क्यों गांव ने अर्थी को हाथ नहीं लगाया? मां को कंधा देने वाली बेटियों की कहानी का सारा सच ये था

बिहार के सारण जिले के जवईनिया गांव से मां की अर्थी को कंधा देने वालीं दो बेटियों की कहानी सामने आई हैं. बेटियों का कहना है कि किसी भी गांव वालों ने मदद नहीं की. जबकि गांव वाले एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं. क्या है सच? पढ़िए इस रिपोर्ट में.

विज्ञापन
Read Time: 5 mins
फटाफट पढ़ें
Summary is AI-generated, newsroom-reviewed
  • सारण के जवईनिया गांव में दो बेटियों ने अपने दिवंगत मां का अंतिम संस्कार अकेले कर सामाजिक परंपरा को चुनौती दी
  • परिवार में कोई बेटा न होने के कारण बेटियों ने अर्थी को कंधा देने और मुखाग्नि देने की जिम्मेदारी खुद ली
  • गांव के लोग सहयोग नहीं किए, जिससे बेटियों को मजबूर होकर परंपरा से हटकर यह साहसिक कदम उठाना पड़ा
क्या हमारी AI समरी आपके लिए उपयोगी रही?
हमें बताएं।
सारण:

बिहार के सारण जिले के मढ़ौरा प्रखंड के जवईनिया गांव से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने इंसानियत, संवेदना और सामाजिक सोच को लेकर पूरे इलाके को सोचने पर मजबूर कर दिया है. यहां दो बेटियों ने अपने भाई के न होने की स्थिति में अपनी दिवंगत मां की अर्थी को कंधा दिया और श्मशान घाट में मुखाग्नि भी दी. यह फैसला किसी आंदोलन या प्रचार का हिस्सा नहीं था, बल्कि कठिन हालात में लिया गया एक मजबूर लेकिन साहसिक कदम था.

गांव में रहने वाली बुजुर्ग महिला के निधन के बाद जब अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हुई, तो परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हुआ कि अर्थी को कंधा कौन देगा और मुखाग्नि कौन देगा? परिवार में कोई बेटा नहीं था, सिर्फ दो बेटियां थीं, जो शादी के बाद अपने-अपने ससुराल में रहती हैं. मां की मौत की खबर मिलते ही दोनों बेटियां गांव पहुंचीं और अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने का फैसला किया.

एक बेटी ने कहा, 'हम लोगों ने किसी से टकराव नहीं चाहा था, लेकिन गांव वालों ने सहयोग नहीं किया. जब मां की अर्थी उठाने का समय आया, तो कोई आगे नहीं आया. उस वक्त हमें लगा कि अब जो करना है, हमें ही करना होगा.' दूसरी बेटी ने भी दर्द भरे शब्दों में कहा, 'हमने बहुत कोशिश की कि गांव के लोग साथ दें, लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ. मां की अंतिम विदाई ऐसे कैसे छोड़ देते, इसलिए हमने खुद कंधा दिया.'

दोनों बेटियों ने बताया कि उनका यह फैसला किसी को चुनौती देने के लिए नहीं था. एक बेटी ने कहा, 'यह कोई समाज सुधार का कदम नहीं था. यह हमारी मजबूरी थी. मां ने हमें पाला, हमें बड़ा किया, तो आखिरी जिम्मेदारी भी हमारी ही थी.' उनके मुताबिक उस वक्त भावनाएं इतनी भारी थीं कि परंपरा और समाज की सोच अपने आप पीछे छूटती चली गई.

हालांकि गांव के कुछ लोगों की राय इससे अलग भी सामने आई. नाम न छापने की शर्त पर एक ग्रामीण ने कहा, 'इस परिवार के संबंध गांव में अच्छे नहीं थे. इसी वजह से लोग आगे आने से कतराते रहे.' एक दूसरे ग्रामीण ने बताया, 'यह सच है कि परिवार की गांव के कई लोगों से बोलचाल नहीं थी. इसलिए सहयोग की कमी रही.' वहीं एक तीसरे ग्रामीण ने कहा, 'अगर रिश्ते बेहतर होते तो शायद हालात कुछ और होते, लेकिन यहां मामला पहले से ही उलझा हुआ था.' कुछ गांव वालों का ये भी आरोप है कि दोनों बहनों ने रील्स बनाने के लिए ये सब किया. हालांकि, बेटियों ने इसे खारिज कर दिया है.

इन बातों के बावजूद मौके पर मौजूद कई लोग इस दृश्य से भावुक हो गए. जब बेटियों ने अर्थी को कंधा दिया और श्मशान घाट पर पहुंचकर एक बेटी ने मुखाग्नि दी, तो वहां सन्नाटा छा गया. कुछ लोगों की आंखें नम थीं, तो कुछ लोग चुपचाप यह सब देखते रहे. यह दृश्य गांव में पहले कभी नहीं देखा गया था.

Advertisement

शुरुआत में कुछ बुजुर्गों को यह कदम परंपरा के खिलाफ लगा, लेकिन बाद में उन्होंने भी माना कि परिस्थितियां असामान्य थीं. एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि ऐसी स्थिति में बेटियों ने जो किया, उसे गलत नहीं कहा जा सकता. गांव में धीरे-धीरे यह चर्चा शुरू हो गई कि अगर बेटा नहीं है, तो बेटी ही मां-बाप की आखिरी जिम्मेदारी निभा सकती है.

बेटियों का कहना है कि गांव से उन्हें जिस तरह का सहयोग मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला. एक बेटी ने कहा, 'अगर गांव वाले साथ देते, तो शायद हालात अलग होते. लेकिन जब कोई नहीं आया, तो हमें खुद आगे बढ़ना पड़ा.' उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है.

Advertisement

इस घटना के बाद गांव की महिलाओं और युवाओं के बीच इस विषय पर खुलकर बातचीत होने लगी है. कई महिलाओं का कहना है कि बेटियों को हमेशा कमजोर समझा जाता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर वही सबसे मजबूत साबित होती हैं. युवाओं का मानना है कि समाज धीरे-धीरे बदल रहा है और ऐसी घटनाएं इस बदलाव की शुरुआत हैं.

सामाजिक जानकारों का कहना है कि यह घटना दिखाती है कि बदलाव हमेशा किसी बड़े आंदोलन से नहीं आता. कई बार हालात इंसान को ऐसा फैसला लेने पर मजबूर कर देते हैं, जो समाज की सोच को झकझोर देता है. जवईनिया गांव की यह घटना भी ऐसी ही एक मिसाल है.

Advertisement

कुल मिलाकर, सारण के इस छोटे से गांव की यह कहानी सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं है, बल्कि यह समाज के सामने कई सवाल छोड़ जाती है. बेटियों का साहस, गांव की बेरुखी और बदलती सोच… इन सबका मेल इस घटना को खास बनाता है. यह कहानी आने वाले समय में इस बात की याद दिलाएगी कि इंसानियत और जिम्मेदारी किसी एक लिंग तक सीमित नहीं होती.

Featured Video Of The Day
Sadhvi Prem Baisa Death Mystery: क्या साध्वी को कोई कर रहा था ब्लैकमेल? | NDTV India | Top News