जिमखाना क्लब में ही दी गई थी पाकिस्तान जाने वाले सैनिकों की विदाई, तब ब्रिगेडियर करियप्पा ने कहा था...

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विवेक शुक्ला

छह अगस्त 1947 की शाम. दिल्ली की गर्म हवा में भी एक ठंडक थी, जो शायद दिलों की उथल-पुथल से पैदा हो रही थी. इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब की हरी-भरी लॉन्स और भव्य बॉलरूम में रोशनी की मद्धिम चमक फैली हुई थी. रंग-बिरंगी साड़ियों में महिलाएं चमक रही थीं, जबकि खाकी वर्दी में सजे अफसर एक-दूसरे से आंखें मिलाने की कोशिश कर रहे थे. यह कोई साधारण पार्टी नहीं थी. यह ब्रिटिश भारतीय सेना के उन साथियों की अंतिम विदाई थी, जो अब पाकिस्तान की नई फौज में शामिल होने वाले थे.

ब्रिगेडियर कोदंडेरा माधप्पा करियप्पा, जो बाद में भारत के फील्ड मार्शल बने, उस शाम के मेजबान थे. उन्होंने अपनी यूनिट के साथियों को यह विदाई पार्टी दी थी. किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लापिएर ने इसे 'सबसे भावुक विदाई' कहा है.

किसने डिजाइन किया था जिमखाना क्लब

क्लब की इमारत, जिसकी डिजाइन रॉबर्ट टॉर रसेल ने बनाई थी, उस शाम खास तौर पर सजी हुई थी. लॉन्स पर टेंट लगे थे, जहां टेबलों पर व्हिस्की, जीन और भारतीय व्यंजनों की महक फैली हुई थी. बॉलरूम में बैंड बज रहा था. अफसर एक-दूसरे को गले लगा रहे थे, पुरानी यादें ताजा कर रहे थे.''याद है, 1942 में बर्मा फ्रंट पर कैसे हम साथ लड़े थे?'' एक मुस्लिम अफसर ने अपने हिंदू साथी से पूछा. ''हां, और वो रात जब हमने जापानी हमले का सामना किया था. तुमने मेरी जान बचाई थी,'' दूसरे ने जवाब दिया, आंखें नम हो गईं.

विभाजन की घोषणा हो चुकी थी. देश दो टुकड़ों में बंटने वाला था. सेना भी बंट रही थी. जो मुस्लिम अफसर पाकिस्तान जाना चाहते थे, उन्हें विदा करने के लिए यह आयोजन किया गया था. निमंत्रण कार्ड पर लिखा था- 'The Officers of the Armed Forces of the Dominion of India' द्वारा 'Farewell to Old Comrades Reception in honour of the Officers of the Armed Forces of the Dominion of Pakistan.'

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करियप्पा साहब उस समय ब्रिगेडियर थे. वे राजपूत रेजिमेंट के पहले भारतीय कमांडर थे.ऊंचे कद-काठी, सख्त चेहरा लेकिन दिल में नरमी. उन्होंने पूरे कार्यक्रम की मेजबानी की. शाम ढलते-ढलते उन्होंने बॉलरूम के ऊंचे प्लेटफॉर्म पर चढ़कर सबको चुप रहने का इशारा किया. सबकी नजरें उन पर टिक गईं. उन्होंने गहरी आवाज में बोलना शुरू किया,''मेरे प्यारे साथियों, हमने इतने लंबे समय तक एक साझा किस्मत को साझा किया है कि हमारी कहानी अब अलग नहीं की जा सकती. हम भाई थे. हम हमेशा भाई रहेंगे. और हम कभी नहीं भूलेंगे वे महान साल जो हमने साथ गुजारे हैं." उनके इस भाषण पर हॉल में सन्नाटा छा गया. फिर तालियां गूंजीं. कई अफसरों की आंखों में आंसू थे. पाकिस्तान जाने वाले एक मेजर ने आगे बढ़कर करियप्पा को गले लगा लिया.उन्होंने कहा,''सर, यह दर्द भरा है.'' करियप्पा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,''दर्द इसलिए है क्योंकि रिश्ते गहरे थे. लेकिन नई शुरुआत में भी हमें इस दोस्ती को जिंदा रखना होगा.''

फूट पड़ा था यादों का समंदर

पार्टी देर रात तक चली. अफसर पुरानी कहानियां सुनाते रहे. बातें  द्वितीय विश्व युद्ध के मैदान और  कैंटोनमेंट के दिनों की हो रही थीं. महिलाएं एक कोने में बैठकर बतिया रही थीं. कुछ सोच रही थीं कि कल क्या होगा. दिल्ली से लाहौर, रावलपिंडी तक का सफर अब दुश्मनी की सीमा पार करना बन जाएगा.

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एक युवा कैप्टन, जो पाकिस्तान जा रहा था, अपने भारतीय दोस्त से बोला,''मेरा सामान अभी भी दिल्ली में ही रखा है. सोचा था, जब सब शांत हो जाएगा तो आकर ले जाऊंगा.'' दोस्त ने उसका कंधा थपथपाया,''हां, जरूर आना. हम इंतजार करेंगे.''

लेकिन इतिहास कुछ और ही लिखने वाला था. कुछ महीनों बाद ही कश्मीर पर हमला हुआ. वही अफसर, जो सामान छोड़ गए थे, अब दुश्मन की तरफ से लड़ रहे थे. दोस्ती की वह शाम, युद्ध की पहली रात में बदल गई.
फ्रीडम एट मिडनाइट में लेखकों ने लिखा है कि उस शाम क्लब पर 'अत्यधिक उदासी' का माहौल था. ब्रिटिश राज की आखिरी शामें थीं. जिमखाना क्लब, जो कभी सिर्फ ब्रिटिश एलीट के लिए था, अब भारतीय और पाकिस्तानी अफसरों की भावनाओं का गवाह बन रहा था.उस शाम पाकिस्तान जा रहे एक मुसलमान अफसर को उनके जूनियर साथियों ने अलग से एक गिफ्ट दिया. उस फसर का नाम था, ब्रिगेडियर अगा रजा. 

करियप्पा बाद में भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ बने. उन्होंने हमेशा पेशेवर फौजी रहने पर जोर दिया. पाकिस्तान के साथ भी उन्होंने दोस्ती की बात की. एक बार जब उनका बेटा पाकिस्तान में युद्धबंदी था, तब भी उन्होंने राष्ट्र को प्राथमिकता दी. 

उस शाम की याद आज भी जिमखाना क्लब की दीवारों में बसी है. क्लब अब नई चुनौतियों का सामना कर रहा है, लेकिन 1947 की वह विदाई पार्टी उसकी शानदार विरासत का हिस्सा बनी हुई है. यह घटना सिर्फ एक पार्टी नहीं थी. यह विभाजन के दर्द की कहानी थी. दो भाइयों की कहानी, जिन्हें मजबूरी में अलग होना पड़ा. करियप्पा का भाषण आज भी प्रेरणा देता है कि दुश्मनी के बीच भी इंसानियत और पुरानी दोस्ती को याद रखना चाहिए.

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(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अलग-अलग विषयों पर लेख लिखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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