जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 फ़रवरी को इज़रायल की संसद केनेसेट में भाषण दिया, तो वे केवल एक प्रतीकात्मक 'पहली बार' दर्ज नहीं कर रहे थे. अमेरिका–ईरान में बढ़ते टकराव की पृष्ठभूमि में, उन्होंने दो दिनों के भीतर एक ऐसा टेक्नोलॉजी और सुरक्षा ढांचा सुदृढ़ किया, जो एक ओर इज़रायल के साथ दीर्घकालिक भागीदारी को संस्थागत बनाता है तो दूसरी ओर भारत को किसी औपचारिक ईरान-विरोधी सैन्य गुट से बाहर भी रखता है. संबंधों को 'शांति, नवाचार और समृद्धि हेतु विशेष रणनीतिक साझेदारी'का दर्जा मिलना इसका सबसे दृश्य संकेत है. असली प्रश्न यह है कि भारत को ठोस रूप से क्या मिला.
क्या 'विकसित भारत 2047'में भागीदार बनेगा इजरायल
पहला, भारत ने प्रौद्योगिकी संबंधों की संरचना को एक स्तर ऊपर खिसका दिया है. नई 'क्रिटिकल ऐंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज़' (CET) पहल, जिसे दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर से संचालित किया जाएगा.यह सहयोग को बिखरे हुए मंत्रालयी चैनलों से उठाकर रणनीतिक तंत्र के केंद्र में ले आती है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, जैव–प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और क्रिटिकल मिनरल्स को एक ही राजनीतिक रूप से सुपरवाइज़्ड ट्रैक में पिरोया जा रहा है. एआई पर विशेष एमओयू, भारत में स्थापित होने वाला भारत–इज़रायल साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और साझा 'होराइज़न–स्कैनिंग' तंत्र, यह संकेत देते हैं कि भारत इज़रायल को महज़ एक हथियार–आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि 'विकसित भारत 2047' की प्रौद्योगिकी आकांक्षाओं में एक संरचनात्मक भागीदार के रूप में देख रही है.
यह एक सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण पुनर्संतुलन है. दशकों तक भारत ने इज़रायली हार्डवेयर खरीदा और चुपचाप उसे सोवियत या पश्चिमी प्लेटफ़ॉर्मों में जोड़ा. अब लक्ष्य अलग है– इज़रायल की डीप–टेक लैब्स को भारतीय प्रतिभा, पूंजी और औद्योगिक पैमाने से इस तरह जोड़ना कि संयुक्त बौद्धिक संपदा पैदा हो, केवल आयातित 'ब्लैक बॉक्स' नहीं. इंडस्ट्रियल आरऐंडडी को बढ़ावा देने वाले I4F को मज़बूती देने और भारत–इज़रायल संयुक्त शोध योजनाओं के लिए अधिक वित्त आवंटित करने के निर्णय भी इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं– विश्वविद्यालयों, स्टार्ट–अप्स और बड़ी कंपनियों के बीच संस्थागत सह–नवाचार की पाइपलाइनों की ओर.
भारत और इजरायल कृषि के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाएंगे
दूसरा, कृषि और जल – साझेदारी का 'मिट्टी' वाला सिरा – दिखावे से आगे बढ़कर प्रसार के चरण में प्रवेश कर चुका है. इंडो–इज़रायल एग्रीकल्चर प्रोजेक्ट के तहत देश भर में बने चालीस से अधिक 'सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस' पहले ही लाखों किसानों को उच्च उत्पादकता वाली बागवानी और जल–संचयन तकनीकों से परिचित करा चुके हैं. यरुशलम रोडमैप में इन केंद्रों की संख्या को सौ तक ले जाने की महत्वाकांक्षा, भारत–इज़रायल इनोवेशन सेंटर फ़ॉर एग्रीकल्चर और इज़रायल के वोल्कानी संस्थान में संयुक्त शोध–फेलोशिप के साथ मिलकर, तीन ठोस परिणामों की ओर इशारा करती है.
