बारिश और आंधी ने तोड़ दी किसानों की 'कमर', अभी भी मदद की राह ताकते बिहार के अन्नदाता

प्राकृतिक आपदा की स्थिति में अगर 20 प्रतिशत तक फसल का नुकसान होता है, तो 7500 रुपये प्रति हेक्टेयर और 20 प्रतिशत से अधिक नुकसान होने पर 10 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवजा देने का प्रावधान है. सरकार का उद्देश्य था कि आपदा की स्थिति में किसानों को जल्दी आर्थिक सहायता मिल सके, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी प्रक्रिया धीमी पड़ गई है.

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बिहार में बारिश और तेज हवाओं के कारण फसल को हुआ भारी नुकसान
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  • बिहार में इस साल अतिवृष्टि और मौसम की मार से धान, गेहूं, मक्का और सब्जियों की फसलों को भारी नुकसान हुआ है
  • 12 जिलों के 111 प्रखंडों में लगभग दो लाख छह हजार हेक्टेयर जमीन की फसलों को तीस प्रतिशत से अधिक नुकसान हुआ है
  • मुआवजा राशि वितरण में देरी और सर्वे में बाधा के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति बिगड़ी है और उनकी चिंता बढ़ी है
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पटना:

बिहार में इस साल अतिवृष्टि और मौसम की मार की वजह से फसलों को भारी नुकसान हुआ है. धान, गेहूं, मक्का और सब्जियों की खेती करने वाले हजारों किसान प्रभावित हुए हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है. गांवों में कई जगह ऐसी स्थिति है कि किसानों की पूरी मेहनत एक झटके में बर्बाद हो गई, लेकिन राहत और मुआवजा मिलने की प्रक्रिया अभी भी धीमी चल रही है. इससे किसानों में नाराजगी और चिंता लगातार बढ़ती जा रही है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि पिछले साल और इस साल जिन किसानों ने फसल नुकसान के बाद सहायता के लिए आवेदन किया, उनका वेरिफिकेशन अब तक पूरा नहीं हो पाया है.

नियम के अनुसार आवेदन के बाद अधिकारियों को खेतों का सर्वे और जांच करनी होती है, तभी मुआवजा की राशि जारी की जाती है. लेकिन सहकारिता विभाग और संबंधित अधिकारियों की देरी के कारण यह प्रक्रिया महीनों से अटकी हुई है. कई जिलों में किसानों का कहना है कि उन्होंने समय पर आवेदन किया, लेकिन अब तक कोई अधिकारी उनके खेतों का सही तरीके से निरीक्षण करने नहीं आया.

सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि स्थिति कितनी गंभीर है. अब तक राज्य के 36 जिलों से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार 12 जिलों जैसे  सहरसा, मुजफ्फरपुर, अररिया, बेगूसराय, मधुबनी, पूर्णिया, खगड़िया, किशनगंज, मधेपुरा, दरभंगा, सुपौल और भागलपुर के कुल 111 प्रखंडों में व्यापक फसल क्षति की सूचना मिली है. इन इलाकों में करीब 2 लाख 6 हजार 658 हेक्टेयर जमीन पर लगी गेहूं, मक्का, दलहन और तेलहन जैसी फसलों को 33 प्रतिशत या उससे अधिक नुकसान होने का आकलन किया गया है. इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में किसान सीधे तौर पर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं और उन्हें तत्काल राहत की जरूरत है.बिहार सरकार ने साल 2018 में फसल सहायता योजना शुरू की थी. यह एक तरह की बीमा योजना है, लेकिन इसमें किसानों को कोई प्रीमियम नहीं देना पड़ता है. 

मुआवजे का क्या है प्रावधान?

इस योजना के तहत प्राकृतिक आपदा की स्थिति में अगर 20 प्रतिशत तक फसल का नुकसान होता है, तो 7500 रुपये प्रति हेक्टेयर और 20 प्रतिशत से अधिक नुकसान होने पर 10 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर मुआवजा देने का प्रावधान है. सरकार का उद्देश्य था कि आपदा की स्थिति में किसानों को जल्दी आर्थिक सहायता मिल सके, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी प्रक्रिया धीमी पड़ गई है. बी सीजन 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि कुल 3 लाख 18 हजार 714 किसानों ने मुआवजा पाने के लिए आवेदन किया था, लेकिन इनमें से अब तक केवल 76 हजार किसानों का ही वेरिफिकेशन हो पाया है. यानी बड़ी संख्या में किसान अभी भी जांच की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं.

