होली: भारत के समाज में कैसे रचा-बसा है यह पर्व

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मेधा

फाल्गुन की सांझ जब सुनहरी धूल से भर जाती है, खेतों में पकती गेहूं और जौ की बालियां हवा के साथ झूमने लगती हैं, आम्र-मंजरियां अपनी मीठी सुगंध से वातावरण को मदहोश कर रही होती हैं, कोयल की पहली मीठी कूक वातावरण में स्वरलहरी घोल रही होती है, सेमल के तप्त लाल फूल जब मनुष्य को जीवन की उष्मा से भर रहे होते हैं, तब फगुआ बयार आकर हौले से कान में कहती है,''होली आ गई है ...''

यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि भारत का लोक जीवन ऋतुओं के साथ सांस लेता है. यहां पर्व केवल तिथियां नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना के उत्सव हैं. इन उत्सवों में सबसे निराला उत्सव है होली- रंगों, उमंगों, हास्य, प्रेम और परम आत्मीयता का पर्व हमारी प्यारी होली! फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि भारतीय जीवन की सामूहिक स्मृति, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक संवाद और आध्यात्मिक प्रतीकवाद का विराट उत्सव है. लोक जीवन में यह पर्व जितना उल्लासपूर्ण है, लोक साहित्य में उतना ही बहुरंगी, भावपूर्ण और चिंतनशील. यह उत्सव एक साथ कई स्तरों पर घटित होता है, पौराणिक आख्यान, ऋतु परिवर्तन, कृषक जीवन की उमंग और उम्मीद, प्रेम और श्रृंगार का विस्तार, सामाजिक व्यंग्य, स्त्री स्वर की मुखरता और सामूहिकता का आलोक, इन सब आयामों में रंगी है हमारी होली. 

ऋतु परिवर्तन और कृषक जीवन की चेतना

होली का समय वसंत ऋतु का उत्कर्ष है. भारतीय कृषि प्रधान समाज में यह नई फसल की खुशी का भी उत्सव है. खेतों में गेहूं और जौ की बालियां पकने लगती हैं. किसान की मेहनत रंग लाती है. इसीलिए होली के गीतों में प्रकृति का उल्लास प्रमुखता से दिखाई देता है-

फागुन आयो रे, अंगना में फूली सरसों,
अम्मा के मुख पे आई हंसी.

यहां प्रकृति और मनुष्य का संबंध जीवंत है. लोक जीवन में ऋतु परिवर्तन केवल मौसम नहीं, बल्कि भाव परिवर्तन भी है. शीत की सकुचाहट के बाद वसंत का विस्तार भरा वितान मन की मुक्ति-पर्व का प्रतीक बन जाता है.

होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है.

पौराणिक आधार और लोकविश्वास: मिथक से लोक तक

होली की जड़ें भारतीय पौराणिक परंपरा में गहराई तक धंसी हुई हैं. सबसे प्रसिद्ध कथा है प्रह्लाद और होलिका की. यह कथा असत्य और अत्याचार पर भक्ति और सत्य की विजय का प्रतीक है. लोकगीतों में यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं रहती, बल्कि सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लेती है. ग्रामीण अंचलों में गाया जाने वाला गीत है- 

होली आई रे प्रह्लाद बचाए,
जली होलिका, दंभ मिटाए.

यहां 'दंभ' केवल हिरण्यकश्यप का नहीं, बल्कि हर प्रकार के अन्याय और अहंकार का प्रतीक है. लोकजीवन में होलिका दहन सामूहिक शुद्धि का अनुष्ठान बन जाता है, पुराने क्लेश, ईर्ष्या और दुर्भावना को अग्नि को समर्पित कर नए संबंधों की शुरुआत का प्रतीक भी है होलिका दहन.

