बांग्लादेश चुनाव 2026: तारिक रहमान की जीत और जमात-ए-इस्लामी की हार के मायने क्या हैं

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Veena Sikri

बांग्लादेश के संसदीय चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की भारी जीत का महत्व समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि दूसरा विकल्प क्या था. और कैसे वह करीब-करीब सफल हो गया था.

बांग्लादेश का संसदीय चुनाव क्या समावेशी था

बांग्लादेश का 13वां राष्ट्रीय संसदीय चुनाव पूरी तरह समावेशी नहीं था. देश की सबसे बड़ी पार्टी अवामी लीग को चुनाव में भाग लेने से रोक दिया गया.यह फैसला जमात-ए-इस्लामी के कहने पर लिया गया. पांच अगस्त 2024 को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद, पिछले 18 महीनों तक देश पर जमात-ए-इस्लामी का पूरा प्रभाव रहा. डॉक्टर मोहम्मद यूनुस उसके फैसलों को लागू करने वाले मुख्य चेहरे के रूप में काम कर रहे थे. कहा गया कि यह पूरी प्रक्रिया एक सुनियोजित सत्ता परिवर्तन थी. इसमें पाकिस्तान के जरिए काम हुआ. इसे पश्चिमी दुनिया के लोकतांत्रिक देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ) का समर्थन हासिल था, जबकि चीन को इसकी जानकारी थी.

इन 18 महीनों में जमात-ए-इस्लामी ने लोकतंत्र की लगभग हर संस्था पर कब्जा जमा लिया. भीड़ की ताकत और सड़क की  राजनीति का इस्तेमाल कर कई महत्वपूर्ण लोगों से इस्तीफा दिलवाया गया. उनकी जगह अपने समर्थकों को नियुक्त किया गया. इसमें न्यायपालिका, प्रशासन, विश्वविद्यालयों के कुलपति और प्रोफेसर और मीडिया तक शामिल थे. जमात-ए-इस्लामी ने अपने पुराने सहयोगी बीएनपी से दूरी बनाकर अन्य इस्लामी दलों और संगठनों के साथ गठबंधन किया. इनमें इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश, हिज्बुत  ताहिर और हिफाजत-ए-इस्लाम बांग्लादेश शामिल थे. ये संगठन शरिया कानून और खलीफा के शासन के समर्थक हैं. साल 1971 के मुक्ति संग्राम की यादों को मिटाने और 1972 के संविधान के उदार और धर्मनिरपेक्ष प्रावधानों को बदलने की कोशिश की गई. सुधार के नाम पर जुलाई 2025 में राष्ट्रीय चार्टर लाया गया. इससे चुनाव टाल दिए गए. काम करने और घर से बाहर निकलने की आजादी जैसे महिलाओं के अधिकार निशाने पर रहे. अल्पसंख्यकों पर लगातार हमले किए गए ताकि वे देश छोड़ने पर मजबूर हों.

जमात-ए-इस्लामी किस कोशिश में थी

12 फरवरी 2026 को हुए चुनाव का मुख्य उद्देश्य सत्ता पर पूरी तरह कब्जा करना था. माना जा रहा था कि जमात-ए-इस्लामी जीत जाएगी, चाहे अकेले या राष्ट्रीय एकता वाली सरकार के जरिए, जिसमें जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी दोनों शामिल हों. अमेरिका ने भी एक मीडिया रिपोर्ट के जरिए जमात-ए-इस्लामी के प्रति अपनी पसंद जताई थी. अमेरिकी अखबार 'वॉशिंगटन पोस्ट'ने एक महिला पत्रकार और एक अमेरिकी पत्रकार के बीच हुई बातचीत प्रकाशित की थी.  इन 18 महीनों के दौरान देश की स्थिति बेहद खराब हो गई. कानून-व्यवस्था लगभग खत्म हो गई, अराजकता फैल गई, महिलाओं की सुरक्षा कमजोर हुई और अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई. भारत के साथ आर्थिक सहयोग की व्यवस्था को तोड़ने के फैसलों ने हालात और बिगाड़ दिए.

