पूर्वी भारत में पहली बार IVF तकनीक से साहीवाल गाय ने दिया बच्चे को जन्म, बिहार के पूसा विश्वविद्यालय ने रचा इतिहास

बिहार में समस्तीपुर के पूसा विश्वविद्यालय ने पूर्वी भारत में पहली बार आईवीएफ तकनीक से साहीवाल बछिया का जन्म कराया है. यह उपलब्धि देसी नस्लों को बढ़ावा देने और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है.

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बिहार में समस्तीपुर के पूसा विश्वविद्यालय ने पूर्वी भारत में पहली बार आईवीएफ तकनीक से साहीवाल बछिया का जन्म कराया है.

Bihar News: बिहार के समस्तीपुर स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है. यहां पहली बार आईवीएफ तकनीक के जरिए साहीवाल नस्ल की बछिया का सफल जन्म कराया गया है. यह उपलब्धि न केवल बिहार बल्कि पूरे पूर्वी भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है. वैज्ञानिकों ने इस तकनीक से कुल चार बछड़ों का जन्म कराया है.

कई केंद्रों पर हुआ सफल प्रयोग

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का प्रयोग पिपराकोठी स्थित देशी नस्ल संवर्धन केंद्र और मोतिहारी के चकिया गौशाला में किया. पिपराकोठी में तीन और चकिया में एक बछड़े का जन्म हुआ. इस सफलता से देसी नस्लों के संरक्षण और विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है.

विदेशी नस्लों की जगह देसी नस्लों पर जोर

कुलपति Dr. P. S. Pandey ने बताया कि लंबे समय से किसान दूध उत्पादन के लिए विदेशी नस्लों पर निर्भर रहे हैं. लेकिन होलस्टीन फ्रेसियन और जर्सी जैसी नस्लें भारतीय मौसम में ज्यादा बीमार पड़ती हैं और इनके प्रजनन में भी कठिनाई आती है. इसके मुकाबले साहीवाल जैसी देसी नस्लें जलवायु के अनुकूल होती हैं और अच्छी दूध उत्पादन क्षमता रखती हैं.

आईवीएफ तकनीक से मिलेगा क्लाइमेट स्मार्ट समाधान

विश्वविद्यालय अब ओपीयू आईवीएफ तकनीक के जरिए किसानों को जलवायु के अनुकूल गाय उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है. इस तकनीक से पैदा होने वाली गायें ज्यादा गर्मी सहन कर सकती हैं और कम बीमार पड़ती हैं, जिससे किसानों को आर्थिक लाभ मिलेगा.

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ए2 दूध के कई स्वास्थ्य लाभ

डेयरी वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार डेयरी ने बताया कि देसी नस्ल की गाय ए2 प्रकार का दूध देती है, जो पाचन में आसान और पोषक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें कैल्शियम, विटामिन डी और ओमेगा 3 फैटी एसिड अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं.

किसानों के लिए नई उम्मीद

डेयरी वैज्ञानिक डॉ. कृष्ण मोहन कुमार डेयरी ने बताया कि इस तकनीक से एक ही पीढ़ी में शुद्ध साहीवाल नस्ल तैयार की जा सकती है. इससे किसानों को उच्च गुणवत्ता की गाय मिलेगी और दुग्ध उत्पादन में वृद्धि होगी. इस परियोजना में डॉ. आर के अस्थाना समेत वैज्ञानिकों की टीम ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है.

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दुग्ध क्षेत्र में क्रांति की संभावना

इस उपलब्धि के बाद विश्वविद्यालय इस तकनीक को किसानों तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा है. इससे बिहार के दुग्ध उद्योग को नई दिशा मिलेगी और आने वाले समय में दूध उत्पादन में बड़ी वृद्धि देखने को मिल सकती है.

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