बिहार चुनाव: झाझा से चकाई तक राजनीतिक विरासत की परंपरा और हार-जीत का कनेक्शन

बिहार की राजनीति में राजनीतिक उत्तराधिकार की बात कोई नई नहीं है. झाझा और चकाई की राजनीति में तीन परिवारों का दबदबा किसी से छिपा नहीं है. ये तीनों परिवार इस इलाके में मजबूत छवि रखते हैं.

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बिहार चुनाव झाझा और चकाई की राजनीति
पटना:

बिहार में परिवारवाद की सियासत, झाझा और चकाई के तीन प्रभावशाली राजनीतिक घराने भारतीय राजनीति में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है लेकिन बिहार की राजनीति में इसकी जड़ें और भी गहरी हैं. यहां कई ऐसे परिवार हैं जिन्होंने दशकों तक न सिर्फ राजनीति को प्रभावित किया बल्कि अपने-अपने क्षेत्रों में सत्ता की पकड़ को बरकरार भी रखा. इन परिवारों की राजनीतिक विरासत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती रही है. झाझा और चकाई जैसे विधानसभा क्षेत्रों में यह राजनीतिक परंपरा आज भी जारी है. यहां हम तीन ऐसे प्रमुख राजनीतिक परिवारों की बात करेंगे जिनकी तीन-तीन पीढ़ियां सक्रिय रूप से सत्ता में रहीं और आज भी इनकी पकड़ मजबूत बनी हुई है.
 

दामोदर रावत

झाझा विधानसभा क्षेत्र में दामोदर रावत नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं. यह परिवार वर्षों से यहां राजनीतिक सक्रियता के केंद्र में रहा है. दामोदर रावत ने अब तक 7 बार चुनाव लड़ा है और 5 बार विधायक रह चुके हैं. वर्तमान में वे जनता दल (यूनाइटेड), जदयू से झाझा के विधायक हैं. उनके परिवार की राजनीतिक यात्रा संघर्षपूर्ण तो रही लेकिन निरंतरता और जनाधार ने इन्हें क्षेत्र में प्रभावशाली बना रखा है. इनके समर्थकों का दावा है कि रावत परिवार की राजनीति केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रही बल्कि विकास के मुद्दों और सामाजिक जुड़ाव ने इन्हें जनता के करीब बनाए रखा. झाझा के ग्रामीण इलाकों में दामोदर रावत की पकड़ मजबूत मानी जाती है. उनका नेटवर्क पंचायत स्तर तक फैला हुआ है, जो उनकी राजनीतिक स्थिरता का प्रमुख कारण है. हालांकि विपक्ष इन्हें "विकास से अधिक जातीय समीकरणों पर राजनीति करने वाला चेहरा" बताता है, लेकिन यह भी सच है कि आज झाझा विधानसभा की राजनीतिक विरासत दामोदर रावत के हाथों में है और उनकी राजनीतिक यात्रा अभी जारी है.

सिंह परिवार की तीन पीढ़ियों का राजनीतिक वर्चस्व

चकाई विधानसभा की राजनीति की बात की जाए और सिंह परिवार का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. यह परिवार तीन पीढ़ियों से सत्ता में सक्रिय रहा है. परिवार की राजनीतिक शुरुआत हुई दादा श्रीकृष्ण सिंह से जिन्होंने क्षेत्र में राजनीतिक पहचान स्थापित की. इसके बाद उनके पुत्र नरेंद्र सिंह ने राजनीति की बागडोर संभाली और अपने दौर में क्षेत्रीय राजनीति में पहचान बनाई. फिर परिवार की तीसरी पीढ़ी ने राजनीति में कदम रखा- अभय सिंह और सुमित कुमार सिंह. सुमित कुमार सिंह दो बार,2010 और 2020 में चकाई से विधायक चुने जा चुके हैं. दिलचस्प बात यह है कि सुमित सिंह ने अलग-अलग राजनीतिक दलों से चुनाव लड़ा लेकिन व्यक्तिगत छवि और परिवार की राजनीतिक पकड़ के कारण वे लगातार परिणाम दे पाए. वर्तमान समय में यह माना जाता है कि चकाई विधानसभा की राजनीतिक विरासत अब सुमित कुमार सिंह के हाथों में सुरक्षित है. इस परिवार की सबसे बड़ी ताकत इसका स्थानीय संगठन और जनता से निजी जुड़ाव माना जाता है. लेकिन आलोचक कहते हैं कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद क्षेत्र आज भी विकास की बुनियादी चुनौतियों जैसे शिक्षा, सड़क और रोजगार आदि से जूझ रहा है.
 

यादव परिवार की चमक

इस कड़ी में तीसरा बड़ा नाम है जयप्रकाश नारायण यादव  का. वे बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल (RJD)  का मजबूत चेहरा माने जाते हैं. वे झाझा विधानसभा क्षेत्र से जुड़े हैं लेकिन उनकी राजनीतिक पहुंच व्यापक है. वे बांका लोकसभा क्षेत्र से चुनाव भी लड़ चुके हैं और  केंद्र सरकार में मंत्री पद संभाल चुके हैं. उनके परिवार की राजनीतिक धारा को आगे बढ़ाया छोटे भाई विजय प्रकाश ने, जो 2015 में झाझा से विधायक बने. इस तरह यादव परिवार भी उन प्रभावशाली राजनीतिक घरानों में शामिल हो गया, जिनकी दो पीढ़ियों ने सक्रिय राजनीति में योगदान दिया और अब तीसरी पीढ़ी भी राजनीति में कदम रखने की तैयारी कर रही है. जयप्रकाश यादव का राजनीतिक प्रभाव झाझा के अलावा पूरे अंग-क्षेत्र में फैला हुआ है. वे सामाजिक न्याय और पिछड़ों की राजनीति के बड़े चेहरों में गिने जाते हैं. उनकी राजनीति का आधार यादव समाज और ग्रामीण वर्ग रहा है. वर्तमान में यह राजनीतिक विरासत जयप्रकाश यादव और उनके परिवार के हाथ में है.

बिहार की राजनीति में परिवारवाद- वरदान या कमजोर पड़ती लोकतांत्रिक परंपरा?

इन तीनों उदाहरणों से यह साफ होता है कि बिहार की राजनीति में परिवारवाद सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि सत्ता का व्यावहारिक सूत्र बन चुका है. जनता बार-बार इन्हीं परिवारों पर भरोसा करती है. शायद इसीलिए ये राजनीतिक घराने अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने में सफल हैं. लेकिन सवाल भी उठते हैं कि क्या लोकतांत्रिक राजनीति में अवसर केवल राजनीतिक परिवारों तक ही सीमित रह गए हैं? क्या नए और सक्षम युवाओं के लिए राजनीति में प्रवेश इतना कठिन हो चुका है कि बिना किसी राजनीतिक वंश के टिकना लगभग असंभव है? इन सवालों का जवाब समय देगा लेकिन यह सच है कि झाझा, चकाई और बांका जैसे क्षेत्रों में राजनीति आज भी इन पारिवारिक शक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती है.

पटना से श्रेष्ठा नारायण की रिपोर्ट 

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