नार्वे की राजधानी ओस्लो में बीते कुछ वर्षों से एक बहुत दिलचस्प लेकिन उतनी ही गंभीर परियोजना पर काम हो रहा है. ओस्लो से बाहर स्प्रूस यानी फर के एक हज़ार वृक्षों का एक जंगल विकसित किया जा रहा है. ये पेड़ सौ साल बाद काटे जाएंगे, इनसे काग़ज़ बनेगा और इन पर सौ किताबें छापी जाएंगी.ये कौन सी किताबें होंगी? जैसे पेड़ लगाए जा रहे हैं वैसे ही किताबें भी रोपी जा रही हैं. हर साल किसी एक लेखक से एक पांडुलिपि ली जा रही है जो उसके जीवन काल में नहीं छपेगी. यह पांडुलिपि सीधे सौ साल बाद छपेगी.
फ्यूचर लाइब्रेरी- भविष्य का पुस्तकालय- नाम की यह परियोजना एक कलाकार केटी पैटर्सन की है. 2014 में यह पुस्तकालय शुरू किया गया है और 2114 तक यह इसी रूप में चलेगा. जाहिर है, जिन लोगों ने यह पुस्तकालय शुरू किया है, वे भी ये सौ किताबें देखने को शायद ही जीवित होंगे. जो लोग इस काम में उनके मददगार हैं, वे भी ये किताबें देख नहीं पाएंगे. यही नहीं, जिन लेखकों ने ये किताबें लिखी हैं या लिखेंगे, उनमें आख़िरी वर्षों के लेखकों को छोड़ दें तो बाक़ी अपनी छपी किताबें तक नहीं देख पाएंगे. वे नहीं जान पाएंगे कि उनकी किताबों के पाठक कौन हैं और उनकी प्रतिक्रियाएं कैसी हैं.
जाहिर है, यह परियोजना सौ साल का धीरज चाहती है. जिस समय हम सोशल मीडिया पर त्वरित लेखन और त्वरित प्रतिक्रिया की लगभग लत में डूबे हुए हैं, उस समय कुछ लेखक अपने लिखे हुए के प्रकशन के लिए सौ बरस का इंतज़ार करने को तैयार हैं, यह बात कुछ हैरान करती है. फिर यहां भी जिन लेखकों से पांडुलिपि ली जा रही है, वे जाने-माने लेखक हैं. मसलन, इस परियोजना के लिए पहली पांडुलिपि मार्गरेट ऐटवुड ने दी जो बुकर सहित कई प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान हासिल करने वाली लेखक हैं. अभी वे 86 साल की हैं और जब में उन्होंने अपनी किताब 'स्क्रिब्लर मून' इस परियोजना के लिए दी थी, तब वे 75 पार की थीं.
ऐटवुड के अलावा साहित्य के लिए नोबेल सम्मान विजेता दक्षिण कोरियाई लेखक हान कांग ने भी इस परियोजना के लिए अपनी पांडुलिपि दी है. उनके अलावा ब्रिटिश कॉमेडियन डेविड मिचेल, आइसलैंड के कवि और उपन्यासकार शॉन, तुर्की की मशहूर लेखिका एलिफ़ शफ़क और नार्वे के कार्ल ओव क्नॉसगार्ड जैसे लेखक अपनी पांडुलिपि इस परियोजना के लिए दे चुके हैं. ओशन व्यौंग, टॉमी ऑरेंज सहित कुल 11 लेखक अब तक इस परियोजना में शामिल हैं. ख़ास बात ये है कि लेखकों की इस सूची में 12वें लेखक भारत के अमिताभ घोष भी हैं जो इसी साल जून तक अपनी पांडुलिपि दे देंगे- यानी एक ऐसी किताब जो अगले 88 साल तक राज़ बनी रहेगी और फिर पता चलेगा कि उन्होंने क्य लिखा है. जाहिर है, तब यह देखने के लिए न वे होंगे न हम होंगे.
यह खयाल आता है कि क्या इस परियोजना के लिए अपनी किताबें लिखते हुए इन लेखकों ने उस कालखंड का ध्यान रखा होगा जिसे पार कर इनकी कृतियां छपेंगी? जिस अनजान अदृश्य पीढ़ी के लिए ये लोग किताबें लिख रहे हैं, उसका कुछ भान भी इन्हें होगा? दुनिया जिस तेज़ी से बदल रही है, उसमें लगता है कि अभी ही इक्कीसवीं सदी पुरानी पड़ चुकी और हम बाईसवीं सदी में दाख़िल हो रहे हैं. सौ साल बाद क्या प्रकाशन की दुनिया वही रह जाएगी जो अभी है? क्या तब ओस्लो के जंगल में रोपे हुए फर के वृक्षों की लकड़ी से कागज बनेंगे और फिर उन पर किसी प्रिंटिंग प्रेस में या किसी आधुनिक प्रिंटर के ज़रिए किताबें छपेंगी?