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ब्रज क्षेत्र में होली का संबंध कृष्ण और राधा की लीलाओं से जुड़ जाता है. कृष्ण का श्याम रंग और राधा का गौर वर्ण- रंगों के इस खेल में सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतीकवाद भी छिपा है. रंग यहां भेद मिटाने का माध्यम है. ब्रज की होली अपनी समस्त लोक संरचना में आध्यात्मिक है. होली की मनोभूमि रास से प्रेरित है और यहां रंगरेज तो परम प्यारा ही है,जो आत्मा को अपने रंग में रंग देता है- 

वृंदावन आज मची होरी, वृंदावन।
बाजत ताल, मृदंग, झांझ, ढप,
बरसत रंग, उड़त रौरी, वृंदावन।
कित्ते आए कुँवर कन्हैया,
कित्ते आई राधा गोरी, वृंदावन।
वृंदावन से कुँवर कन्हैया,
बरसाने से राधा गोरी, वृंदावन।
कौन के हाथ कनक पिचकारी,
कौन के हाथ अबीर झोरी, वृंदावन।
कृष्ण के हाथ कनक पिचकारी,
राधा के हाथ अबीर झोरी, वृंदावन।

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लोक जीवन में होली: सामूहिकता का उत्सव

ग्रामीण भारत में होली केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाली प्रक्रिया है. होलिका दहन की तैयारी में पूरा गांव सम्मिलित होता है. लकड़ियां, उपले, सूखी टहनियां- सब मिलकर इकट्ठी की जाती हैं. बच्चे 'समिधा' के लिए घर-घर जाते हैं. महिलाएं मंगलगीत गाती हैं. बुजुर्ग लोककथाएं सुनाते हैं. होली के दिन सामाजिक भेदभाव क्षीण हो जाते हैं. जाति, वर्ग, आयु और लिंग की दीवारें रंगों के साथ धुंधली पड़ जाती हैं.'बुरा न मानो होली है' का वाक्य लोक जीवन की सहजता और क्षमाशीलता का परिचायक है. उस दिन सालों की दुश्मनी भूल कर लोग एक-दूसरे से प्यार से गले मिलते हैं. दरअसल बाहरी रंग तो दिलों में भरे प्रेम और उमंग की अभिव्यक्ति भर हैं. 

होली का समय वसंत ऋतु का उत्कर्ष है. भारतीय कृषि प्रधान समाज में यह नई फसल की खुशी का भी उत्सव है.

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लोक साहित्य में होली: गीत, फाग और हास्य

लोक साहित्य में होली का सबसे सशक्त रूप है- फाग गीत. फाग, धमार, होरियां और चौताल- ये सब होली के गीतात्मक रूप हैं. होली के लोकगीत भारतीय समाज के विविध मनोभावों की सहज और विनोदपूर्ण अभिव्यक्ति के माध्यम से मनोरेचन का भी काम करते हैं. 

ब्रज का फाग: ब्रजभूमि में गाए जाने वाले फागों में राधा-कृष्ण की प्रेमलीलाएं जीवंत हो उठती हैं. विश्व प्रसिद्ध ब्रज की होली भारतीय समाज की जीवंतता और उसके आध्यात्मिक स्वरूप का प्रतीक है. कृष्ण राधा के संग गोपियां की होली परमात्मा से मिलकर आत्मा के परमानंद में डूब जाने की कथा भी कहती हैं. भारतीय पर्व की पंरपराएं इस मायने में अद्भुत हैं कि वह जीवन की परम भौतिकता में भी आध्यात्मिकता का द्वार खोल देते हैं. वृंदावन की होली इसी अर्थ में अनोखी है कि वह लौकिक और अलौकिक दोनों ही आनंद को एकाकार कर देती है. परमप्रेम की प्रतीक मीरा के इस पद का भावबोध ब्रज की लोकरंजित होली में अंतर्निहित है- 

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फागुन के दिन चार होली खेल मना रे।।
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे।
बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे।।
सील संतोख की केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे।।
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे।।

लौकिक स्तर पर देखें तो ब्रज के इन होली गीतों में श्रृंगार और हास्य का अद्भुत समन्वय है. लोकभाषा की मिठास और भावों की सहजता इन गीतों को कालजयी बनाती हैं. ये लोकगीत होली के पर्व को भावरंजित कर मानव मन के रेचन का माध्यम बन जाते हैं.

