भारतीय संस्कृति में वृक्ष केवल प्रकृति के अंश नहीं, बल्कि जीवन, आस्था और औषधीय परंपरा के जीवंत प्रतीक भी हैं. ऐसे ही एक पवित्र वृक्ष का नाम है, अशोक (Saraca Asoca). यह वृक्ष उत्तर प्रदेश का राजकीय वृक्ष भी है. अशोक का अर्थ होता है , शोक हरने वाला, इसी भावार्थ से इसे 'विशोक', 'अपशोक', 'चित्रशोक' और अंग्रेज़ी में 'Sorrowless Tree' जैसे नाम भी दिए गए हैं. 'यथा नाम, तथा गुण' वाला यह वृक्ष जिसके बारे में कहा जाता है कि वह दुख हर लेता है, जहां यह वृक्ष होता है, वहां किसी भी प्रकार की पीड़ा और नकारात्मकता नहीं टिकती. इसीलिए इसे भारतीय धर्म, आयुर्वेद और संस्कृति में अत्यंत पवित्र स्थान प्राप्त है.
भारत की परंपरा में अशोक
अशोक को भारत की विभिन्न परंपराओं में अनेक प्रतीकात्मक अर्थों से जोड़ा गया है. पुराणों में यह वृक्ष दुख-निवारण और सौंदर्य-वर्धन का प्रतीक है, जबकि नाट्यशास्त्र इसके लाल पुष्पों की जीवंतता और सौंदर्य पर विशेष बल देता है. संस्कृत काव्य में अशोक को कभी प्रेम और दैवी उपस्थिति तो कभी मन की उथल-पुथल और भावनात्मक आवेग का प्रतीक बताया गया है, वहीं आयुर्वेदिक परंपरा में इसका औषधीय और स्वास्थ्यवर्धक महत्त्व विशेष रूप से रेखांकित किया गया है. शिल्पशास्त्र के मुताबिक अशोक वृक्ष शांति, सौंदर्य और संतुलन का द्योतक है, वहीं वैष्णव परंपरा में इसे मंगलमय और रमणीय परिवेश का अभिन्न अंग माना गया है. बौद्ध धर्म में यह बोधिसत्व के जन्म का प्रतीक माना गया है, जबकि जैन धर्म में इसे आध्यात्मिक ज्ञान और उपदेशों से संबद्ध किया गया है. रामायण के वर्णनानुसार, जब लंकाधिपति रावण माता सीता का अपहरण कर लंका ले गए, तो उन्हें जिस बाग में रखा गया था, उसका नाम था: अशोक वाटिका, जहां चारों ओर अशोक के वृक्ष खिले थे, माता सीता के उसी निवास के कारण यह यह बहुआयामी वृक्ष 'सीता अशोक' के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
सदाबहार प्रकृति वाले अशोक के पेड़ की पत्तियां बड़े आकार की लगभग 25 सेमी तक लंबी, गहरे हरे रंग की, नोंकदार, एकान्तर और विपरीत क्रम में व्यवस्थित होती है. प्रारंभ में कोमल पत्तियों का रंग श्वेताभ रक्त होता है, जो कि बाद में गहरा हरा हो जाता है. इससे इसे ताम्रपल्लव भी कहा जाता है. इसके फूल शीत ऋतु की समाप्ति पर फरवरी से अप्रैल के बीच आते हैं, जो प्रारंभ में पीले-नारंगी और बाद में गहरे लाल रंग के हो जाते हैं. पुष्पों के डंठल लंबे होते हैं, इसकी फलियां आयताकार लगभग 20 से 25 सेमी तक लम्बी और पांच से 10 सेमी चौड़ी, चपटी, जामुनी-काले रंग की, काष्ठीय और दोनों सिरों पर टेढ़ी होती है. ये फलियां बसंत ऋतु में आती हैं और सूखने पर चटक जाती हैं और उनमें से बीज बाहर निकल कर गिर जाते हैं. एक फली में चार से आठ बीज तक हो सकते हैं. बीजों के ऊपर की परत रक्ताभ, चमड़े के सदृश सख्त और मोटी होती है. इनके पुष्पों की शांत और मधुर सुगंध और सुंदरता इस वृक्ष को विशेष बनाती है.
औषधि के रूप में अशोक
अशोक वृक्ष को आयुर्वेद में स्त्रीरोगों की औषधि कहा गया है, इसकी छाल, फूल और बीज अनेक औषधीय गुणों से भरपूर हैं. यह वृक्ष वात-पित्त दोष, रक्त विकार, चर्म रोग, दाह, शोथ और रजोनिवृत्ति विकारों में अत्यंत लाभकारी हैं. इसकी छाल से बनने वाली प्रसिद्ध औषधि 'अशोकरिष्ट' महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए आज भी सर्वाधिक प्रयोग की जाती है. मुख्यतः इसकी छाल में टेनिन, ग्लाइकोसाइड, लौह यौगिक, हेमैटाक्सिलिन, केटोस्टेरॉल आदि तत्व पाए जाते हैं, जो इसे शक्तिशाली औषधि बनाते हैं.
भारतीय वास्तुशास्त्र के अनुसार, घर की उत्तर दिशा में अशोक वृक्ष लगाना शुभ माना जाता है. यह दिशा कुबेर जी की दिशा है, जहां धन और समृद्धि का वास होता है. अशोक वृक्ष की हर शाखा आस्था का प्रतीक है और हर फूल जीवन में नव ऊर्जा का संदेश देता है. यह वृक्ष हमें सिखाता है कि जहां हरियाली और संतुलन होता है, वहां सकारात्मकता होती है. उत्तर प्रदेश का यह राजकीय वृक्ष न केवल पर्यावरण का रक्षक है, बल्कि भावनाओं का भी संवाहक है. अशोक वृक्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण की दृष्टि से आईयूसीएन की रेड लिस्ट में 'Vulnerable' (वैश्विक रूप से असुरक्षित) श्रेणी में रखा गया है. असंवहनीय दोहन और अत्यधिक छाल-उपयोग के कारण इसका प्राकृतिक अस्तित्व तेजी से घटा है, अतः संरक्षण के लिए कदम बढ़ाएं, अशोक लगाएं.
(डिस्क्लेमर: लेखिका वानिकी शोधार्थी हैं और पर्यावरण के विषयों पर लिखती हैं. उन्हें 'चांसलर गोल्ड मेडल' मिल चुका है. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)