इन सबको लेकर बस क़यास ही लगाए जा सकते हैं. किसी भी लेखक को यह इजाज़त नहीं है कि वह अपनी पांडुलिपि का राज़ खोले. अधिकतम बस वह अपनी किताब का शीर्षक बता सकता है- जो सार्वजनिक है. ये सब पांडुलिपियां ओस्लो की न्यू डाइकमैन लाइब्रेरी के एक साइलेंट रूम में रखी जा रही हैं और इन्हें दूर से देखा भी जा सकता है.
फ्यूचर लाइब्रेरी ऐसी ही विराट परियोजना है जिसका इरादा हमारे समय की सर्वश्रेष्ठ रचनात्मकता और कल्पनाशीलता को एक सदी के बाद के पाठकों के लिए बचाए रखने का है. वैसे यह सच है कि दुनिया जितनी तेज़ी से बदलती है, उतनी ही ज़िद के साथ पुरानेपन से जकड़ी भी रहती है. तो संभव है, सौ साल बाद दुनिया में काफी कुछ बदल चुका हो, लेकिन तब भी बहुत कुछ ऐसा होगा जो बदलने से इनकार करता होगा- समंदर अपनी जगह लहराते रहेंगे, हिमालय कुछ और ऊंचा हो चुका होगा, धरती शायद इस सदी के मुक़ाबले कुछ संभली हुई होगी और इंसान अपने अकेलेपन से जूझने के लिए कुछ नए तरीक़े खोज रहा होगा. या इसका उल्टा भी संभव है. हिमनदियां पिघल चुकी होंगी, जंगल और कम हो चुके होंगे, नदियों और पहाड़ों का वजूद घट रहा होगा और कंक्रीट की इमारतों में बने संग्रहालयों में हमारी आने वाली पीढ़ियां पुरानी दुनिया की बहुत सारी निशानियां देखकर हैरान हुआ करेंगी.
वैसे किताबों के लिए सौ साल की उम्र कोई बड़ी बात नहीं है. जिन्हें हम क्लासिक्स कहते हैं, उनमें ढाई-तीन हजार साल पुराने ग्रंथ भी शामिल हैं जो आज ज़्यादा प्रासंगिक लगते हैं. जिसे आधुनिक हिंदी साहित्य कहते हैं, उसकी भी कई रचनाएं सौ साल से ज़्यादा पुरानी हो चुकी हैं. प्रेमचंद की बहुत सारी कहानियां सौ साल पुरानी हो चुकी हैं, गांधी का 'हिंद स्वराज' और टैगोर का 'गोरा' और पुराने हैं. 'गीतांजलि' को नोबेल सम्मान मिले सौ साल से ऊपर हो चुका. मीर और ग़ालिब जैसे शायर तो और पुराने हैं. कबीर-तुलसी पांच सौ साल से ज़्यादा की उम्र जी चुके. हज़ार बरस पुराने अमीर ख़ुसरो और दो हज़ार बरस से ज़्यादा पुराने कालिदास भी खूब पढ़े, गाए और प्रस्तुत किए जाते हैं. तो किताबों के लिए सौ बरस की उम्र कोई बड़ी उम्र नहीं है- बल्कि यह उनकी श्रेष्ठता की न्यूनतम कसौटी कही जा सकती है.
लेखकों के भीतर यह कामना होती है कि उनकी कृतियां सदियों तक जीवित रहें. लेकिन सौ साल बाद छपने के लिए किताबें अभी से तैयार हों, उनके लिए काग़ज पैदा करने वाले वृक्ष अभी से रोपे जाएं, लेखक यह कल्पना करें कि सौ साल बाद के उनके पाठक कैसे होंगे, हर साल एक किताब के साथ समय नाम के विराट पुल को पार करने की कोशिश हो, अचानक बरसों तक खोई आवाज़ें जाग उठें और किसी को सुनाई पड़ने लगें- यह खयाल अपने-आप में बहुत अनूठा और मानवीय है.
प्रियदर्शन NDTV इंडिया में सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर हैं...
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