पहला, इज़रायली ज्ञान अब केवल प्रायोगिक परियोजनाओं में नहीं, बल्कि राज्य–स्तरीय कृषि विस्तार तंत्र में स्थायी रूप से समाहित किया जा रहा है. दूसरा, एजेंडा साधारण ड्रिप–इरिगेशन से आगे बढ़कर प्रिसीज़न एग्रीकल्चर, कंट्रोल्ड–एनवायरनमेंट फ़ार्मिंग, डीसैलिनेशन–आधारित सिंचाई और एक्वाकल्चर तक फैल गया है. ऐसे क्षेत्र जिनकी ज़रूरत भारत को भूजल संकट और खाद्य–सुरक्षा की दोहरी चुनौती के बीच विशेष रूप से है. तीसरा, भारत स्वयं को इज़रायली एग्री–टेक के लिए प्राथमिक 'ग्लोबल साउथ' टेस्ट–बेड के रूप में स्थापित कर रहा है; भारतीय परिस्थितियों में निखरी तकनीक को दोनों देश मिलकर अफ्रीका और एशिया के बाज़ारों में ले जा सकते हैं. किसान–हित पर राजनीतिक वैधता टिका चुकी सरकार के लिए यह सीधे–सीधे राजनीतिक और आर्थिक पूंजी का निवेश है.
इजरायल से कब तक हथियार खरीदेगा भारत
तीसरा, रक्षा सहयोग में लंबे समय से प्रतीक्षित बदलाव – ख़रीदार–विक्रेता संबंध से क्षमता–आधारित साझेदारी की ओर – औपचारिक रूप लेता दिख रहा है. भारत सालों से इज़रायल का सबसे बड़ा हथियार–ग्राहक रहा है, लेकिन नवंबर 2025 का रक्षा–सहयोग एमओयू,जिसे अब इस यात्रा के जरिए सक्रिय रूप दिया गया है, संवाद की भाषा को बदलने की क्षमता रखता है. जिन नए पैकेजों पर विचार चल रहा है, उन्हें स्पष्ट रूप से 'मेक इन इंडिया' फ्रेम में रखा गया है, जहां को–प्रोडक्शन, लाइसेंस प्राप्त निर्माण और संयुक्त आरऐंडडी अपवाद नहीं, बल्कि डिफ़ॉल्ट विकल्प के रूप में सामने हैं.
यह इसलिए निर्णायक है कि युद्ध की प्रकृति ही बदल चुकी है. आयरन डोम जैसे वायु–रक्षा तंत्र अब केवल इंटरसेप्टर नहीं, बल्कि एक एआई–संचालित सेंसर–शूटर वेब के नोड हैं. भारत की उभरती 'मिशन सुदर्शन चक्र' अवधारणा – बहु–स्तरीय एकीकृत वायु–और–मिसाइल रक्षा ढांचा, केवल तैयार इज़रायली सिस्टम ख़रीद कर नहीं बन सकता. इसके लिए एल्गोरिद्म, बैटल–मैनेजमेंट सॉफ़्टवेयर और परीक्षण–प्रोटोकॉल तक पहुंच ज़रूरी है. यदि इजरायल इन क्षेत्रों में गहरी तकनीकी साझेदारी और निर्देशित–ऊर्जा और काउंटर–ड्रोन प्रणालियों के संयुक्त विकास की दिशा में आगे बढ़ने को तैयार है, तो यह किसी एक प्लेटफ़ॉर्म की डील से कहीं ज़्यादा महत्व रखता है. बातचीत कठिन होगी, पर राजनीतिक स्तर पर दरवाज़ा अब खुल चुका है.
भारत अब इजरायल से केवल हथियार भर नहीं खरिदेगा बल्कि वह उसका सह निर्माता और उसके विकास में भी भागीदार बनेगा.
क्या पीएम मोदी के दौरे के बाद दोनों देशों में बढ़ेगा व्यापार
चौथा, साझेदारी का आर्थिक और वित्तीय ढांचा अंततः उसकी रणनीतिक गहराई के अनुरूप बनने लगा है. रक्षा–रहित द्विपक्षीय व्यापार सालों से 6–8 अरब डॉलर के बीच ठहरा हुआ था, जबकि इज़रायली प्रौद्योगिकी और भारतीय बाज़ार के बीच स्पष्ट पूरकता मौजूद है. मोदी की यात्रा से ठीक पहले एफटीए वार्ताओं का नया दौर शुरू करना और वार्ताकारों को शीघ्र 'अर्ली हार्वेस्ट' की राजनीतिक हरी झंडी देना, यह स्वीकारोक्ति है कि इस कमी को अब और नहीं खींचा जा सकता. उच्च–तकनीकी इनपुट्स पर शुल्क घटाने, बौद्धिक संपदा के नियम स्पष्ट करने और सेवाओं के व्यापार को सरल बनाने वाला एक व्यापक एफटीए ही 'स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' के लेबल को विश्वसनीय आर्थिक आधार देगा.