अवध और बुंदेलखंड की होली

ब्रज की होली में कृष्ण और राधा के प्रेम का रंग बिखरा है, तो अवध की होली में दशरथ के राम की अनुगूंज सुनाई पड़ती है- अवध में भला रघुवीर के बिना होली कैसे खेली जा सकती है- 

अवध मां होली खेलैं रघुवीरा 
ओ केकरे हाथ ढोलक भल सोहै, 
केकरे हाथे मंजीरा.
राम के हाथ ढोलक भल सोहै, 
लछिमन हाथे मंजीरा.
ए केकरे हाथ कनक पिचकारी, 
ए केकरे हाथे अबीरा.
ए भरत के हाथ कनक पिचकारी 
शत्रुघन हाथे अबीरा.

बुंदेलखंड में फाग का स्वर अधिक उत्साही और ऊर्जावान होता है. ढोलक और मंजीरे की थाप पर गाए जाने वाले ये गीत सामूहिक नृत्य को प्रेरित करते हैं.

रसिया रंग भर-भर जिन मारो,
पिचकारी दृगन तक न मारो।
न गहो छैल गैल बिच बहियां,
पैयां पडूं मैं बलिहारी। पिचकारी...
जो सुन पैहें सास ननद मोरी,
सुन रूठ जैहें पिया प्यारो। पिचकारी...
चन्द्रसखी भज बाल कृष्ण छवि,
चरण कमल पे बलिहारी। पिचकारी...

भोजपुरी का फगुआ 

भोजपुरी क्षेत्र में 'फगुआ' गीतों में हास्य और व्यंग्य की विशेष भूमिका होती है. ऐसा नहीं कि इन लोकगीतों में केवल उमंग और उल्लास ही है. आर्थिक कारणों से हो रहे विस्थापन और घर-परिवार को छोड़ बाहर कमाने गए पिया के वापस बुलाने की दर्द भरी पुकार भी है-

फागुन के आइल बहार हो बलमुआ
छोड़ द नोकरिया घरे आव, आहे घरे आव।।

बहुधा भोजपुरी लोकगीतों में होली सामाजिक आलोचना का माध्यम भी बन जाती हैं, तो कभी स्त्री-अकांक्षा की सहज अभिव्यक्ति भी - 

ससुराल में होली खेलब, साजन संग

इन गीतों में देवर-भाभी संवाद, ननद-भौजाई की नोकझोंक और ससुराल-पिहर के संबंधों का हास्यपूर्ण चित्रण मिलता है. लोकगीत सामाजिक तनाव को हंसी में बदल देते हैं.

लठमार, हुरंगा और लोकनाट्य: उत्सव का जीवंत अभिनय

कुछ क्षेत्रों में होली केवल गीतों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जीवंत अभिनय और खेल के रूप में सामने आती है. कहीं रंग की होली, कहीं फूलों की, कहीं लठमार, तो कहीं हुरंगा. 

लठमार होली केवल खेल नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों का उलटफेर भी है, जहां एक दिन के लिए ही सही शक्ति संतुलन बदल जाता है.

इन परंपराओं में हास्य, प्रतीक और सामूहिक भागीदारी का विशेष महत्व होता है. लठमार होली में स्त्रियों का पुरुषों को प्रतीकात्मक रूप से लाठी मारना केवल खेल नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों का उलटफेर भी है, जहां एक दिन के लिए  ही सही शक्ति संतुलन बदल जाता है. 

लोकगीतों में इसका वर्णन मिलता है-

बरसाने की होरी निराली,
लाठी चले, हंसे नंदलाली.

होलियाना: हास्य और सामाजिक आलोचना का लोक मंच

होली का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका हास्य-व्यंग्य है. कई गांवों में 'होलियाना' या 'फगुआ' के नाम से ऐसे गीत गाए जाते हैं, जिनमें गांव के मुखिया, जमींदार, शिक्षक या सामाजिक घटनाओं पर हल्का-फुल्का व्यंग्य किया जाता है- 

होली में उड़े रे गुलाल,
साहेब जी भूल गए अपना रौब-रुआब.

