Patna News: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के एक दहेज हत्या मामले में पटना हाईकोर्ट के जमानत आदेश को रद्द करते हुए आरोपी पति को एक सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का कड़ा निर्देश दिया है. जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने हाईकोर्ट के नजरिए को पूरी तरह अस्थिर बताते हुए कहा कि ऐसे संगीन अपराधों में बिना गहराई से साक्ष्यों को परखे जमानत देना न्यायपालिका के प्रति जनता के भरोसे को कमजोर करता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी अगर तय समय में जेल अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण नहीं करता है, तो ट्रायल कोर्ट उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करे.
1.5 साल की शादी, 26 लाख का 'लालच'
यह पूरा मामला 1 सितंबर 2024 को बिहार के गोपालपुर थाने में दर्ज उस एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें शादी के मात्र डेढ़ साल बाद एक महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी. मृतका की मां लाल मुनि देवी ने आरोप लगाया था कि शादी में 20 लाख रुपये नकद और करीब 6 लाख के जेवर देने के बावजूद ससुराल पक्ष की ओर से मोटरसाइकिल और अन्य सामान की मांग को लेकर बेटी को लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दरिंदगी की जो कहानी सामने आई, उसने अदालत को भी झकझोर दिया. रिपोर्ट के अनुसार मृतका के सिर की हड्डी टूटी हुई थी, दिमाग में गंभीर चोटें थीं और यहां तक कि सीने की हड्डी और दिल भी फटा हुआ पाया गया था.
हाईकोर्ट के 'मैकेनिकल अप्रोच' पर SC नाराज
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर सख्त नाराजगी जताई कि पटना हाईकोर्ट ने इतनी खौफनाक मेडिकल रिपोर्ट और गंभीर आरोपों को नजरअंदाज कर दिया. हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से आरोपी की हिरासत की अवधि और ट्रायल की धीमी गति को आधार बनाकर उसे जमानत दे दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 'मैकेनिकल अप्रोच' करार दिया. शीर्ष अदालत ने कहा कि दहेज हत्या समाज के लिए एक गंभीर चिंता है और अदालतों का यह कर्तव्य है कि वे ऐसे मामलों में जमानत देते समय पूरी संवेदनशीलता और गहराई से तथ्यों की जांच करें.
ट्रायल कोर्ट को 6 महीने की डेडलाइन, चीफ जस्टिस को भेजी रिपोर्टअब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया है कि इस केस का ट्रायल प्राथमिकता के आधार पर आगामी 6 महीने के भीतर पूरा किया जाए. साथ ही, इस फैसले की एक प्रति पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष विचार के लिए भेजने का भी आदेश दिया गया है. अदालत ने साफ किया कि फिलहाल वह मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रही है और ट्रायल कोर्ट उपलब्ध सबूतों के आधार पर ही अपना स्वतंत्र फैसला लेगा.
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