क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पीछे हट गए? या ऐसा नहीं है? शांति स्थापित करने के उनके प्रयास इस बात का संकेत हैं कि ईरान के खिलाफ इजरायल के साथ मिलकर उन्होंने जो युद्ध शुरू किया था, वह उनके मुताबिक नहीं चल रहा है.
ईरान के नेता पीछे नहीं हटे हैं. वे हॉर्मुज जलडमरूमध्य के 'टोल बूथ' से जवाब दे रहे हैं. वे यह तय कर रहे हैं कि अमेरिका की ओर से किससे बात करेंगे. उन्हें उपराष्ट्रपति जेडी वेंस उन्हें स्वीकार्य हैं, लेकिन ट्रंप की टीम के जेरेड कुशनर और स्टीव विटकाफ नहीं.ट्रंप का 'चुना हुआ युद्ध' ईरान के 'अस्तित्व के युद्ध' से टकरा रहा है. भीषण हवाई अभियान और 10 हजार से अधिक लक्षित हमलों ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर दिया. इन हमलों ने ईरान की सैन्य संरचना का बड़ा हिस्सा नष्ट कर दिया, लेकिन उसकी जवाबी क्षमता को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाया. इसकी वजह यह है कि ईरान एक पारंपरिक नहीं, बल्कि असामान्य (Unconventional) युद्ध लड़ रहा है, वैसा नहीं जैसा अमेरिका और इजरायल ने सोचा था.
देशभर में फैले हुए हथियार और नेतृत्व को अगले स्तरों तक सौंपने से ईरान युद्ध को जारी रखने और उसे फैलाने में सक्षम रहा है. खाड़ी के देशों ने महसूस किया है कि जो भी ईरानी मिसाइलों की जद में है, वह निशाना बन सकता है, उनकी अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था भी बेअसर साबित हुई है.
हथियार बना हॉर्मुज जलडमरूमध्य
हॉर्मुज जलडमरूमध्य को 'हथियार' की तरह इस्तेमाल करने से ईरान को असाधारण ताकत मिली है. यह अमेरिका के लिए सबसे बड़ी समस्या बन गया है. हॉर्मुज जलडमरूमध्य की वजह से ईरान का करीब 20 फीसदी तेल आपूर्ति, 33–38 फीसदी उर्वरक व्यापार और सेमीकंडक्टर, रक्षा और चिकित्सा उपयोग के लिए जरूरी हीलियम के एक-तिहाई से अधिक के आवागमन पर प्रभावी नियंत्रण है. यह जलडमरूमध्य दुनिया की लाइफलाइन है, इसलिए इसे ईरान के नियंत्रण से मुक्त कराना ट्रंप की प्राथमिकता बन गया है.
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यह संकरा समुद्री गलियारा लंबे समय से ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का केंद्र रहा है. अपने परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिकी पाबंदियों के कारण आर्थिक दबाव बढ़ने पर ईरान समय-समय पर इस जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी देता रहा है, लेकिन उसने ऐसा वास्तव में कभी किया नहीं. पिछले साल जून में उसके परमाणु ठिकानों पर अमेरिकी-इजराइली हमलों के बाद भी उसने यह 'लाल रेखा' पार नहीं की थी. यह भी संभव है कि इसे अंतिम हथियार के रूप में रखने की उसकी रणनीति ने अमेरिका-इजरायल को भ्रमित कर दिया हो या वे मान बैठे हों कि युद्ध इतना लंबा नहीं चलेगा कि इस विकल्प की जरूरत पड़े.
ट्रंप का शांति प्रस्ताव और जवानों की तैनाती
एक तरफ ट्रंप जहां शांति के संकेत दे रहे हैं, वहीं उन्होंने पश्चिम एशिया में 82वीं एयरबोर्न डिवीजन को तैनात करने का आदेश दिया है. ये सैनिक पहले से भेजे जा रहे हजारों मरीन सैनिकों में शामिल होंगे. खाड़ी के देशों में करीब 50 हजार अमेरिकी सैनिक पहले से तैनात हैं. यह कदम तब सामने आया जब ट्रंप ने ईरान के बिजली संयंत्रों पर हमला न करने का फैसला किया और बातचीत के संकेत दिए.
क्या ये युद्ध के लक्षण हैं या शांति के संकेत? ट्रंप ने पाकिस्तान के जरिए ईरान को 15 बिंदुओं का शांति प्रस्ताव भेजा है. इसमें उसके परमाणु कार्यक्रम को फ्रीज करना, संवर्धित यूरेनियम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में रखना, नागरिक परमाणु ऊर्जा में अमेरिकी सहायता और पाबंदियां हटाना शामिल है.
