कंपनी ने बनाए ऐसे नियम कि 17 लाख की नौकरी छोड़ने पर मजबूर हुआ शख्स, वायरल पोस्ट पर छिड़ी बहस

IIIT दिल्ली के एक 24 वर्षीय ग्रेजुएट ने 17 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली नौकरी छोड़ दी. वजह थी बढ़ता काम का दबाव, 15 मिनट का लंच ब्रेक और छुट्टी लेने में मुश्किल. जानिए कैसे इस फैसले ने कॉर्पोरेट वर्क कल्चर पर नई बहस छेड़ दी.

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पैसा था लेकिन सुकून नहीं! IIIT ग्रेजुएट ने क्यों छोड़ी करोड़ों की डील वाली नौकरी

आज के समय में जहां लाखों युवा अच्छी सैलरी वाली नौकरी पाने का सपना देखते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पैसे से ज्यादा अपनी मानसिक शांति और जिंदगी को महत्व दे रहे हैं. हाल ही में एक 24 वर्षीय युवक की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसने 17 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ दी क्योंकि वह काम के दबाव और खराब वर्क-लाइफ बैलेंस से परेशान हो चुका था.

चिराग मदान, जो भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली (IIIT) से ग्रेजुएट हैं, ने हाल ही में अपनी नौकरी छोड़ने का कारण एक वीडियो के जरिए शेयर किया. वह कॉर्पोरेट बैंकिंग सेक्टर में काम कर रहे थे और उनकी सालाना सैलरी करीब 17 लाख रुपये थी.

9 से 5 की नौकरी बनी 9 से 7

चिराग ने बताया, कि शुरुआत में उनकी नौकरी सामान्य 9 से 5 की थी, लेकिन धीरे-धीरे काम का समय बढ़कर सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक हो गया. इतना ही नहीं, 5 दिन का वर्कवीक भी बढ़कर 6 दिन का हो गया, जिससे उन्हें खुद के लिए बिल्कुल समय नहीं मिल पाता था.

देखें Video:

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15 मिनट में खत्म करनी पड़ता था लंच

उन्होंने बताया, कि काम का दबाव इतना ज्यादा था कि लंच के लिए सिर्फ 10 से 15 मिनट का ही समय मिलता था. इस दौरान भी लगातार काम का दबाव बना रहता था, जिससे ठीक से ब्रेक लेना मुश्किल हो जाता था.

चिराग के मुताबिक, अगर किसी को बीमार होने पर छुट्टी लेनी होती थी, तो उसे भी विस्तार से कारण बताना पड़ता था. इस वजह से जरूरत के समय भी लोग छुट्टी लेने से हिचकते थे.

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करोड़ों के टारगेट का दबाव

उन्होंने यह भी बताया, कि कर्मचारियों पर करीब 10 करोड़ रुपये तक के डील क्लोज करने का टारगेट होता था. अगर टारगेट पूरा नहीं होता, तो लगातार प्रेशर और परफॉर्मेंस रिव्यू का सामना करना पड़ता था, जो धीरे-धीरे मानसिक तनाव का कारण बन गया.

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

चिराग की यह कहानी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई और लोगों ने इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं. कई लोगों ने उनके फैसले की सराहना की और कहा कि मेंटल हेल्थ पैसे से ज्यादा जरूरी है. वहीं, कुछ लोगों ने कहा कि यह कॉर्पोरेट दुनिया की सच्चाई है, जिससे कई युवा रोज गुजरते हैं. कई यूजर्स ने इसे रियलिटी चेक बताते हुए कंपनियों से बेहतर वर्क कल्चर की मांग की.

(Disclaimer: यह खबर सोशल मीडिया पर यूजर द्वारा की गई पोस्ट से तैयार की गई है. एनडीटीवी इस कंटेंट की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता.)

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