बिहार में है नालंदा से भी पुराना विश्वविद्यालय, यूनिवर्सिटी के छात्र यहां करने जाते थे PhD

हालिया खुदाई और शोध ने एक ऐसे ऐतिहासिक सत्य को उजागर किया है, जो नालंदा की ख्याति के समानांतर और उससे भी प्राचीन है. यह है 'तिलाधक विश्वविद्यालय' (तिल्हाड़ा).

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  • तिलाधक विश्वविद्यालय का इतिहास नालंदा विश्वविद्यालय से भी प्राचीन है और इसकी स्थापना पहली सदी में मानी जाती है
  • खुदाई में कुषाण काल के अवशेष मिले हैं, कार्बन डेटिंग से यह तिलाधक विश्वविद्यालय को ईसा पूर्व का साबित करता है
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा डायरी में तिलाधक विश्वविद्यालय का उल्लेख किया है और इसकी महत्ता बताई है
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जब भी प्राचीन शिक्षा केंद्रों की बात होती है, तो नालंदा विश्वविद्यालय का नाम सबसे पहले जहन में आता है. लेकिन हालिया खुदाई और शोध ने एक ऐसे ऐतिहासिक सत्य को उजागर किया है, जो नालंदा की ख्याति के समानांतर और उससे भी प्राचीन है. यह है 'तिलाधक विश्वविद्यालय' (तिल्हाड़ा), जो पहली सदी का बताया जा रहा है. हाल ही में नालंदा के जिलाधिकारी कुंदन कुमार ने एकंगरसराय प्रखंड के तिल्हाड़ा ग्राम का भ्रमण कर इस प्राचीन विश्वविद्यालय के अवशेषों और वहां बन रहे साइट म्यूजियम का जायजा लिया.

नालंदा से भी पुराना है तिल्हाड़ा का इतिहास

इतिहास के पन्नों को पलटें तो नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 453 ईस्वी में गुप्त शासक कुमार गुप्त ने की थी. वहीं, तिल्हाड़ा (प्राचीन तिलाधक) विश्वविद्यालय का अस्तित्व पहली सदी से ही माना जाता है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 26 दिसंबर 2009 को तिल्हाड़ा के टीले पर खुद खुदाई का शुभारंभ किया था. इस खुदाई ने इतिहास के कई परतों को खोला है. खुदाई के ऊपरी स्तर पर पाल वंश की मूर्तियां मिलीं. मध्य स्तर पर गुप्त काल के पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए. सबसे गहराई में कुषाण काल के अवशेष मिले, जिनकी कार्बन डेटिंग इसे ईसा पूर्व का साबित करती है.

ह्वेनसांग की डायरी में तिल्हाड़ा का जिक्र

प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग जब 630 ईस्वी में भारत आया था, तो वह नालंदा जाने से पहले तिलाधक विश्वविद्यालय ही पहुंचा था. उसने अपने यात्रा वृत्तांत में यहां के 'तिलाधक संघाराम' और 'महाविहार' का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है. भगवान बुद्ध से भी इस स्थान का गहरा नाता है; कहा जाता है कि बुद्ध यहां चौमासा बिताने आए थे.

जहां PhD करने आते थे छात्र

तिल्हाड़ा विश्वविद्यालय की महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस दौर में नालंदा विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन तक की शिक्षा दी जाती थी, जबकि PHD (उच्च शोध) के लिए छात्र तिलाधक विश्वविद्यालय आते थे. यहाँ विभिन्न देशों के लगभग 1000 विद्यार्थी महायान बौद्ध धर्म, शब्द विद्या, शिल्प विद्या, तर्क शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र और सांख्यिकी जैसे विषयों की शिक्षा ग्रहण करते थे.

खिलजी का आक्रमण और बर्बादी का मंजर

इस महान केंद्र का अंत बेहद दुखद रहा. 1198 ईस्वी में इख्तियारूद्दीन मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने तिल्हाड़ा पर आक्रमण किया. उसने यहां पढ़ रहे बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम किया और विश्वविद्यालय को लूटकर आग के हवाले कर दिया. ब्रिटिश काल के दौरान यहां की बेशकीमती मूर्तियां कोलकाता, लंदन और स्विट्जरलैंड (ज्यूरिक) के संग्रहालयों में पहुंचा दी गईं.

आधुनिक प्रयास: साइट म्यूजियम और पर्यटन

बिहार सरकार अब इस खोए हुए गौरव को वापस लाने के प्रयास में है. 9 करोड़ 80 लाख की लागत से एक भव्य भवन तैयार किया गया है, जहां खुदाई में निकले अवशेषों को प्रदर्शित किया जाएगा. खुदाई में मिली 'रेड सैंड स्टोन' की अवलोकितेश्वर की मूर्ति वर्तमान में बिहार म्यूजियम, पटना में है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी देख चुके हैं. प्रशासन की योजना तिल्हाड़ा को 'बुद्धिस्ट सर्किट' से जोड़ने की है, ताकि देश-विदेश के सैलानी इस ऐतिहासिक धरोहर को देख सकें. जिलाधिकारी ने निर्देश दिए हैं कि म्यूजियम के अंदर कंपार्टमेंट बनाकर अवशेषों को वैज्ञानिक तरीके से प्रदर्शित किया जाए और बचे हुए क्षेत्र की खुदाई व संरक्षण कार्य को जल्द पूरा किया जाए.

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