बिहार में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस कमजोर कड़ी साबित हुई. पार्टी के 6 में से 3 विधायक वोट डालने नहीं आए. महागठबंधन के उम्मीदवार एडी सिंह की हार हुई. वोटिंग से बाहर रहे विधायक मनोज विश्वास, मनोहर प्रसाद और सुरेन्द्र कुशवाहा अब यह दावा कर रहे हैं कि उन्हें पार्टी की तरफ अपनी इच्छा से वोट डालने को कहा गया था. मनोज विश्वास ने यह भी दावा किया कि उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को बता दिया था कि वे वोट नहीं डालेंगे. विधायकों के आरोपों का प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम ने खंडन किया है. उन्होंने कहा कि मैंने किसी भी विधायक को वोट देने से मना नहीं किया.
राज्यसभा चुनाव में सक्रिय नहीं दिखा कांग्रेस नेतृत्व
इस चुनाव में कांग्रेस के तमाम नेता दूर - दूर ही दिखे. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम किसी बैठक में नहीं दिखे. राज्यसभा सांसद अखिलेश सिंह आखिरी दिन सक्रिय हुए. प्रदेश प्रभारी कृष्णा अल्लावरू किसी बैठक में हिस्सा लेने नहीं आए. कांग्रेस के विधायक पहले भी प्रदेश अध्यक्ष के कार्यक्रमों से दूर दिखे हैं. मकर संक्रांति के भोज में कांग्रेस के विधायक नहीं पहुंचे थे. उस वक्त भी पार्टी में टूट की खबरें सामने आई थी. विधानसभा चुनाव के बाद 2 सत्र बीत चुके हैं लेकिन कांग्रेस CLP लीडर का चुनाव नहीं कर पाई है.
क्या पप्पू यादव की नाराजगी भी फैक्टर बना?
पूर्णिया सांसद पप्पू यादव भी इस घटनाक्रम में कहीं नहीं थे. उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि उनसे किसी ने संपर्क नहीं किया. यहां तक कि तेजस्वी यादव ने प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश प्रभारी या आला नेतृत्व से बातचीत तक नहीं की. कोई कोर्डिनेशन नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि मैंने एडी सिंह से बात करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं हो पाई. फारबिसगंज विधायक मनोज विश्वास को पप्पू यादव का नजदीकी माना जाता है. एनडीटीवी से बातचीत में मनोज विश्वास ने बताया कि उन्होंने पप्पू यादव को वोटिंग से एब्सेंट होने की बात बता दी थी. पप्पू यादव के राजद, खासकर तेजस्वी यादव से अच्छे संबंध नहीं रहे हैं. ऐसे में राजनीतिक हलकों में उनके इन बयानों के कई मायने निकाले जा रहे हैं.
कैसे कमजोर कड़ी साबित हुई कांग्रेस?
विधानसभा चुनाव के बाद से ही जदयू के एक बड़े नेता कांग्रेस विधायकों को अपने पाले में लाने में जुट गए थे. कांग्रेस से जदयू में आए बड़े नेता ने सभी विधायकों से बात की थी. क्षेत्र में मनचाहे अधिकारियों की पोस्टिंग, क्षेत्रीय योजनाओं में मदद के साथ - साथ बोर्ड, निगम में सेट करने तक का ऑफर दिया गया था. पश्चिमी चंपारण के एक विधायक खुद से कांग्रेस से बाहर होना चाहते थे. ऐसे में राज्यसभा चुनाव के दौरान इन विधायकों को एब्सेंट कराना एनडीए के लिए आसान रहा.
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