दुनिया में इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर चर्चा अपने चरम पर है. तकनीकी क्रांति का यह दौर केवल मशीनों की दौड़ नहीं है, बल्कि मनुष्य और बाजार के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित भी कर रहा है. इतिहासकार युवाल नोआ हरारी का यह कथन कि 'मनुष्यों ने पहली बार ऐसी तकनीक (एआई) विकसित की है जो स्वयं को बेहतर बना सकती है', इस परिवर्तन की गहराई को रेखांकित करता है. इसी व्यापक संदर्भ में नई दिल्ली में आयोजित हो रहा 'एआई इम्पैक्ट समिट 2026', जो पेरिस और सियोल में श्रृंखला का अगला चरण है.यह वैश्विक विमर्श का नया केंद्र बनने वाला है. इस मंच पर एआई के लाभ, जोखिम, नैतिकता और नीतिगत ढांचे पर चर्चा होगी, लेकिन बाजार की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही रहेगा कि एआई उपभोक्ता को किस प्रकार समझ रहा है, गढ़ रहा है और दिशा दे रहा है.
बाजार के लिए कितनी बड़ी क्रांति है एआई?
इतिहास का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि औद्योगिक क्रांति ने श्रम की संरचना और उत्पादन की प्रकृति को नए सिरे से गढ़ा, जबकि डिजिटल क्रांति ने सूचना के सृजन, प्रसार और उपभोग के तरीकों को. औद्योगिक क्रांति से पहले अधिकतर काम हाथों से होता था. लेकिन जब मशीनें आईं तो काम करने का तरीका बदल गया. लोग खेतों और छोटे कामों से निकलकर फैक्ट्रियों में मजदूर बन गए. फिर आई डिजिटल क्रांति. इस दौर में कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल तकनीक ने सूचना को बदल दिया. पहले जानकारी किताबों, अखबारों या सीमित माध्यमों से मिलती थी. अब सूचना कुछ ही सेकंड में दुनिया भर में पहुंच जाती है. किंतु आज एआई वैश्विक व्यवस्था में निर्णय लेने की संपूर्ण प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहा है. दूसरे शब्दों में, एआई उत्पादन या सूचना तक सीमित नहीं है; यह निर्णय की प्रकृति को ही पुनर्परिभाषित करने वाली क्रांति है.
एआई कैसे बदल रहा है उपभोक्ता के फैसले
हमें समझना होगा कि एआई केवल एक नई तकनीकी नहीं है, बल्कि डेटा-संचालित निर्णय प्रणाली है. आज बाजार उपभोक्ता की वर्तमान आवश्यकताओं को पढ़ने तक सीमित नहीं है; वह उसके भविष्य के व्यवहार का पूर्वानुमान भी लगाता है. बिग डेटा, मशीन लर्निंग और एल्गोरिद्मिक मॉडलिंग के माध्यम से कंपनियां उपभोक्ता के डिजिटल फुटप्रिंट यानि सर्च हिस्ट्री, खरीद पैटर्न, लोकेशन, सोशल मीडिया गतिविधि और भुगतान व्यवहार का विश्लेषण करती हैं. यह प्रक्रिया 'प्रिडिक्टिव एनालिटिक्स' कहलाती है. इसके द्वारा यह अनुमान लगाया जाता है कि उपभोक्ता कब, क्या और किस कीमत पर खरीदेगा.
इसके प्रभाव को गहराई से समझने के लिए हमें व्यवहारिक अर्थशास्त्र के 'नजिंग सिद्धांत' को समझना होगा. नजिंग का अर्थ है 'किसी व्यक्ति को बिना मजबूर किए, केवल विकल्पों की प्रस्तुति बदलकर उसके निर्णय की दिशा को प्रभावित करना.' नोबेल पुरस्कार विजेता रिचर्ड थेलर ने स्पष्ट किया था कि मनुष्य के निर्णय पूरी तरह तर्कसंगत नहीं होते. हम अक्सर संदर्भ, भावनाओं, सामाजिक संकेतों और विकल्पों की संरचना से प्रभावित होकर निर्णय लेते हैं. उदाहरण के लिए, यदि किसी कैफेटेरिया में फल और सलाद को सामने की शेल्फ पर रखा जाए और जंक फूड को पीछे, तो अधिक लोग स्वस्थ भोजन चुनते हैं. यहां किसी पर दबाव नहीं डाला गया, केवल विकल्पों की व्यवस्था बदली गई. यही नजिंग है.