ईरान ने अमेरिका के इस प्रस्ताव को खारिज कर अपने मांग पत्र में खाड़ी के इलाके में अमेरिकी ठिकानों को बंद करने, पाबंदियों को हटाने, भविष्य में हमले न करने की गारंटी और हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क वसूलने के अधिकार को मान्यता देने (जैसे स्वेज नहर में होता है) की मांग की है. शुरुआती बातचीत अक्सर अधिकतम मांगों से शुरू होती है, लेकिन यह उम्मीद की बात है कि दोनों पक्ष संवाद कर रहे हैं.
अमेरिका में ट्रंप के समर्थकों का रुख क्या है
सैनिकों की तैनाती और शांति प्रस्ताव,ये विरोधाभासी कदम ट्रंप की कार्यशैली को दर्शाते हैं. व्हाइट हाउस अक्सर 'ताकत के जरिए शांति'की बात करता है. पिछले तीन हफ्तों में ट्रंप कई बार यह दावा कर चुके हैं कि उन्होंने ईरान की नौसेना और 80 फीसदी मिसाइल लॉन्चर साइट नष्ट कर इस युद्ध को 'जीत' लिया है. उन्होंने यह संदेश अपने 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' (MAGA) को समर्थन देने वाले लोगों को ध्यान में रखकर दिया है. हालांकि ट्रंप के समर्थकों का यह वर्ग ईरान युद्ध को लेकर उत्साहित नहीं हैं क्योंकि ट्रंप के नेतृत्व में जिस 'स्वर्ण युग' का वादा किया गया था, वह युद्धों से मुक्त होना चाहिए था. लेकिन कुल मिलाकर एमएजीए के समर्थक इस युद्ध में भागीदार हैं, सिवाय पॉडकास्टर टकर कार्लसन और मेगन केली जैसे कुछ मुखर हस्तियों को छोड़कर.
ईरान के लिए शांति प्रस्ताव का मकसद बाजारों को शांत करना भी लगता है, क्योंकि तेल की कीमतें बढ़ने से पेट्रोल-डीजल महंगे हो गए हैं और उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ी है. खराब जनमत सर्वेक्षणों ने ट्रंप पर दबाव डाला है कि वे लागत कम करें और युद्ध समाप्त करें.
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23 मार्च को घोषित पांच दिन के युद्धविराम से तेल की कीमतें गिरीं.इससे कुछ व्यापारियों ने भारी मुनाफा कमाया. इस पर अंदरूनी व्यापार (Insider Trading) के आरोप लगे हैं, लेकिन जांच की संभावना कम दिखती है. कुशनर और विटकॉफ जैसे लोग अपने व्यावसायिक और राजनीतिक हितों को मिलाकर काम करने के लिए जाने जाते हैं. इस युद्ध में एक पक्ष, जो शांति विराम से खुश नहीं है, वह है इजरायल. उसके लक्ष्य अलग हैं. वह ईरान और लेबनान में अपने सैन्य उद्देश्यों को जल्दी पूरा करना चाहता है. हॉर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना उसकी प्राथमिकता नहीं है, क्योंकि उसकी निर्भरता कम है.
इजयराल के लक्ष्यों का क्या हुआ
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान को अस्तित्व के लिए खतरा मानते हैं. उनका लक्ष्य है, ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता खत्म करना, उसके परमाणु कार्यक्रम को निष्क्रिय करना और वहां के हालात बदलना ताकि जनता सत्ता अपने हाथ में ले सके. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वे कैसे सुनिश्चित करेंगे कि ये लक्ष्य पूरे हो गए हैं. उनके खुफिया अधिकारियों का अनुमान था कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व के खत्म होने के बाद जनता सड़कों पर उतर आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि लोगों में डर और गुस्सा बढ़ा. हालिया दमन और फांसी की घटनाओं के बाद यह संभावना कम है कि ईरानी जनता जल्द ही खुलकर विरोध करेगी.
जहां तक खाड़ी देशों का सवाल है, उन्होंने युद्ध की आलोचना भी की है और अमेरिका से काम पूरा करने की मांग भी की है. उन्होंने यह भी सीखा है कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मेजबानी करने का जोखिम, उससे मिलने वाली सुरक्षा से ज्यादा हो सकता है.खाड़ी के देश एक कठिन स्थिति में फंसे हुए हैं, एक तरफ ईरान के साथ सह-अस्तित्व, दूसरी तरफ लगातार युद्ध का खतरा.वे अमेरिका से संबंध नहीं तोड़ेंगे, लेकिन भविष्य में सुरक्षा के अन्य विकल्प भी तलाश सकते हैं. जब यह युद्ध खत्म होगा, तब वह इलाका और दुनिया दोनों शायद पहले जैसे नहीं रहेंगे.
डिस्क्लेमर: लेखिका अमेरिका में रहने वाली वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लेख लिखती रहती हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.














