बिहार के इस मेडिकल कॉलेज में 10 में 7 एडमिशन फर्जीवाड़े से, क्या बाकी जगह भी ये रैकेट?

जानकार मानते हैं कि प्रति वर्ष लगभग 65 हजार छात्रों को सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलता है. इसमे दिव्यांग कोटे के लिए 5 फीसदी सीट मतलब लगभग 3 हजार से अधिक सीटें आरक्षित हैं.

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  • राजकीय मेडिकल कॉलेज पूर्णिया में दिव्यांग कोटे से एमबीबीएस नामांकन में फर्जी प्रमाणपत्र का खुलासा हुआ है
  • 2023 और 2024 में दिव्यांग कोटे से नामांकित दस छात्रों में से सात का दिव्यांगता प्रमाणपत्र फर्जी पाया गया है
  • सभी फर्जी प्रमाणपत्र कान से दिव्यांग होने के थे, जो बनारस, चंडीगढ़, कोलकाता और मुंबई के अस्पतालों से जारी हुए
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पूर्णिया:

मुन्ना भाई एमबीबीएस बनने के कई तरीके अब तक ईजाद हुए और कई अप्रासंगिक हो गए तो कुछ अभी भी प्रचलन में हैं. 80 के दशक में नकल प्रमुख टूल्स हुआ करता था तो 90 के दशक में 'डमी' द्वारा परीक्षा में बैठने की बात आम थी. इस धंधे में असली परीक्षार्थी को 'बोगी' और डमी को 'इंजन' कहा जाता था.

अब नया तरीका

इंजन अमूनन किसी मेडिकल कॉलेज का छात्र हुआ करता था, जो अपने ज्ञान के बल पर बोगी को खींचकर मेडिकल कॉलेज की दहलीज तक पहुंचाया करता था. इसमे पूरी व्यवस्था को मूर्त रूप देने वाला 'सेटर' कहलाता था. जाहिर है इसमे लाखों का लेनदेन होता था, जिससे सेटर और इंजन दोनों को फायदा होता था. हालांकि, जब इसमें जोखिम बढ़ा तो प्रश्न-पत्र लीक कराने वाले गिरोह की सक्रियता बढ़ी, जो आज भी प्रासंगिक है. जाहिर है, प्रश्न-पत्र लीक प्रक्रिया में बिहार अक्सर राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व प्रदान करता रहा है. मगर, अब एक नई तकनीक का ईजाद हुआ है, दिव्यांग कोटा से नामांकन में फर्जीवाड़ा. जिसका खुलासा राजकीय मेडिकल कॉलेज, पूर्णिया में हुआ है.

नीट देश में सरकारी कॉलेजों में एमबीबीएस में नामांकन की प्रक्रिया पूरी कराती है, उसमें 5 फीसदी सीट दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए आरक्षित होता है. इस फर्जीवाड़ा के उजागर होने से इस आशंका को बल मिला है कि पूरे देश में दिव्यांग कोटे से हो रहे नामांकन में फर्जीवाड़ा किया जा रहा हो.

7 मुन्नाभाई पकड़े गए 

राजकीय मेडिकल कॉलेज, पूर्णिया में वर्ष 2023 में एमबीबीएस की पढ़ाई आरम्भ हुई है. यहां एक वर्ष में कुल 100 छात्रों का नामांकन होता है. नियमानुसार, कुल 100 सीट में 5 फीसदी सीट दिव्यांगों के लिए आरक्षित है. मामले का खुलासा तब हुआ जब वर्ष 2025 में दिव्यांग कोटे से नामांकन के लिए आए छात्र कार्तिक यादव पर कॉलेज प्रबंधन को शंका हुई .नामांकन के बाद कार्तिक के दिव्यांगता प्रमाण-पत्र की जांच की गई तो वह प्रमाण-पत्र फर्जी पाया गया. उसके बाद कार्तिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. फिर कॉलेज प्रशासन ने वर्ष 2023 और वर्ष 2024 में नामांकित छात्रों के प्रमाण-पत्र की जांच कराने का फैसला लिया. जांच के बाद चौकाने वाला परिणाम आया और दोनों वर्ष में दिव्यांग कोटे से नामांकित कुल 10 छात्रों में 7 छात्रों का प्रमाण-पत्र फर्जी पाया गया. सभी फर्जी प्रमाणपत्र पर नामांकित छात्र अब कॉलेज से फरार हैं. 3 छात्र दरभंगा के और 1-1 छात्र अररिया, सीतामढ़ी, बेतिया और नालंदा के निवासी बताए जाते हैं. मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. हरिशंकर मिश्रा ने बताया कि प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के बाद सभी 7 छात्रों का नामांकन रद्द कर उन्हें कॉलेज से निष्काषित कर दिया गया है. आगे की कार्रवाई के लिए राज्य सरकार को लिखा गया है.