लेकिन आखिर में जमात-ए-इस्लामी अपनी बनाई समस्याओं की जिम्मेदारी से बच नहीं सकी. लोगों ने ऊपर-ऊपर तो उसके लिए समर्थन दिखाया, लेकिन मतदान के समय उन्होंने बीएनपी को बड़ी संख्या में वोट दिया. ऐसा अनुमान था कि यदि महिलाएं, अल्पसंख्यक और अवामी लीग समर्थक बीएनपी को वोट देंगी तो उसे 200 से अधिक सीटें मिलेंगी. ऐसा ही हुआ. युवा मतदाताओं (Gen Z) ने नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) को भी नकार दिया. युवाओं का कहना है कि धर्म और संस्कृति साथ-साथ चल सकते हैं, लेकिन संतुलन जरूरी है. जमात-ए-इस्लामी के साफ-सुथरे और भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन की छवि को भारी नुकसान पहुंचा है.

तारीक रहमान का रुख क्या है

आम चुनाव में मिली शानदार जीत के बाद तारीक रहमान ने परिपक्व और जिम्मेदार रवैया अपनाते हुए तेजी से कदम उठाए हैं. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को जश्न मनाने से रोक दिया, क्योंकि ऐसे जश्न पहले अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा में बदल चुके थे. चुनाव में मिली जीत के बाद आयोजित पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में कानून-व्यवस्था को हर हाल में बनाए रखने पर जोर दिया. जब एक पाकिस्तानी पत्रकार ने शेख हसीना के प्रत्यर्पण का सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि यह एक कानूनी प्रक्रिया है. उन्होंने कैबिनेट सचिव बदलकर जमात-ए-इस्लामी के प्रभाव को कम करना शुरू किया, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है. 

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बाग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने इस चुनाव में शानदार जीत दर्ज की है.

अवामी लीग को राजनीति की मुख्यधारा में फिर शामिल करने की दिशा में भी कुछ प्रयास किए गए हैं. बीएनपी की जीत की घोषणा के 24 घंटों के भीतर ही ऐसी खबरें आने लगीं कि बीएनपी कार्यकर्ताओं ने यूनुस प्रशासन की ओर से अवामी लीग के दफ्तरों पर लगाए गए ताले तोड़ दिए है, खासकर उन जिलों और चुनाव क्षेत्रों में जहां बीएनपी-अवामी लीग का अनौपचारिक सहयोग प्रभावी रहा था. जमात-ए-इस्लामी को नियंत्रण में रखने के लिए अवामी लीग और बीएनपी के बीच बढ़ती समझ और समन्वय बेहद जरूरी है. हालांकि, जमात-ए-इस्लामी के बीएनपी के साथ मजबूत संबंध हैं. वे हर मौके पर इसका फायदा उठाने की कोशिश करेंगे. यहां तक ​​कि जनमत संग्रह में भी, तारिक रहमान ने 'नहीं' वोट के लिए प्रचार किया था, लेकिन उन पर दबाव डाला गया और उन्होंने अपना रुख बदलकर 'हां' वोट का समर्थन किया.

भारत की प्रतिक्रिया और प्राथमिकताएं

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस चुनाव में मिली शानदार जीत पर तारीक रहमान को बधाई देने वाले पहले विदेशी नेता थे. उन्होंने लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश को भारत के समर्थन और दोनों देशों के बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने और साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए साथ मिलकर काम करने की उत्सुकता जताई. दोनों नेताओं में टेलीफोन पर हुई रचनात्मक और मैत्रीपूर्ण चर्चा ने द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण बदलाव की नींव रखी.

