पीएम मोदी की इजरायल यात्रा से क्या और घनिष्ठ हुए हैं संबंध, क्या अब भारत केवल हथियार खरीदेगा या बनाएगा भी

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डॉ.मंजरी सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिन की इजरायल यात्रा भारत-इजरायल संबंधों के निरंतर विकास में एक महत्वपूर्ण क्षण साबित हुई. इस यात्रा ने पहले से मजबूत रणनीतिक साझेदारी को और अधिक संस्थागत रूप दिया और उसे दीर्घकालिक दिशा और संरचनात्मक गहराई प्रदान की. दोनों देशों के संबंधों का पिछले एक दशक में रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा, नवाचार, जल प्रबंधन और अंतरिक्ष सहयोग जैसे क्षेत्रों में लगातार विस्तार हुआ है. फरवरी 2026 की यह यात्रा इसलिए परिवर्तनकारी थी क्योंकि इसने कोई नया संबंध प्रारंभ नहीं किया, बल्कि मौजूदा साझेदारी को सुदृढ़, विविध और व्यापक रणनीतिक ढांचे में समाहित किया है. यह बदलते क्षेत्रीय और वैश्विक परिदृश्य के अनुकूल है.

प्रधानमंत्री मोदी की 2017 की इजरायल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया था. उसके बाद से राजनीतिक विश्वास मजबूत और द्विदलीय बना हुआ है और सहयोग पारंपरिक सुरक्षा क्षेत्र से आगे बढ़कर नवाचार आधारित क्षेत्रों तक फैल चुका है. यहां यह रेखांकित करना जरूरी है कि तथाकथित 'खरीदार-विक्रेता' संबंध मुख्य तौर पर रक्षा क्षेत्र तक सीमित रहा है, संपूर्ण संबंध पर लागू नहीं होता. कृषि क्षेत्र में इजरायली उत्कृष्टता केंद्रों ने कई भारतीय राज्यों में किसानों को सहयोग दिया है. जल प्रबंधन और ड्रिप सिंचाई में इजरायल की विशेषज्ञता का ठोस प्रभाव पड़ा है. साइबर सुरक्षा और स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र में दोनों देश अग्रदर्शी तकनीकी साझेदारी साझा करते हैं.

नया आकार लेते भारत-इजरायल संबंध

हालांकि रक्षा क्षेत्र में संबंध ऐतिहासिक रूप से अधिक लेन-देन आधारित रहे हैं. इजरायल लगातार भारत के शीर्ष रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में रहा है. भारत के हथियार आयात में उसका महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. इसके बाद भी रक्षा सहयोग को सह-विकास और सह-उत्पादन की दिशा में ले जाने का प्रयास अचानक या प्रतिक्रियात्मक बदलाव नहीं है. पिछले तीन-चार सालों में रणनीतिक संवादों, रक्षा उद्योग की बैठकों और नीतिगत परामर्शों के माध्यम से इस परिवर्तन पर चर्चा होती रही है. भारत ने 2022 से भारत ने स्पष्ट कर दिया कि इजरायल के साथ भविष्य का रक्षा सहयोग 'आत्मनिर्भर भारत' की घरेलू विनिर्माण प्राथमिकताओं के अनुरूप होना चाहिए. इसके बाद से अब भारत का जोर प्रत्यक्ष खरीद के बजाय संयुक्त अनुसंधान, प्रौद्योगिकी सहयोग और भारत में उत्पादन करने पर है.

विशेष रूप से, तेल अवीव आगमन से पहले 'सोसायटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स' और इजरायल की SIBAT के बीच हुए समझौता ज्ञापन और दीर्घकालिक रक्षा रोडमैप विकसित करने की प्रतिबद्धता इस बात को दर्शाती है कि रक्षा संबंधों को खरीदार-विक्रेता व्यवस्था से संयुक्त रूप से डिजाइन किए गए औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तित करने का प्रयास हो रहा है. मोदी की इस यात्रा ने इस दिशा में प्रयासों को और सुदृढ़ किया.

भारत की घरेलू प्राथमिकताएं क्या हैं

यह परिवर्तन भारत की व्यापक घरेलू प्राथमिकताओं के अनुरूप है. हाल के सालों में भारत में रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा है और निर्यात भी लगातार बढ़ा है. 'सृजन' पोर्टल और स्वदेशीकरण सूचियों जैसी पहलों के माध्यम से नई दिल्ली ने स्पष्ट किया है कि रक्षा अधिग्रहण का भविष्य घरेलू विनिर्माण, प्रौद्योगिकी आत्मसात और संयुक्त डिजाइन में निहित है. एक उच्च-प्रौद्योगिकी रक्षा नवोन्मेषक के रूप में इजरायल इस संक्रमण में स्वाभाविक साझेदार है.

इसके साथ ही बौद्धिक संपदा और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को लेकर इजरायली चिंताएं इस विकास की जटिलता को रेखांकित करती हैं. इजरायली कंपनियों के लिए भारत एक विशाल और विश्वसनीय बाजार है, किंतु गहन स्थानीयकरण के लिए स्वामित्व नवाचार की सुरक्षा और सार्थक औद्योगिक सहयोग के बीच संतुलन आवश्यक है. इस संक्रमण की सफलता संस्थागत सुरक्षा उपायों और विश्वास-आधारित तंत्रों पर निर्भर करेगी, जो बौद्धिक पूंजी की रक्षा करते हुए संयुक्त विकास को प्रोत्साहित करें.