इसी तरह खरीफ सीजन के दौरान 2 लाख 66 हजार किसानों ने आवेदन किया था, जिनमें से 1 लाख 45 हजार किसानों को पात्र माना गया था. इन किसानों को करीब 127 करोड़ 87 लाख रुपये मुआवजा मिलना था, लेकिन यह राशि अब तक जारी नहीं की गई है. दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान और बिरौल इलाके में इस साल बाढ़ की वजह से धान और मक्का की फसल को भारी नुकसान हुआ. यहां के किसानों का कहना है कि उन्होंने समय पर आवेदन किया, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी मुआवजा नहीं मिला है. कई किसान अब कर्ज लेकर खेती करने को मजबूर हैं और परिवार चलाना भी मुश्किल हो रहा है.

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कई जिलों में बर्बाद हो गई फसल

पूर्णिया जिले के बनमनखी और धमदाहा इलाके में ज्यादा बारिश के कारण खेतों में पानी भर गया, जिससे धान की फसल पूरी तरह खराब हो गई. यहां के किसानों ने ऑनलाइन आवेदन किया, लेकिन तकनीकी समस्या और सर्वे में देरी के कारण मुआवजा अटक गया. किसानों का कहना है कि आवेदन की स्थिति अभी भी लंबित दिख रही है और उन्हें बार-बार प्रखंड कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. गया जिले के टिकारी और बेलागंज इलाके में कम बारिश और मौसम की अनियमितता की वजह से फसल उत्पादन पर असर पड़ा. यहां के किसानों का कहना है कि फसल का नुकसान तो हुआ, लेकिन सर्वे टीम समय पर नहीं पहुंची. इसके कारण कई किसानों का नाम लाभार्थियों की सूची में शामिल नहीं हो पाया और उन्हें सरकारी सहायता नहीं मिल सकी.

इन उदाहरणों से साफ होता है कि समस्या केवल एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में एक जैसी स्थिति देखने को मिल रही है. किसानों का कहना है कि अगर समय पर सर्वे और जांच हो जाए और मुआवजा की राशि जल्दी जारी कर दी जाए, तो उन्हें बड़ी राहत मिल सकती है और वे अगली फसल की तैयारी सही समय पर कर पाएंगे.प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान के बाद किसानों को राहत देने की प्रक्रिया में हो रही देरी एक बड़ी समस्या बन गई है. अगर जल्द ही वेरिफिकेशन और मुआवजा देने की प्रक्रिया तेज नहीं की गई, तो किसानों की आर्थिक स्थिति और खराब हो सकती है और गांवों में असंतोष बढ़ने की आशंका बनी रहेगी. 

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उधर, किसानों की इस हालत को लेकर सहकारिता विभाग के मंत्री डॉ प्रमोद कुमार का कहना है कि किसानों का वेरिफिकेशन लगभग पूरा कर लिया गया है और भुगतान में देरी की एक वजह प्रशासनिक व्यस्तता रही है. उनके अनुसार पिछले साल चुनाव भी थे और विभाग के कई अधिकारी दूसरे राज्यों के चुनाव कार्य में लगे हुए थे. मंत्री ने भरोसा दिलाया है कि अब भुगतान की प्रक्रिया जल्द पूरी की जाएगी.डॉ प्रमोद कुमार, मंत्री, सहकारिता विभाग ने कहा कि हमने किसानों का वेरिफिकेशन कर लिया है. पिछले साल चुनाव भी थे, अभी हमारे सचिव बंगाल चुनाव में लगे हुए हैं. उनके आते ही हम भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर देंगे. अगले 10 से 15 दिनों में 127 करोड़ रुपए की राशि किसानों को भुगतान कर दी जाएगी. 

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