ईरान तो ठीक है लेकिन अली खामनेई का जनाजा इराक क्यों गया? वजह आपको जाननी चाहिए

ईरान में अली खामेनेई का जनाजा इस्लाम जगत में एक विचार, एक नई सत्ता और एक नए दौर की शुरुआत का ऐलान भी है. पढ़िए क्यों पांच शहर से गुजरा सुप्रीम लीडर का जनाजा.

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खामेनेई की ताबूत के साथ उनकी 14 महीने के नवासी के ताबूत को देखकर वहां हर कोई रो पड़ा
AFP

अयातुल्लाह अली खामनेई का जनाजा 3 जुलाई से दुनिया के सामने हैं. जनाजा 6 जुलाई तक तेहरान में रहा, फिर 7 को कुम शहर तो 8 जुलाई को इराक के नजफ और करबला में गया. वहीं अब 9 जुलाई को मशहद के इमाम अली रजा के श्राइन में उन्हें दफन किया जाएगा.  

ईरान तक तो ठीक है लेकिन आखिर क्यों खामेनेई का जनाजा इराक ले जाया गया, क्या है ईरान और इराक दोनों देशों की धार्मिक मान्यता? इस आर्टिकल में इसी सवाल का जवाब तलाशेंगे. 

अयातुल्लाह अली खामनेई शिया लोगों के सर्वोच्च धर्मगुरू थे. शिया लोग 1 अल्लाह, 1 लाख 24 हजार पैगंबर  और 12 इमाम को मानते हैं. इसमें सबसे पैगंबर मोहम्मद साहब सबसे बड़े पैगंबर है और उनकी बेटी जनाबे फातमा ज़हरा जन्नत में महिलाओं की सरदार मानी जाती हैं. इसके साथ ही हजरत अली को पहला इमाम जिनके नस्ल से 11 इमाम और हैं. जिन्हें शिया लोग अपना इमाम मानते हैं.

वहीं इराक में पहले इमाम हजरत अली का श्राइन है और करबला भी इराक में ही है. जहां हजरत अली के बेटे और शियाओं के तीसरे इमाम हजरत हुसैन अपने 72 साथियों के साथ करबला में यजीद की फौज की तरफ से शहीद कर दिए गए थे. जहां उनका और उनके भाई हजरत अब्बास का श्राइन है, इसीलिए शिया के लिए इराक पवित्र स्थल है. 

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इस जगह हर इस्लाम को मानने वालों की जाने की ख्वाहिश होती है और अपने जनाजे को इमाम हुसैन के श्राइन में ले जाने की हर शिया तमन्ना करता है. यही वजह थी कि अयातुल्लाह खामेनेई के जनाजे को भी इमाम हुसैन और हजरत अली के श्राइन में ले जाकर आखिरी नमाज पढ़ाई गई. वहीं उनकी तदफीन ईरान में शिया के 8वें इमाम अली रजा के श्राइन में की जाएगी. 

और कहां-कहां है धार्मिक स्थल?

इराक में शिया के पहले इमाम हजरत अली, तीसरे इमाम हजरत हुसैन, 7वें इमाम मुसा काजिम, 9वें इमाम मोहम्मद तकी, 10वें इमाम अली नकी और 11 वें इमाम हसन अस्करी के श्राइन बहुत खूबसूरती के साथ बने हुए हैं. यहां हर साल 20 लाख से ज्यादा अरबईन के मौके पर ही जियारत करने वाले अकीदतमंद आते हैं. वहीं ईरान में सिर्फ 8वें इमाम अली रजा का श्राइन है जहां अयातुल्लाह खामनेई को दफन किया जाएगा.

वहीं रसूल की बेटी और शिया के लिए अहम जनाबे फातमा जहरा की कब्र सऊदी अरब में है. जहां उनकी कब्र पर कोई छत तक नहीं. वहीं दूसरे इमाम हजरत हसन, चौथे इमाम हजरत जैनूल आबिदिन, 5वें इमाम मोहम्मद बाकिर, छठे इमाम हजरत जाफिर सादिक तक... सबकी कब्र सउदी अरब के जन्नतुल बकी कब्रिस्तान में है. जिसपर शिया लोग काफी उदास और गुस्सा जाहिर करते हैं कि उनकी कब्र पर श्राइन क्यों नहीं बनाया गया है. जिससे आसानी से लोग वहां जा सके.