फ़िनटेक एजेण्डा इस ढांचे में एक नई परत जोड़ता है. एनपीसीआई इंटरनेशनल और इज़रायल की MASAV के बीच भारत के यूनिफ़ाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (UPI) और इज़रायली फ़ास्ट पेमेंट सिस्टम को जोड़ने की सहमति कोई सामान्य तकनीकी समझौता नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ़्रास्ट्रक्चर–मॉडल का एक उन्नत अर्थव्यवस्था में निर्यात है. यदि यह जुड़ाव साकार होता है, तो दोनों देशों के बीच वास्तविक समय में कम लागत वाले खुदरा लेन–देन संभव होंगे और भविष्य के इंडिया–मिडिल ईस्ट–यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) के वित्तीय आयाम को भी आधार मिल सकता है. यह कठोर अवसंरचना के नीचे बिछाई जा रही मुलायम कनेक्टिविटी है.
इजरायल में भारत ने क्या सावधानी बरती
यह सब ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्रीय परिदृश्य बेहद विस्फोटक बना हुआ है. अमेरिका ने ईरान के विरुद्ध संभावित सैन्य कार्रवाई की चेतावनियों के बीच खाड़ी क्षेत्र में अपने हवाई और नौसैनिक संसाधनों की तैनाती बढ़ा दी है. ग़ज़ा में मानवीय क्षति को लेकर इज़रायल अंतरराष्ट्रीय आलोचना के अभूतपूर्व दबाव में है, तो ईरान मिसाइल और प्रॉक्सी क्षमताओं पर दांव दोगुना कर रहा है.भारत इन सबके बीच अपनी बहुस्तरीय उपस्थितियों– खाड़ी से ऊर्जा आयात, ईरान के चाबहार बंदरगाह में सीमित लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सेदारी, पश्चिम एशिया में विशाल प्रवासी समुदाय और तकनीक–सुरक्षा के स्रोत के रूप में इज़रायल पर दीर्घकालिक दांव के साथ खड़ा है.
इजरायल में मोदी ने यह कठिन संतुलन सोच–समझ कर साधने की कोशिश की. उनके केनेसेट भाषण में आतंकवाद के प्रश्न पर इज़रायल के साथ बिना शर्त एकजुटता दिखी; उन्होंने सात अक्तूबर के हमले को भारत के भीतर हुए बड़े आतंकी हमलों से जोड़ा और अमेरिका–समर्थित ग़ज़ा शांति रूपरेखा के प्रति समर्थन जताया. लेकिन वे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की उस प्रस्तावित 'हेक्सागन ऑफ अलायंसेज़' के खुले अनुमोदन से सावधानीपूर्वक बचे रहे, जिसका लक्ष्य तथाकथित 'कट्टर शिया और सुन्नी धुरों' का मुकाबला करना है. इसके बजाय उन्होंने I2U2 और IMEC जैसे ढांचों को उभार कर पेश किया– ऐसे मिनी–लेटरल मंच, जिनमें भारत इज़रायल, अमेरिका, यूएई और यूरोपीय भागीदारों के साथ अवसंरचना और नवाचार पर काम कर सकता है, लेकिन किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन में नहीं बंधता.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह इजरायल दौरा कृषि क्षेत्र के लिए भी उपयोगी साबित होने वाल है.
