क्रिंगल मेस्पी उत्तर बस्तर के कांकेर जिले के जंगल में अम्पी नदी के किनारे बसा एक छोटा सा गांव है. कभी यहां 25 परिवार रहते थे. फिर माओवादी आए. आज जब माओवादी जा चुके हैं, गांव में केवल आठ परिवार बचे हैं. बाकी जान बचाने गांव छोड़ने मजबूर हुए थे. अधिकांश पास के कस्बे पखांजूर आकर दिहाड़ी मजदूरी करते हैं; सबसे पहले बेदखल किए गए गांव के मुखिया (पटेल) का परिवार भी यही कर रहा है.
माओवादियों के शिकार कौन हैं
माओवादियों ने सबसे पहले 2002 में पटेल सुक्कालू आचला को पुलिस मुखबिर बताकर मारा. फिर 2006 में उनके बेटे को मार दिया, उन्हें भी मुखबिर बताया गया. अभी कुछ दिन पहले टेलीफोन पर मेरी बात पटेल सुक्कालू आचला के पोते सुन्हेर आचला से हुई.वो पखांजूर में मजदूरी करते हैं. उन्होंने बताया कि माओवादियों ने 2008 में मेरे दो भाइयों को मार दिया था, उसके बाद मैंने गांव छोड़ने का फैसला किया. हमारा परिवार बड़ा है और हमारे पास काफी जमीन भी है. गांव छोड़ने से पहले सरकार ने हमें वनाधिकार कानून के तहत करीब 20 एकड़ जमीन के पट्टे भी दिए थे. सुन्हेर ने बताया था कि हमने इसकी रिपोर्ट पुलिस में नहीं की. हमें डर था कि अगर ऐसा किया तो माओवादी और लोगों को मारेंगे. लेकिन 2018 में जब हमारे परिवार के पांचवें सदस्य की हत्या हुई, तब मैं पुलिस के पास गया. पुलिस ने मुझसे मृतक की हड्डियां जांच के लिए लाने को कहा. बारिश में नदी पार करना मुश्किल था, इसलिए देर हो गई और पुलिस ने मामला खारिज कर दिया. मैंने मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाया और कई बार जिला मुख्यालय कांकेर और राजधानी रायपुर गया, लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं हुई.
सुन्हेर ने मुझे बताया था कि माओवादियों ने मेरे गांव में आठ लोगों को मार डाला था, लेकिन केवल एक दुग्गा परिवार के दुकालू को ही पुलिस में नौकरी मिली. उसे कोई मुआवजा नहीं मिला. कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा ब्लॉक के परतापुर थाना क्षेत्र में माओवादी हिंसा के करीब 70 फीसदी पीड़ितों ने डर की वजह से पुलिस में शिकायत ही नहीं की है. सुन्हेर ने बताया था कि उनका गांव अबूझमाड़ के पास है, जिसे माओवादियों का मुख्यालय कहा जाता था. वहां पूरे इलाके में कोई पुलिस थाना नहीं था. आप वहां की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं. मैं आपको अपने ब्लॉक के उन लोगों की सूची दे सकता हूं जिन्होंने शिकायत नहीं की है.
छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा के पीड़ित कितने हैं
एक बार मैंने नारायणपुर के एसपी मोहित गर्ग से बातचीत की थी, जिनके अधिकार क्षेत्र में अबूझमाड़ भी आता है. उन्होंने बताया था कि उनके जिले में करीब 70 फीसदी माओवाद पीड़ित सरकारी सूची में नहीं हैं. मैं अबूझमाड़ से एक विधवा को उनके पास ले गया था, ताकि उनका नाम पीड़ितों की सूची में जोड़ा जा सके. उन्होंने कहा था कि सरकार से कहिए कानून बदले. मौजूदा कानून के तहत मुझे उससे डीएनए टेस्ट के लिए हड्डियां लाने के लिए कहना होगा और मुझे पता है कि वह ऐसा करने के लिए अबूझमाड़ वापस नहीं जा सकती हैं.