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भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता वाले दो मुद्दे हमारी सुरक्षा सीमाएं और आर्थिक सहयोग ढांचा हैं, खासतौर पर पिछले 15 सालों में पारस्परिक लाभ और आपसी संवेदनशीलता के सम्मान पर आधारित मजबूत व्यापार, निवेश और संपर्क साझेदारियों का निरंतर विकास. पिछले 18 महीनों के दौरान, यूनुस सरकार ने जानबूझकर ऐसे निर्णय लिए हैं जिन्होंने भारत के सुरक्षा वातावरण को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है. इनमें पूर्वोत्तर भारतीय विद्रोही समूहों को समर्थन देना, दोषी आतंकवादियों और धार्मिक कट्टरपंथियों की रिहाई की अनुमति देना और पाकिस्तान और बांग्लादेश की सेनाओं के बीच अभूतपूर्व संबंधों को पुनर्जीवित करना (जो 1971 से पहले के युग की याद दिलाते हैं) शामिल हैं.

कैसे बहाल होगी सीमा पर सुरक्षा और समन्वय

जमात-ए-इस्लामी पार्टी हमेशा से भारत के साथ ज़मीनी सीमा (खासकर पश्चिम बंगाल के साथ) पर अपनी गतिविधियों पर ज़ोर देती रही है. वह अवैध प्रवासियों को घुसपैठ कराती है, पशु तस्करों से संबंध बनाती है और स्थानीय लोगों में भारत-विरोधी भावनाएं भड़काती है. 12 फरवरी को हुए चुनाव में जमात-ए-इस्लामी ने 68 सीटें जीतीं, जो अब तक की उसकी सबसे बड़ी जीत है. इनमें से कई सीटें (करीब 40) भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित निर्वाचन क्षेत्रों में हैं, खासकर पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के साथ लगती सीमा वाले इलाकों में. निर्वाचित सांसद का स्थानीय जिला अधिकारियों पर बहुत प्रभाव हो सकता है. तारिक रहमान सरकार के साथ सीमा सुरक्षा के सभी पहलुओं पर सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है. सीमा सुरक्षा बलों, बीएसएफ और बीजीबी (बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश) को किसी भी समस्या को सुलझाने और उसका समाधान करने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है, खासकर तब जब समन्वित सीमा प्रबंधन के लिए पहले से ही सहमत प्रोटोकॉल मौजूद हैं.

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इसी तरह आर्थिक सहयोग के सभी मुद्दों पर यूनुस सरकार के कुछ ऐसे निर्णय हैं, जिन्होंने बांग्लादेश के रेडीमेड गारमेंट कारखानों की भारत से कच्चे माल (कपास, सूती धागा, कृत्रिम धागा) की आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है. यहां तक कि इसे पूरी तरह बाधित भी किया है.बांग्लादेश में सैकड़ों कारखाने बंद हो गए हैं और हजारों, बल्कि लाखों महिलाएं बेरोजगार हो गई हैं. तुर्की, पाकिस्तान और यहां तक कि अमेरिका भी भारत को 'प्रतिस्थापित' करने के लिए दबाव बना रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश के लोग जानते हैं कि उनके लिए क्या बेहतर है. जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ मतदान में आया बदलाव इसका प्रमाण है. इन मुद्दों पर तारिक रहमान का रुख स्पष्ट नहीं है, लेकिन वे आश्वस्त रह सकते हैं कि भारत उनकी सहायता करने के लिए तत्पर रहेगा.

तारिक रहमान ने बांग्लादेश-केंद्रित विदेश नीति अपनाने का संकेत दिया है. भारत की विदेश नीति गतिशील और पड़ोसी-केंद्रित है. इन दोनों दृष्टिकोणों में मजबूत तालमेल है. दोनों पक्षों की वास्तविक प्रतिबद्धता के साथ, पारस्परिक लाभ के आधार पर सभी मतभेदों को सुलझाने के लिए एक बहुक्षेत्रीय वैश्विक वार्ता शुरू की जानी चाहिए. हम भारत-बांग्लादेश संबंधों में नए आयाम स्थापित करने के लिए निश्चित रूप से तत्पर हैं.इससे भारत-बांग्लादेश संबंधों में नया और सकारात्मक दौर शुरू हो सकता है.

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(डिस्क्लेमर: लेखिका वीना सीकरी बांग्लादेश में भारत की पूर्व उच्चायुक्त हैं. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं हैं.)

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