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रक्षा क्षेत्र से इतर, इस यात्रा ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), साइबर सुरक्षा, भूभौतिकीय अन्वेषण (Geophysical Exploration), कृषि नवाचार और डिजिटल वित्त जैसे उभरते रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार किया. नए संस्थागत तंत्रों की स्थापना क्षेत्रीय सहयोग से प्रणालीगत एकीकरण की ओर संक्रमण को दर्शाती है.

क्या इस यात्रा से बदलेगी भारत की विदेश नीति

इस यात्रा का महत्व भारत की व्यापक विदेश नीति के विकास के संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए. भारत ने स्वतंत्र निर्णय-निर्माण को त्यागा नहीं है, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में 'रणनीतिक बहु-संरेखण' (Strategic Multialignment) के माध्यम से उसे अनुकूलित किया है.

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यह दृष्टिकोण पश्चिम एशिया में भारत की समानांतर सक्रियताओं में स्पष्ट दिखाई देता है. इजरायल के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग को गहरा करते हुए भारत ईरान के साथ भी कूटनीतिक संवाद बनाए रखता है, भले ही आर्थिक आयाम में कमी आई हो. अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव से ईरान से तेल का आयात बंद हो चुका है. चाबहार पोर्ट परियोजना की प्रगति धीमी पड़ी है. इसके विस्तार के लिए हालिया बजटीय आवंटन नहीं हुआ. इसके बाद भी भारत ने ईरान से दूरी नहीं बनाई है. राजनीतिक संवाद जारी है. भारत मानता है कि चाबहार दीर्घकालिक क्षेत्रीय संपर्क के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना हुआ है, भले ही बाहरी दबावों के कारण इसकी गति समायोजित (Recalibrated) हुई हो.

इसी प्रकार, भारत फ़िलस्तीनी राज्य की स्थापना के समर्थन की अपनी सैद्धांतिक प्रतिबद्धता को कूटनीतिक संवाद और विकासात्मक सहायता के माध्यम से बनाए रखता है. इसके साथ ही इजरायल के साथ संबंध भी मजबूत करता है. खाड़ी देशों के साथ संबंध समानांतर रूप से और अधिक गहरे हुए हैं.

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चाबहार में भारत का हित क्या है

चाबहार का उदाहरण 'बहु-संरेखण'(Multialignment) की तर्कसंगतता को स्पष्ट करता है. पारंपरिक रणनीतिक स्वायत्तता अक्सर बाहरी दबावों का पूर्ण प्रतिरोध करने का संकेत देती थी. इसके विपरीत, रणनीतिक बहु-संरेखण भारत को दीर्घकालिक संबंधों को खत्म किए बिना संलग्नता की तीव्रता और साधनों को समायोजित करने की अनुमति देता है.चाबहार के लिए ताज़ा बजटीय आवंटन का अभाव उसे छोड़ने का संकेत नहीं है, बल्कि प्रतिबंधों से सीमित वातावरण में सामरिक लचीलापन है. ह विरोधाभास नहीं, बल्कि रणनीतिक डिजाइन है.

भारत ईरान के साथ कूटनीतिक चैनल बनाए रखते हुए अन्य साझेदारियों को सुदृढ़ करता है. इससे भविष्य के रणनीतिक विकल्प सुरक्षित रहते हैं.एक अस्थिर क्षेत्र में, जहां सुरक्षा ढांचे बदल रहे हैं और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है. यह संतुलित रुख भारत की रणनीतिक गुंजाइश को विस्तार देता है. यह भारत को इज़रायल के साथ साझेदारी को मजबूत करने की इजाजत देता है, बिना उसे किसी विशिष्ट या अनन्य गठबंधन में परिवर्तित किए हुए.

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फरवरी 2026 की इस यात्रा ने आतंकवाद-रोधी सहयोग और प्रौद्योगिकी सुरक्षा पर छुकाव की भी पुष्टि की. साझा सुरक्षा चिंताएं और लोकतांत्रिक स्थिरता सहयोग की दीर्घकालिक आधारशिला प्रदान करती हैं.

भारत-इजरायल संबंधों की रणनीतिक गहराई

अंततः, प्रधानमंत्री मोदी की 2026 की यह इजरायल यात्रा पुनर्निर्माण से अधिक सुदृढ़ीकरण का प्रतीक है. इसने भारत-इजरायल संबंधों को परिपक्व रणनीतिक साझेदारी से आगे बढ़ाकर रणनीतिक गहराई की दिशा में अग्रसर किया है. इसने रक्षा सहयोग को सह-विकास और सह-उत्पादन की ओर ले जाने की लंबे समय से चर्चा में रही प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया. इसने अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार किया. इसने यह दिखाया है कि भारत एक साझेदारी को गहरा करते हुए अन्य संबंधों के साथ संतुलित संलग्नता बनाए रख सकता है.

अगर पहले के चरण राजनीतिक विश्वास और सामान्यीकरण के थे, तो यह  चरण संस्थागत गहराई, औद्योगिक एकीकरण और रणनीतिक विश्वास का है. इस दृष्टि से यह यात्रा उस साझेदारी की परिपक्वता को दर्शाती है, जो बहु ध्रुवीय दुनिया में भारत की तकनीकी महत्वाकांक्षाओं और क्षेत्रीय कूटनीति के लिए लगातार केंद्रीय होती जा रही है. 

(डिस्क्लेमर: लेखिका मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड स्टडीज (एमआरआईआईआरएस) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. वो ग्रेटर वेस्ट एशिया फोरम, इंडिया की संस्थापक सदस्य हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.) 
 

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