जब आधी रात के सन्नाटे में ढोलक की थाप तेज होती है और गंगा की लहरों के बीच 'चीखें' गूंजने लगती हैं, तो समझ जाइए कि बिहार की काशी कहे जाने वाले बाढ़ के उमानाथ घाट पर 'भूतों का मेला' सज चुका है. माघी पूर्णिमा के अवसर पर यहां आस्था का एक ऐसा डरावना रूप देखने को मिलता है, जिसे देखकर किसी भी कमजोर दिल वाले शख्स की रूह कांप जाए.
माघी पूर्णिमा: जब 'परलोक' की शक्तियां उतरती हैं घाट पर
उमानाथ घाट पर हर साल माघी पूर्णिमा के मौके पर हजारों की भीड़ उमड़ती है, लेकिन यह भीड़ सिर्फ गंगा स्नान के लिए नहीं होती. यहां लगता है 'भूतों का मेला'. दूर-दराज के जिलों (पटना, नालंदा, नवादा, जमुई, शेखपुरा) से आए लोग यहां अपनी देह में 'ऊपरी साये' को लेकर पहुंचते हैं.
'भूतखेली' का खौफनाक मंजर: हाथों में नीम की झारी और लाठियां
जैसे ही ढोलक और मंजीरे की थाप बढ़ती है, नज़ारा किसी हॉरर फिल्म जैसा हो जाता है. महिलाएं और पुरुष अपने बाल खोलकर, हाथों में लाठियां और नीम की टहनियां लेकर बेसुध होकर नाचने लगते हैं. स्थानीय गीतों के बीच महिलाओं का अपने सिर को गोल-गोल घुमाना और जमीन पर पटकना लोगों में एक अजीब सा डर पैदा करता है. भीड़ के बीच 'भगत' ऊंचे स्वर में मंत्रोच्चार करते हैं और लाठियों से प्रहार कर 'भूत उतारने' का दावा करते हैं.
अंधविश्वास या ईश्वरीय शक्ति?
इस खौफनाक परंपरा को लेकर लोगों की अपनी मान्यताएं हैं. नालंदा से आए सोनू भगत का दावा है कि यह कोई प्रेत बाधा नहीं, बल्कि भगवान का रूप है जो शरीर में आता है. वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सदियों पुरानी परंपरा 'बाबा बख्तौर' की देन है. नवादा के मोनू कहते हैं कि भले ही दुनिया इसे 'अंधविश्वास' कहे, लेकिन यहां आने वाले लोग इसे भगवान का साक्षात अनुभव मानते हैं.
उत्तरायण गंगा और डरावनी रात का संगम
बाढ़ में गंगा की धारा 'उत्तरायण' होने के कारण यहां का धार्मिक महत्व बहुत ज्यादा है. शनिवार शाम से ही रेलवे स्टेशन और सड़कों पर पैर रखने की जगह नहीं थी. लाखों श्रद्धालु अस्थाई शेल्टर और स्टैंड्स पर रात गुजारते हैं, लेकिन पूरी रात घाट पर 'भूतखेली' का यह डरावना सिलसिला दो दिनों तक चलता रहता है.
(नोट: एनडीटीवी किसी भी अंधविश्वास का समर्थन नहीं करता है.)