यह परंपरा लोक-समाज को बिना टकराव के आत्ममंथन का अवसर देती है. साल भर दबे रहने वाले भाव इस दिन हंसी में बदल जाते हैं. यही कारण है कि होली को सामाजिक तनाव-मुक्ति का पर्व भी कहा जा सकता है.

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता होली में भी झलकती है. बरसाना की लठमार होली में स्त्रियां पुरुषों को प्रतीकात्मक रूप से लाठियों से मारती हैं और पुरुष ढाल से बचाव करते हैं. यह परंपरा राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी मानी जाती है. मथुरा और वृंदावन की फूलों की होली में मंदिरों में फूलों की वर्षा होती है, भजन-कीर्तन गूंजते हैं. आनंदपुर साहिब का होला मोहल्ला के रूप में होली के उत्सव में वीरता और आध्यात्मिकता का संगम दिखता है.पश्चिम बंगाल में रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा प्रारंभ की गई बंगाल की बसंतोत्सव होली की परंपरा में पीले वस्त्र, गीत और नृत्य के साथ होली मनाई जाती है.

स्त्री स्वर और आत्म-अभिव्यक्ति

होली लोक साहित्य में स्त्री की मुखर उपस्थिति का पर्व है. अधिकांष भारतीय समाजों में स्त्री को अपनी भावनाओं की मुखर अभिव्यक्ति का स्पेस नहीं मिलता है. लेकिन स्त्री हो या पुरुष भावनाओं की अभिव्यक्ति उसकी नैसर्गिक आवश्यकता है. ऐसे में होली का पर्व स्त्रियों को स्पेस उपलब्ध कराता है. वे होली के अवसर पर गीतों के माध्यम से खुलकर अपनी भावनाओं को बेहिचक अभिव्यक्ति कर पाती हैं-

अरी सखी! आज मोहे रंग दो पिया,
बरसाने की होरी में.

आज के समय में बदलती होली

आज शहरीकरण और बाजारवाद ने होली के स्वरूप को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है. रासायनिक रंगों, पानी की बर्बादी और अशालीन व्यवहार ने इस उत्सव की आत्मा को चुनौती दी है. लेकिन साथ ही कुछ सकारात्मक परिवर्तन भी देखे जा रहे हैं. परंतु साथ ही पर्यावरण-अनुकूल रंगों और सांस्कृतिक पुनरुद्धार की पहल भी हो रही है. टेसू के फूलों से रंग बनाना, सूखी होली खेलना और पारंपरिक लोकगीतों को पुनर्जीवित करना- इस तरह के प्रयास लोक संस्कृति को पुनः जीवंत बना रहे हैं.

कह सकते हैं कि होली भारतीय लोक जीवन का जीवंत महाकाव्य है. इसमें मिथक है, इतिहास है, प्रेम है, व्यंग्य है, स्त्री स्वर है, कृषक जीवन की आशा है और आध्यात्मिक उन्मेष है. लोक साहित्य ने इस उत्सव को शब्द, स्वर और स्मृति दी है. जब फागुन की हवा चलती है और ढोलक की थाप पर फाग गूंजता है, तब लगता है कि सदियों पुरानी लोक परंपरा आज भी हमारे भीतर जीवित है. होली हमें सिखाती है कि जीवन रंगों से भरा है, बस उन्हें अपनाने की दृष्टि चाहिए.

होली अंततः प्रेम, समरसता और पुनर्नवीकरण का उत्सव है- जहां लोक जीवन और लोक साहित्य एक-दूसरे में घुल-मिलकर भारतीय संस्कृति का विराट इंद्रधनुष रचते हैं.

डिस्क्लेमर: लेखिका मेधा दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में पढ़ाती हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखिका के निजी हैं और उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.

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