कंपनी ने कर्मचारियों के साथ की स्कूल जैसी सख्ती, नियमों पर उठे सवाल, लोगों ने कहा- ऐसे कौन करता है

सख्त अटेंडेंस पॉलिसी पर Reddit पर मचा बवाल, जहां 9:30 बजे के बाद ऑफिस आने पर हाफ-डे की सजा मिलती है. इस नियम को लेकर कर्मचारियों ने सोशल मीडिया पर जमकर नाराजगी जताई.

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कर्मचारी की नाराजगी, अटेंडेंस पॉलिसी पर सोशल मीडिया पर गरमाया माहौल

Strict office timing: इन दिनों सोशल मीडिया पर एक अजीबोगरीब कंपनी पॉलिसी चर्चा में है, जिसने लोगों को स्कूल के दिनों की याद दिला दी. फर्क बस इतना है कि यहां बच्चे नहीं, बल्कि वयस्क काम कर रहे हैं, फिर भी नियम स्कूल जैसे ही.

Reddit पर खुला मामला (Strict office rules)

Reddit पर r/IndianWorkplace नाम के अकाउंट से एक कर्मचारी ने पोस्ट डालकर अपनी MNC की सख्त अटेंडेंस पॉलिसी का खुलासा किया. कर्मचारी ने बताया कि अगर कोई भी 9:30 बजे के बाद बिना सूचना ऑफिस पहुंचता है, तो उसे सीधा हाफ-डे के रूप में मार्क कर दिया जाता है. टीम लीडर का मैसेज भी पोस्ट में शामिल था, जिसमें साफ लिखा था कि देर होने की आशंका हो तो पहले मैनेजर या टीम लीडर को बताना जरूरी है, वरना कंपनी पॉलिसी के अनुसार सजा मिलेगी.

कर्मचारियों की नाराज़गी (MNC attendance rule)

पोस्ट डालने वाले कर्मचारी ने गुस्सा जताते हुए कहा, हम स्कूल में हैं या वाकई में वयस्क? ट्रैफिक, इमरजेंसी या अचानक आने वाली परिस्थितियों पर किसी को पेनलाइज करना कहां तक सही है? खासकर तब, जब कर्मचारी अपना काम समय पर और सही ढंग से कर रहा हो. उन्होंने यह भी कहा कि बिना अनुमति छुट्टी लेने या अटेंडेंस मार्क न करने पर सैलरी काटने जैसे नियम पुराने जमाने के हैं. क्या असल में आपका काम मायने नहीं रखना चाहिए, न कि सिर्फ टाइम पर आना? उन्होंने सवाल किया.

सोशल मीडिया पर मिली प्रतिक्रियाएं (School Work Culture)

इस पोस्ट के बाद कई लोगों ने अपने-अपने अनुभव साझा किए. एक यूज़र ने सुझाव दिया कि कंपनी को लॉगिन-लॉगआउट टाइम एक घंटे आगे-पीछे करने की सलाह दें. दूसरे ने लिखा कि गुरुग्राम और नोएडा की कई कंपनियां पीक ऑवर ट्रैफिक से बचने के लिए फ्लेक्सी-शिफ्ट देती हैं. एक और ने कमेंट किया कि ये सिस्टम ऐसे कर्मचारियों को तैयार करता है जो बस आदेश मानते हैं, न कि सोचने और नवाचार करने वाले लोग बनते हैं.

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बहस का मुद्दा (work culture news)

यह मामला सिर्फ एक कंपनी की पॉलिसी का नहीं, बल्कि उस सोच का भी है जो काम की गुणवत्ता से ज्यादा समय की पाबंदी को अहम मानती है. सवाल यह है कि बदलते वर्क कल्चर में क्या अब भी 'घड़ी की सुई' ही तय करेगी कि आप अच्छे कर्मचारी हैं या नहीं?

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