युद्ध के बीच बेमानी है  'अर्थ ऑवर', युद्ध से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को जानकर हिल जाएंगे आप 

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हिमांशु जोशी

हर साल मार्च के आखिरी शनिवार को दुनिया भर में 'अर्थ ऑवर' (Earth Hour) मनाया जाता है. इस साल यह 28 मार्च को हुआ जब रात 8:30 से 9:30 बजे के बीच गैर जरूरी लाइट्स बंद कर दी गईं. 'अर्थ ऑवर' की शुरुआत  World Wide Fund for Nature ने की थी. इसका उद्देश्य लोगों को ऊर्जा बचाने और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराना है.लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सिर्फ एक घंटे के लिए अंधेरा करना काफी है, जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध की आग पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंचा रही है. एक तरफ हम 'अर्थ ऑवर' के जरिए पर्यावरण को बचाने की बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ युद्ध उस कोशिश को कमजोर करते नजर आते हैं. 

युद्ध से होने वाला नुकसान कितना बड़ा है 

बरेली कॉलेज, उत्तर प्रदेश के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर जसपाल सिंह के मुताबिक युद्ध का असर केवल सीमाओं या राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह हमारे पर्यावरण को एक ऐसा गहरा जख्म देता है जो दशकों तक नहीं भरता. जब युद्ध होता है, तो बम, मिसाइल और रासायनिक हथियारों के अंधाधुंध इस्तेमाल से हमारी मिट्टी और पानी दोनों ही जहरीले हो जाते हैं. धमाकों के बाद लेड (Lead), मरकरी (Mercury), सीसा (Cadmium) और यूरेनियम (Uranium) जैसी भारी धातु मिट्टी की परतों में गहराई तक मिल जाती हैं. इससे जमीन की प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है और वह क्षेत्र कई सालों तक खेती के लायक नहीं रहती है. हथियारों से निकलने वाले जहरीले रसायन और 'एजेंट ऑरेंज' (Agent Orange) जैसे घातक पदार्थ वर्षा जल के साथ रिसकर भूजल में मिल जाते हैं. यह प्रदूषित पानी न केवल पीने के अनुपयुक्त हो जाता है, बल्कि इसके सेवन से कैंसर और जन्मजात विकृतियों जैसी गंभीर बीमारियां बढ़ने लगती हैं. 

इसका सबसे भयावह उदाहरण वियतनाम युद्ध में देखा गया, जहां जहरीले रसायनों का असर आज भी वहां की पीढ़ियों के स्वास्थ्य में दिखाई देता है. यह प्रदूषित तत्व खाद्य श्रृंखला के जरिए इंसानों और जानवरों के शरीर में पहुंचकर उनके जीवन चक्र को बाधित करते हैं. इसके अतिरिक्त, युद्ध के दौरान जंगलों की कटाई और प्राकृतिक आवासों का विनाश पारिस्थितिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देता है. बमबारी और सैन्य गतिविधियों के कारण कई दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियां बेघर हो जाती हैं और विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाती हैं.

कैसे पर्यावरण का गला घोंटता है युद्ध

युद्ध की वजह से तेल के कुओं, औद्योगिक केंद्रों या अन्य जगह लगी आग वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी दमघोंटू गैसें घोल देती है. साल के 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान कुवैत के तेल कुओं की आग ने महीनों तक आसमान को काला रखा और समुद्री जीवन को अपूरणीय क्षति पहुंचाई. इस समय रूस-यूक्रेन युद्ध में भी बांधों के टूटने और औद्योगिक संयंत्रों पर हमलों के कारण बड़े स्तर पर पर्यावरणीय तबाही देखने को मिल रही है. सरल शब्दों में कहें तो युद्ध का असली नुकसान केवल दिखाई देने वाली तबाही नहीं है, बल्कि इसका गहरा और अदृश्य असर प्रकृति और मानव जीवन पर सालों तक पड़ता रहता है. यह आने वाली पीढ़ियों से उनकी साफ हवा, शुद्ध पानी और उपजाऊ जमीन छीन लेने वाला एक अक्षम्य अपराध है. प्रकृति की कोई सीमा नहीं होती इसलिए एक क्षेत्र में हुआ पर्यावरणीय विनाश अंततः पूरी मानवता के भविष्य को खतरे में डाल देता है.