उपभोक्ता के व्यवहार का अध्ययन करता AI
इसी सिद्धांत पर आज एआई काम कर रहा है.फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह प्रक्रिया डिजिटल और अत्यंत सूक्ष्म हो गई है. एआई उपभोक्ता के रियल टाइम डेटा जैसे उसकी सर्च हिस्ट्री, पिछली खरीद, लोकेशन, समय और ऑनलाइन व्यवहार का विश्लेषण करता है. इसके बाद वह ऑनलाइन बाजार में विकल्पों की संरचना इस तरह बदल देता है कि उपभोक्ता एक खास दिशा में निर्णय लेने लगे. मान लीजिए आपने किसी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर जूते देखे. अगले ही क्षण आपको 'सिर्फ दो ही बचे हैं', 'आपके लिए विशेष छूट' या 'इन्हें 5,000 लोगों ने खरीदा' जैसे संदेश दिखाई देने लगते हैं. यह संयोग नहीं है. यह एआई द्वारा तैयार की गई निर्णय-परिस्थिति है. वह आपकी मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों जैसे कमी का डर (स्कैर्सिटी इफेक्ट), भीड़ का अनुसरण (सोशल प्रूफ) या छूट का आकर्षण को सक्रिय करता है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रक्रिया किसी आक्रामक सेल्समैन की तरह सामने आकर दबाव नहीं बनाती. यह एक अदृश्य विनम्र सेल्समैन की तरह काम करती है, जो आपके व्यवहार को समझता है और उसी के अनुरूप विकल्प सजाता है. आपको लगता है कि निर्णय आपका अपना है, लेकिन वास्तव में निर्णय-परिस्थिति पहले ही सावधानी से निर्मित की जा चुकी होती है. यही वह स्थिति है जिसे शोशाना जुबॉफ ने अपनी किताब 'द एज ऑफ सर्विलांस कैपिटलिज्म'में समझाया है, जहां उपभोक्ता का व्यवहार केवल अध्ययन का विषय नहीं रहता, बल्कि स्वयं एक उत्पाद में बदल जाता है. जैसे कि जब आप इंटरनेट पर कुछ खोजते हैं, किसी पोस्ट को लाइक करते हैं, किसी वीडियो को कुछ सेकंड अधिक देखते हैं या किसी वेबसाइट पर रुकते हैं, तो आपका यह हर व्यवहार डेटा के रूप में दर्ज होता है.कंपनियां इस डेटा को इकट्ठा करती हैं, उसका विश्लेषण करती हैं और उससे आपके भविष्य के निर्णयों का अनुमान लगाती हैं. फिर इस अनुमानित व्यवहार को मार्केटिंग कंपनियां और बाजार के लिए एक मूल्यवान संसाधन की तरह इस्तेमाल किया जाता है. अर्थात अब बाजार केवल यह नहीं देख रहा कि आपने क्या खरीदा, बल्कि यह भी देख रहा है कि आप आगे क्या खरीद सकते हैं. आपके भविष्य के निर्णयों की भविष्यवाणी ही बाजार की नई पूंजी बन गई है. इस तरह उपभोक्ता केवल ग्राहक नहीं रहता, बल्कि उसका व्यवहार और उसका अनुमानित भविष्य दोनों ही बाजार के लिए संपत्ति में बदल गए हैं.
उपभोक्ता अधिक सशक्त या अधिक नियंत्रित?
एआई के दौर में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि पहले की तुलना में उपभोक्ता अधिक सशक्त हुआ है या अधिक नियंत्रित? सच यह है कि यह परिवर्तन एकतरफा नहीं है; इसमें अवसर भी हैं और आशंकाएं भी. एक ओर एआई ने उपभोक्ता अनुभव को अधिक सहज, त्वरित और व्यक्तिगत बना दिया है. आज जब कोई व्यक्ति किसी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर जाता है, तो उसे उसकी पिछली खरीद, खोज व्यवहार और रुचियों के आधार पर उत्पाद सुझाए जाते हैं. उदाहरण के लिए, यदि आपने हाल ही में फिटनेस से जुड़ी वस्तुएं खरीदी हैं, तो प्लेटफॉर्म आपको प्रोटीन सप्लीमेंट, स्पोर्ट्स शूज या फिटनेस ट्रैकर दिखाने लगेगा. इससे उपभोक्ता का समय बचता है. उसे सैकड़ों विकल्पों में भटकना नहीं पड़ता. यही नहीं, चैटबॉट और वर्चुअल असिस्टेंट चौबीसों घंटे ग्राहक सेवा उपलब्ध कराते हैं. अब ग्राहक को कॉल सेंटर पर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती; एक स्वचालित संवाद प्रणाली उसके प्रश्नों का उत्तर देती है, समस्या समझती है और समाधान सुझाती है. इससे ग्राहक जुड़ाव और संतुष्टि दोनों बढ़ते हैं.