कान से थे दिव्यांग

सबसे महत्वपूर्ण बात है कि दिव्यांग कोटे से फर्जी प्रमाणपत्र द्वारा नामांकन लेने वाला सभी छात्रों ने कान से दिव्यांग होने का प्रमाणपत्र पेश किया था. कॉलेज प्रशासन को इसलिए भी शक हुआ कि अधिकांश प्रमाणपत्र एक ही तरह की दिव्यांगता से जुड़ा हुआ था. हैरानी की बात यह है कि सभी प्रमाणपत्र बनारस, चंडीगढ़, कोलकाता और मुंबई के नामचीन अस्पतालों से जारी किए गए थे. लेकिन, जब प्रमाणपत्रों की जांच की गई तो संबंधित संस्थानों ने इसे फर्जी करार दिया. जानकर बताते हैं कि कान से दिव्यांग होने का प्रमाणपत्र इसलिए आसान होता है कि इसे आसानी से नहीं पकड़ा जा सकता है.

कान से दिव्यांग होने के क्या हैं मापदंड

पूर्णिया के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. शंभु कुमार बताते हैं कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम ,2016 कान की दिव्यांगता को परिभाषित करता है. कान से दिव्यांग व्यक्ति पूर्णतः या आंशिक रूप से सुनने में असमर्थ हो सकता है. अधिनियम के अनुसार यह 'हियरिंग इम्पायरेमेंट' के अंतर्गत आता है, जहां सुनने की क्षमता 40 फीसदी या अधिक  प्रभावित होनी चाहिए. यह जांच ऑडिओमेट्री टेस्ट के जरिये होती है. दोनों कान या एक कान में औसत हियरिंग लॉस 40 डेसिबेल या अधिक होने पर व्यक्ति को कान से दिव्यांग माना जाता है.

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बढ़ सकता है दायरा

इस मामले में पूर्णिया मेडिकल कॉलेज प्रशासन पर भी सवाल उठ रहे हैं. लोगों का कहना है कि वर्ष 2023 और वर्ष 2024 के नामांकित छात्रों के प्रमाणपत्र की जांच इतनी देर से क्यों हुई? जबकि, ऐसे प्रमाणपत्रों की जांच के लिए पूरी प्रक्रिया निर्धारित है और इसे एक निश्चित समय-सीमा के अंदर पूरी करनी होती है. वहीं, जानकार मानते हैं कि प्रति वर्ष लगभग 65 हजार छात्रों को सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिलता है. इसमे दिव्यांग कोटे के लिए 5 फीसदी सीट मतलब लगभग 3 हजार से अधिक सीटें आरक्षित हैं.अगर इन सीटों पर फर्जीवाड़ा हो रहा है तो निश्चित रूप से जो इस कोटे के योग्य उम्मीदवार हैं ,उनकी हकमारी हो रही है. आशंका जताई जा रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का फर्जीवाड़ा रैकेट संचालित हो रहा है. डॉ मिश्रा कहते हैं कि बतौर प्राचार्य हमने अपने कार्यकाल में इस फर्जीवाड़ा को पकड़ा और कार्रवाई की गई. इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर अन्यत्र भी नामांकन हो रहा हो.

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