यह व्यापक पश्चिम एशिया नीति–दृष्टि के अनुरूप है, जिसमें भारत किसी भी संधि–आधारित गुट में शामिल हुए बिना, कार्यात्मक सहयोग के घने और परस्पर–आच्छादित जाल में अपनी जगह बनाना चाहता है, जहां उसके आर्थिक और सुरक्षा हित आगे बढ़ें. व्यावहारिक स्तर पर इसका अर्थ तीन समानांतर कदम हैं– इज़रायल के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी संबंधों की गहराई बढ़ाना; अमेरिका के दबाव के बावजूद तेहरान के साथ ऊर्जा और संपर्क–परियोजनाओं पर संवाद बनाए रखना और खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को केवल तेल–खरीद तक सीमित न रखकर दीर्घकालिक निवेश और प्रवासी हितों पर टिकाना.
भारत और फिलस्तीन का सवाल
आलोचक उचित रूप से पूछते हैं कि ग़ज़ा से आती भयावह तस्वीरों के बीच इस यात्रा का समय क्या भारत की नैतिक साख को चोट नहीं पहुंचा, खासकर फ़िलस्तीन के सवाल पर. इस चिंता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. लेकिन उतना ही सच यह भी है कि केवल बयानबाज़ी से भरी फ़िलिस्तीन–समर्थक भाषा और दूर से संचालित इज़रायल नीति का पुराना दौर अपनी उपयोगिता खो चुका था. एक उभरती शक्ति अपने उच्च–प्रौद्योगिकी, रक्षा और जल–सुरक्षा हितों को अनिश्चित आपूर्तिकर्ताओं के सहारे नहीं छोड़ सकती, जबकि मंचों पर आदर्शवाद का प्रदर्शन करती रहे.भारत ने साफ़–साफ़ तय कर लिया है कि इज़रायल के साथ 'बहुत क़रीबी' दिखने की क़ीमत, उसकी नवाचार–परिसंरचना में जल्दी और गहराई से समाहित होने के लाभ से कम है.
इस यात्रा के लाभ इसलिए ठोस भी हैं और सशर्त भी. ठोस, इस मायने में कि एआई, साइबर, कृषि, फ़िनटेक, शिक्षा और रक्षा पर हस्ताक्षरित ढांचे नौकरशाही और निजी क्षेत्र को स्पष्ट संकेत देते हैं. सशर्त, क्योंकि अब सारा दारोमदार क्रियान्वयन पर है – क्या एफटीए वार्ताएं घरेलू संरक्षणवादी दबावों को पार कर सकेंगी, क्या इज़रायली कंपनियां तकनीक–हस्तांतरण पर अपने प्रतिबंध ढीले करने को तैयार होंगी, क्या भारत डेटा और आईपी–प्रणालियों को इतना भरोसेमंद बना सकेगा कि उच्च–तकनीकी निवेश सहज हों और क्या IMEC अगली क्षेत्रीय उथल–पुथल को झेल पाएगा.
इसके बाद भी अगर समग्र रूप से देखें तो इजरायल ने भारत की पश्चिम एशिया रणनीति में एक शांत लेकिन गहरा पुनर्संयोजन आगे बढ़ाया है. इसने एक ऐतिहासिक रूप से गोपनीय सुरक्षा–संबंध को एक व्यापक–स्पेक्ट्रम साझेदारी में बदला है, ठीक उस समय जब क्षेत्र सबसे अनिश्चित दौर में प्रवेश कर रहा है. भारत ने प्रौद्योगिकी, कृषि, रक्षा और कनेक्टिविटी पर अपना लाभांश बढ़ाया है, बिना यह छूट खोए कि वह ईरान और अरब जगत के साथ अपने संबंध अपनी शर्तों पर गढ़े.यह एक आशावादी निष्कर्ष है, पर नासमझ नहीं. रणनीतिक साझेदारियां भावनाओं पर नहीं, विकल्पों पर टिकती हैं. मोदी की इज़रायल यात्रा ने कठिन होते क्षेत्रीय वातावरण में भारत के विकल्पों का दायरा बढ़ाया है. अब असली परीक्षा इस बात की है कि इजरायल में बने ढांचों को कारखानों, प्रयोगशालाओं, स्टार्ट–अप्स और सह–उत्पादित प्रणालियों में कितनी तेज़ी से बदला जा सकेगा. क्या एक दशक बाद भारतीय किसान, कोडर, सैनिक और नाविक यह कह सकेंगे कि सिलिकॉन से मिट्टी तक फैली यह साझेदारी उनके जीवन को मापने लायक रूप से बदल चुकी है.
डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.