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एक और कारण ये भी है कि शिया इस्लाम के बड़े लोगों की कब्र, श्राइन बना कर उनकी जिंदगी को दुनिया तक पहुंचाते हैं. वहीं सऊदी अरब में ये चलन नहीं है कि वहां कब्र या श्राइन बनाया जाए. सिर्फ मोहम्मद साहब की कब्र का श्राइन है जहां उनकी कब्र पर भी कोई जा नहीं सकता. वहीं ईरान और इराक में जहां भी इमामों की कब्र हैं वहां श्राइन बने गए है. जहां लोग जाकर जियारत करते हैं. 

धार्मिक मान्यता क्या है?

शिया परंपरा में नजफ़ और कर्बला की जियारत (तीर्थयात्रा) को बहुत बड़ा आध्यात्मिक महत्व हासिल है. इसी कारण से इतिहास में कई बड़े शिया उलेमा और धार्मिक नेताओं के जनाजे इन स्थानों से गुजारे गए हैं या वहां दफन होने की इच्छा जताई गई है. हालांकि 1980-88 में ईरान और इराक के बीच भीषण युद्ध हुआ था, लेकिन धार्मिक दृष्टि से दोनों देशों के शिया समुदाय सदियों से जुड़े हुए हैं. नजफ और कर्बला शिया शिक्षा और धर्मशास्त्र के प्रमुख केंद्र रहे हैं. ईरान के पहले सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खुमैनी ने भी इराक के नजफ में कई साल रहे थे.

हर साल लाखों ईरानी कर्बला और नजफ की जियारत के लिए इराक जाते हैं, खासकर अरबईन के मौके पर सबसे ज्यादा ईरानी में इराक आते हैं.. 

सिर्फ धार्मिक या राजनीतिक भी?

विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि ईरान ने इसके जरिए से पूरे शिया दुनिया और अपने क्षेत्रीय समर्थकों के साथ एकता और निरंतरता का संदेश भी देना चाहा. इसलिए जनाजे का मार्ग तेहरान, कुम, नजफ, कर्बला और फिर मशहद जैसे धार्मिक केंद्रों से होकर रखा गया. वहीं अयातुल्लाह खामेनेई का जनाजा इराक इसलिए ले जाया गया क्योंकि नजफ और कर्बला शिया इस्लाम के सबसे पवित्र शहर हैं. 

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इमाम अली और इमाम हुसैन के रौजों पर अंतिम श्रद्धांजलि देना शिया धार्मिक परंपरा में अत्यंत सम्मान की बात मानी जाती है और यही ईरान-इराक के धार्मिक रिश्तों की सबसे बड़ी कड़ी भी है. वहीं 7 जुलाई की रात में ही इराक में अयातुल्लाह खामनेई का जनाजा आ गया था. जिसमें पहले इराक के पीएम, सांसद, सेना आदि के लोग भी मोजूद थे. वहीं ईरान के प्रेजिडेंट, विदेश मंत्री आदि भी जनाजे के साथ ही इराक में आए थे.

14 महीने की अयातुल्लाह खामनेई की नवासी ने सबको रुला दिया

जैसे ही करबला में अयातुल्लाह खामनेई की 14 महीने की नवासी का जनाजा आया. वहां सभी के आंखों में आंसू आ गए. सभी ताबूत कांधों पर लाए जाते हैं. लेकिन उस बच्ची का ताबूत हाथ में लाया गया. जिसे देखकर हर किसी की आंखे नम थी.

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अयातुल्लाह खामनेई और उनके साथ 4 जनाजे को पहले इराक के नजफ में हजरत अली के श्राइन ले जाया गया. जहां से सड़कों पर उनका जनाजा निकाला गया. इसके बाद करबला में भी इसी तरह का मंज़र था. हजारों लोगों ने अयातुल्लाह खामनेई के जनाजे में शिरकत की.

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