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क्या युद्ध के दौरान पर्यावरण बचाने का कोई नियम भी है

बातचीत के दौरान हमने यह भी जानना चाहा कि क्या दुनिया में ऐसे कोई ठोस नियम हैं जो युद्ध के बीच भी पर्यावरण की रक्षा सुनिश्चित करते हों.इस सवाल पर डॉक्टर जसपाल सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध के दौरान पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई नियम और संधियां हैं, जिनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संघर्ष के कारण प्रकृति को अनावश्यक और लंबे समय तक नुकसान न पहुंचे.इसके बाद भी इन नियमों की प्रभावशीलता सीमित मानी जाती है, क्योंकि इन्हें लागू करना कठिन होता है और कई बार देशों द्वारा इनका उल्लंघन किया जाता है.

सबसे प्रमुख नियम Geneva Conventions से जुड़े हैं.ये युद्ध के दौरान मानवीय व्यवहार को नियंत्रित करते हैं. इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि बिना किसी सैन्य आवश्यकता के किसी भी प्रकार का विनाश नहीं किया जाना चाहिए. उदाहरण के तौर पर, यदि किसी क्षेत्र में दुश्मन की सेना नहीं है, तो वहां के जंगलों को जलाना या खेती की जमीन को नष्ट करना अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ माना जाएगा. इसी प्रकार ENMOD Convention एक विशेष संधि है, जो पर्यावरण को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से रोकती है. इसका उद्देश्य यह है कि कोई भी देश मौसम, जलवायु या प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदलकर दूसरे देश को नुकसान न पहुंचाए. उदाहरण के रूप में, यदि कोई देश कृत्रिम रूप से भारी वर्षा कराकर बाढ़ ला दे या सूखा उत्पन्न कर दे, तो यह इस संधि का उल्लंघन होगा. हालांकि इस प्रकार के प्रयोग खुले तौर पर कम देखे गए हैं, लेकिन अतीत में ऐसी तकनीकों पर शोध किया गया था.

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इसके अलावा Additional Protocol I में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ऐसे तरीकों और हथियारों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए, जो पर्यावरण को 'व्यापक, दीर्घकालिक और गंभीर' नुकसान पहुंचाएं. सामान्य रूप से अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून यह सिद्धांत देता है कि सभी देशों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी गतिविधियों से दूसरे देशों के पर्यावरण का नुकसान न करें. उदाहरण के लिए, यदि किसी देश की सैन्य गतिविधियों से पड़ोसी देश की नदियां प्रदूषित होती हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जा सकता है.

लेबनान के एक शहर पर इजरायली हमले के बाद उठता धुंआ.
Photo Credit: PTI

क्यों कमजोर पड़ जाते हैं युद्ध में पर्यावरण बचाने के नियम

अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) ने भी अपने निर्णयों में यह माना है कि पर्यावरण की सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय कानून का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे संघर्ष के समय भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. हालांकि आईसीजे केवल तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब देश उसके अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करें, जिससे इसकी शक्ति सीमित हो जाती है. इन सभी बिंदुओं से यह स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उनके पालन में कई चुनौतियां हैं. सबसे बड़ी समस्या यह है कि 'दीर्घकालिक और गंभीर नुकसान' को साबित करना कठिन होता है और कई बार देशों को जवाबदेह ठहराने के लिए कोई सख्त दंड व्यवस्था नहीं होती. राजनीतिक हित भी इन नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा डालते हैं.

डॉक्टर जसपाल के मुताबिक युद्ध के दौरान पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय नीतियां एक महत्वपूर्ण शुरुआत हैं, लेकिन उन्हें और अधिक सशक्त, स्पष्ट और लागू करने योग्य बनाने की आवश्यकता है. जब तक सख्त नियम, निगरानी प्रणाली और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक पर्यावरण को पूरी तरह सुरक्षित रखना संभव नहीं होगा.

(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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