अब जब माओवादी जा चुके हैं, सुन्हेर आचला अपने गांव क्रिंगल मेस्पी लौटने के बारे में सोच रहे हैं, हालांकि वहां जाने के लिए अभी भी सड़क नहीं बनी है. उन्होंने कहा कि पिछले 20 साल में और जो लोग इधर-उधर बिखर गए थे, वे भी लौटने की सोच रहे हैं. छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा में हुई आम लोगों की हुई हत्याएं सरकारी संख्या करीब 2000 बताई जाती हैं. वहीं दक्षिण बस्तर के सुकमा में सीपीआई के पूर्व नेता मनीष कुंजाम के मुताबिक दक्षिण बस्तर में भी यह संख्या बहुत बड़ी होगी. वो बताते हैं कि माओवादियों डर की वजह से बहुत से लोगों ने बिना पुलिस को बताए ही अपने परिजनों के शव को दफना दिया था.
क्या छत्तीसगढ़ सरकार बनाएगी पीड़ितों का रजिस्टर
'माओवाद के बाद का भविष्य' विषय पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने 'बस्तर 2.0' नाम से एक खाका हाल में प्रधानमंत्री को दिया है. अभी तक इसकी विस्तृत जानकारी नहीं है, केवल एक प्रेस नोट जारी हुआ है. इसमें इस आधी सदी लंबे संघर्ष के सभी पीड़ितों की पूरी सूची बनाने की बात शामिल नहीं है. हमें लगता है 'बस्तर 2.0' की शुरुआत पीड़ितों का एक रजिस्टर बनाने से होनी चाहिए. करीब 50 हजार लोग, जिन्हें अपने घरों से भागना पड़ा था और जो आज भी आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रह रहे हैं, अब तक वापस नहीं लौटे हैं.
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के दबाव में छत्तीसगढ़ सरकार ने इन विस्थापितों का सर्वे किया है और एक पुनर्वास योजना बना रही है. यह देर से लिया गया लेकिन स्वागत योग्य फैसला है. अधिकांश विस्थापित वापस लौटने को लेकर सशंकित हैं, लेकिन वे पुनर्वास नीति का इंतजार कर रहे हैं. राज्य को सलवा जुडूम और राज्य की हिंसा के पीड़ितों का भी सर्वे करना चाहिए. और उन्हें भी सूची में शामिल करना चाहिए. माओवादी राज्य हिंसा के दस्तावेजीकरण में काफी सक्रिय रहे हैं, इसलिए यह काम मुश्किल नहीं होगा. पूर्व माओवादी और मानवाधिकार कार्यकर्ता इन सूचियों को आसानी से उपलब्ध करा सकते हैं.
क्या कभी टकरा सकते हैं माओवाद पीड़ित और पूर्व माओवादी
'माओवाद के बाद का भविष्य' के लिए सभी पक्षों के पीड़ितों को एक साथ बैठकर अपने लंबे समय से लंबित मुद्दों पर गहरी चर्चा करनी होगी. अपनी पीड़ा बतानी होगी. यह सब आसान नहीं होगा. इसके लिए सरकार गांधी के सेवाग्राम की तर्ज पर रायपुर में बनी उस संरचना का उपयोग कर सकती है, जिसे पिछली कांग्रेस सरकार ने बनाया था और जो अभी भी अनुपयोगी पड़ी है. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करना जरूरी है.
क्रिंगल मेस्पी गांव से छह लोग माओवादी बने थे. आश्चर्यजनक रूप से आचला परिवार की एक लड़की, रजोंती भी उनमें शामिल थी. उनमें से तीन पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए और तीन ने आत्मसमर्पण कर दिया है. मैंने जब सुन्हेर से यह पूछा कि आपके गांव ने बहुत कुछ झेला है, लेकिन अगर रजोंती और अन्य जीवित पूर्व माओवादी लौटना चाहें तो क्या आप उनका स्वागत करेंगे? इस पर उन्होंने जवाब दिया,''यह उनका भी गांव है.'' सुन्हेर ने बताया कि उनके गांव के वे लोग जो माओवादी बने माओवादियों ने उन्हें दूर-दराज के इलाकों में तैनात किया था, इसलिए उन्होंने हमारे गांव में कोई हत्या नहीं की. लेकिन जिन्होंने हमारे परिवार और गांव के लोगों को मारा है, उन्हें हम माफ नहीं करेंगे. भविष्य में होने वाले इस तरह के संघर्षों को संभालना राज्य की जिम्मेदारी है. उम्मीद है 'बस्तर 2.0' योजना में इस पर विचार किया जाएगा. इसमें पुराने जख्मों पर मरहम लगाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)
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