इस परिदृश्य का दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर है. व्यक्तिगत सिफारिश प्रणालियां धीरे-धीरे उपयोगकर्ता को एक 'फिल्टर बबल' में सीमित कर सकती हैं, जहां उसे केवल वही सामग्री दिखाई जाती है जो उसकी पूर्व पसंद की पुष्टि करती है. मान लीजिए किसी व्यक्ति ने एक विशेष प्रकार के राजनीतिक या सामाजिक विचार से जुड़े वीडियो देखे; एल्गोरिद्म उसे वैसी ही और सामग्री दिखाने लगता है. इससे उसका दृष्टिकोण और अधिक एकांगी हो सकता है. इसी प्रकार, लगातार डेटा एकत्र करने की प्रक्रिया गोपनीयता की गंभीर चिंताएं उत्पन्न करती है. दुनिया में आज बड़ी संख्या में उपयोगकर्ता अपने डेटा के दुरुपयोग को लेकर चिंतित हैं. उपभोक्ता को यह भी पता नहीं होता कि उसे कोई विशेष विज्ञापन या उत्पाद क्यों दिखाया जा रहा है. यानि एल्गोरिद्म की पारदर्शिता का अभाव निर्णय प्रक्रिया को अस्पष्ट बना देता है. इसके अलावा यदि 'ट्रेन्ड डेटा' पक्षपाती हो, तो एआई भी वही पक्षपात दोहरा सकता है, इससे कुछ समूहों को अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ सकता है. सबसे सूक्ष्म और चिंताजनक पहलू है लगातार होने वाली 'नजिंग'. सीमित समय के ऑफर, सिर्फ कुछ ही शेष या छूट समाप्त होने की उलटी गिनती, ये सभी संकेत उपभोक्ता के मन में तत्काल निर्णय का दबाव उत्पन्न करते हैं. इसे अक्सर 'फोमो' अर्थात अवसर छूट जाने का डर के रूप में जाना जाता है. यह मशीन-संचालित प्रभाव इतने सूक्ष्म हैं कि उपभोक्ता को यह भी ज्ञात नहीं होता कि वह कब और कैसे प्रभावित हो रहा है. परिणामस्वरूप निर्णय लेने की स्वतंत्रता औपचारिक रूप से बनी रहती है, परंतु वास्तविकता में वह एल्गोरिद्मिक ढांचे से संचालित हो रही होती है. इस प्रकार, एआई उपभोक्ता को एक ओर सुविधा, गति और निजी अनुभव देकर सशक्त बनाता है, तो दूसरी ओर अदृश्य संरचनाओं के माध्यम से उसे निर्देशित भी करता है. यही सशक्तिकरण और नियंत्रण के बीच का द्वंद्व (पैराडॉक्स) आज के डिजिटल बाजार की सबसे बड़ी वास्तविकता है.
कंपनियों के लिए क्यों अहम है भारतीय उपभोक्ता?
भारत में डिजिटल तकनीक और एआई बहुत तेजी से फैल रहे हैं. आज दुनिया की बड़ी एआई कंपनियां भारत को बेहद महत्वपूर्ण बाजार मानती हैं. यही कारण है कि कई बड़ी कंपनियां अपने प्रीमियम एआई मॉडल भारत में मुफ्त उपलब्ध करा रही हैं. वे जानती हैं कि भारत जैसा विविधतापूर्ण, बहुभाषी और बड़े पैमाने पर इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला देश उनके मॉडलों को बेहतर तरीके से ट्रेंड करने में मदद कर सकता है. भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल इंटरनेट आबादी है. अनुमान है कि 2027 तक देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 100 करोड़ से अधिक हो सकती है. इसलिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत को केवल एक बाजार नहीं, बल्कि एक विशाल डेटा-आधार के रूप में भी देख रही हैं.
भारत के एआई बाजार की एक विशेषता यह है कि यहां आपको एक साथ तीन प्रकार के बाजार दिखाई देते हैं. एक तरफ ऐसा उच्च आय वर्ग है जो दुनिया के प्रीमियम ब्रांड और महंगे उत्पाद खरीदता है, मानो भारत के भीतर एक विकसित देश बसता हो. दूसरा, एक व्यापक मध्यम आय वर्ग, जिसकी संरचना ब्राजील, दक्षिण-पूर्व एशिया या अफ्रीका के उभरते बाजारों से मिलती-जुलती है. और तीसरा, एक बड़ा निम्न आय वर्ग है जो कीमत को सबसे ज्यादा महत्व देता है. यानी भारत अपने भीतर लगभग पूरी दुनिया जैसा बाजार समेटे हुए है. यही कारण है कि यहां 'एआई-आधारित मार्केटिंग' और 'कस्टमर एनालिटिक्स' के प्रयोग अत्यंत संवेदनशील हो जाते हैं, क्योंकि उपभोक्ता समूहों की सामाजिक, आर्थिक और डिजिटल समझ एक-दूसरे से भिन्न है.
ऐसे व्यापक और डेटा-संवेदनशील परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि ग्राहक अनुभव को बेहतर बनाने के लिए भारत में एआई-आधारित मॉडल अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं, क्योंकि यह सही उत्पाद सुझाता है, सेवाएं आसान बनाता है और समय बचाता है. इसके साथ ही, डेटा की सुरक्षा और उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है. भारत को अपने डेटा संरक्षण कानूनों को मजबूत और समयानुकूल बनाते रहना होगा, ताकि उपभोक्ता की सहमति, पारदर्शिता और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.
डिस्क्लेमर: लेखक राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला में शोधार्थी हैं.वो फाइनेंन्स ऐंड इकनॉमिक्स थिंक काउन्सिल के संस्थापक अध्यक्ष हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.














