हैं.
अंग्रेज़ 1795 में बस्तर आने में असफल हो गए थे. लेकिन मराठाओं की मदद से जब बस्तर में उनकी दखलंदाजी बढ़ी तो 1822 से उन्होंने दंतेश्वरी मंदिर में मानव बलि की अपुष्ट खबरों पर नजर रखना शुरू किया.इसे वे तमाम कोशिशों के बावजूद साबित नहीं कर पाए थे.
मेरिया प्रथा बस्तर के साथ पड़ोसी ओडिसा के कोरापुट और घुमसर (कंधमाल) इलाकों में भी प्रचलित थी. वहां इस प्रथा को रोकने के अंग्रेजों के प्रयासों को बिसोई बंधुओं के नेतृत्व में कोंध आदिवासी विद्रोह के नाम से जाना जाता है, जहां आदिवासी मेरिया के नाम पर अंग्रेजों द्वारा उनकी परंपरा में हस्तक्षेप का विरोध कर रहे थे.
क्या था मोरिया विद्रोह
हिडमा मांझी ने बस्तर में इन्ही प्रयासों के विरोध में 1842 से 1863 तक 'मेरिया विद्रोह' का नेतृत्व किया. इसे बस्तर का सबसे लंबा चला विद्रोह भी कहते हैं. उनके सम्मान में छत्तीसगढ़ शासन ने 2024 में कटेकल्याण ब्लॉक के शासकीय महाविद्यालय का नामकरण उनके नाम पर किया किया. हिडमा मांझी वहां के निवासी थे.
पुराने नेताओं का सम्मान करना अच्छी परंपरा है. पर हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हम इस प्रक्रिया में किसी गलत परंपरा का सम्मान तो नहीं कर रहे हैं. अंग्रेजों ने 1829 में सती प्रथा के विरोध में कानून पास किया था. उस समय धर्म सभा के प्रमुख नेता राधाकान्त देव ने उसका जबरदस्त विरोध किया था. लेकिन इतिहास राधाकान्त देव को नहीं बल्कि राजा राममोहन राय को याद रखता है, जिन्होंने सती प्रथा का विरोध किया था. हालांकि अंग्रेज़ कभी भी बस्तर में मानव बलि को साबित नहीं कर पाए पर स्वतंत्र भारत में 1964 के जिला जनगणना अभिलेख 1949 में दो और 1953, 56, 61, 63 और 64 में एक-एक नरबलि का जिक्र करता है.
क्या बस्तर में आज भी मानव बलि की परंपरा चालू है? बस्तर के आदिवासी माओवादी नेता उनके 45 साल के आंदोलन की उपलब्धियों में मानव बलि को रोकने को अपनी एक उपलब्धि के तौर पर बताते हैं. वे कहते हैं,''हमने इस प्रथा को रोकने के लिए बस्तर के गांव-गांव में वैज्ञानिक सोच और शिक्षण का प्रसार किया.''
क्या छत्तीसगढ़ में आज भी दी जाती है नरबलि
हाल में आत्मसमर्पित एक बड़े आदिवासी माओवादी नेता केसा सोडी कहते हैं,''सबसे पहले मानव बलि की घटना हमें 1997 में सुकमा (तत्कालीन दंतेवाड़ा) जिले के करंगड़ गांव में मिली थी, जब लोगों ने बताया था कि चिंतलनार थाने के अधीन इस गांव के पनतुल वडडे (पुजारी) नर बलि देने की तैयारी कर रहे हैं.'' वो बताते हैं,''उस समय के माओवादी जिला सचिव विजय दादा (मड़कम हिडमा) के नेतृत्व में हमारे दलम ने एक जन अदालत लगाया और 15-16 लोगों की पिटाई की. उनका कहना था कि मानव बलि देने से धान की फसल अधिक होती है और भूमि की उर्वरता बढ़ती है. इससे समाज में समृद्धि आती है.''
सोडी ने बताया, ''आप जानते हैं कि बस्तर के तमाम राजा पुत्र प्राप्ति और विभिन्न कारणों से नर बलि देते रहे हैं. एक अंग्रेज़ लेफ्टिनेंट हिल ने लिखा था कि 1826 में बस्तर के राजा ने अपनी नागपुर यात्रा सफल बनाने के लिए दंतेश्वरी मंदिर में 27 लोगों की बलि दी थी हालांकि यह साबित नहीं हुआ था.''
वो कहते हैं, ''बस्तर में नरबलि अभी भी जारी है. हमें डर है कि हमारी पार्टी की हार के बाद इस तरह की घटनाएं और बढ़ेंगी. हाल में 2017 में हमें जगरगुंडा के पास वेडमा में नरबलि के बारे में बताया गया. हमने वहां जन अदालत लगाया तो लोगों ने बताया कि उनके गांव में हर साल नरबलि होती है. गांव के पुजारी ने हमें बताया वह स्वयं अपने जीवन काल में 17-18 नरबलि दे चुका है. उसके पहले उसके पिता इस परंपरा का पालन करते थे.''
उन्होंने बताया, ''हम लोगों ने वहां के आदिवासी पुजारी को सजा देने की कोशिश की तो लोगों ने विरोध किया. उन्होंने कहा उन्हें एक बार मौका देना चाहिए. उस साल वो अपनी बेटी की ही बलि देने की तैयारी कर रहा था. उसके बाद हमें कोन्टा के पास धुरमा गांव में नरबलि की खबर मिली पर हम उसे साबित नहीं कर पाए.''
21 वीं सदी में नरबलि की कहानी सुनने में अजीब लगती है. लेकिन नक्सली नेता कहते हैं, ''आप कभी वेडमा गांव जाकर पुजारी की बेटी से मिलिए जिसको हम लोगों ने जीवन दान दिया.''
यह विरोधाभास है कि हिडमा मांझी का जन्म बस्तर के बेंगलुरू गांव में हुआ. उसी नाम का शहर बेंगलुरू आज देश की वैज्ञानिक राजधानी है, जहां देश के कंप्यूटर आंदोलन का जन्म हुआ.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)