ईरान-US युद्ध में किसकी हुई जीत कौन हारा, भारत-चीन और खाड़ी देशों को क्या मिला? पूरी कहानी समझिए

ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर हो चुका है. लेकिन इस जंग ने मिडिल ईस्ट समेत कई देशों की तस्वीर बदल दी है.

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  • मिडिल ईस्ट में 40 दिनों की जंग के बाद अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर पर सहमति बनी लेकिन संघर्ष समाप्त नहीं हुआ
  • ईरान ने सैन्य और आर्थिक दोनों मोर्चों पर दबाव बनाए रखा और अपने एक्सिस ऑफ रजिस्टेंस नेटवर्क को मजबूत किया
  • अमेरिका को क्षेत्रीय स्तर पर झटका लगा है और खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा
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मिडिल ईस्ट में 40 दिनों की भीषण जंग के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर पर सहमति बन गई. लेकिन इससे संघर्ष खत्म नहीं होता. सीजफायर महज यह उजागर कर रहा है कि यह युद्ध कौन लड़ रहा था और इसके इर्द-गिर्द कौन जीत रहा था. अगर हम सीजफायर के रिपोर्ट कार्ड की बात करें, तो देखने में लगता है कि इस जंग में मुख्य रूप से तीन पक्ष शामिल थे- अमेरिका, ईरान और इजरायल. लेकिन सीजफायर की शर्तें दूसरों ने तय कीं. कौन लड़ा और किसने मध्यस्थता की, यही बताता है जंग में असली जीत किसकी हुई.

ईरान हर मायने में विजेता

ईरान इस संघर्ष में हर मायने में विजेता है. सैन्य नतीजा एक बराबरी पर रहा और दुनिया की सबसे ताकतवर सेना के खिलाफ बराबरी पर रहना भी एक जीत है. ईरान की मिसाइल फौज अभी भी काम कर रही है. जंग में ईरान के डिफेंस सिस्टम की असल परीक्षा हुई, जिसमें वो सफल रहा. साथ ही होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का कंट्रोल बरकरार है. इस रास्ते पर तनाव की वजह से तेल की कीमतें बढ़ीं, जिससे तेहरान को आर्थिक मजबूती मिली. ईरान ने साबित कर दिया कि वह सैन्य और आर्थिक, दोनों मोर्चों पर दबाव बना सकता है.

सबसे बड़ी बात यह है कि ईरान का एक्सिस ऑफ रजिस्टेंस यानी उसका नेटवर्क सुरक्षित है. हिजबुल्ला, हूती और इराकी गुट पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरे हैं. तेहरान अब गर्व से कह सकता है कि उसके पास परमाणु शक्ति संपन्न दुश्मनों को रोकने की क्षमता है.

अमेरिका और ट्रंप: दो अलग-अलग पक्ष

एक रणनीतिक खिलाड़ी के रूप में अमेरिका को गहरा झटका लगा है. एक क्षेत्रीय शक्ति ईरान के खिलाफ अपने लक्ष्य हासिल न कर पाना वाशिंगटन के लिए चिंता की बात है. खाड़ी देशों और पूर्वी एशिया में अमेरिका के साथियों को अब अपनी सुरक्षा रणनीति पर फिर से विचार करना होगा. अब 'हमारे हथियार खरीदो और हम तुम्हारी रक्षा करेंगे' वाला अमेरिकी वादा बेचना मुश्किल होगा.

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वहीं डोनाल्ड ट्रंप का मामला अलग है. उन्हें अमेरिका के लंबे समय के प्रभाव की चिंता नहीं है. उनकी दिलचस्पी 'शांतिदूत' और 'युद्ध खत्म करने वाले' नेता की अपनी छवि बनाने में है. उनके नजरिए से यह सीजफायर सही है. ट्रंप ने वही किया जो उनके समर्थकों को पसंद है. इसके लंबे समय में होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी उनके उत्तराधिकारियों पर होगी.

नेतन्याहू के लिए कैसा रहा युद्ध?

एक देश के रूप में इजरायल बना रहेगा, लेकिन एक नेता के रूप में बेंजामिन नेतन्याहू का बचना मुश्किल लग रहा है. यह युद्ध उनके राजनीतिक जीवन को बचाने का एक जरिया था. 'पूर्ण विजय' का वादा ही उनकी सरकार और कानूनी मुश्किलों को थामे हुए था. बिना जीत के सीजफायर ने वह पर्दा हटा दिया है. बंधकों के परिवार गुस्से में हैं और उनके साथी साथ छोड़ रहे हैं. नेतन्याहू घरेलू स्तर पर कमजोर और कानूनी तौर पर असुरक्षित हो गए हैं.

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खाड़ी देश असुरक्षित भी हुए और आपस में बंट भी गए

खाड़ी देशों (GCC) के लिए इसके परिणाम गंभीर हैं. इस सीजफायर ने उनकी आपसी फूट को साफ कर दिया है.

  • सऊदी अरब: यह देश सबसे ज्यादा खतरे में है. युद्ध के दौरान ईरानी हमलों ने दिखाया कि सऊदी अरब के तेल के ठिकाने और डिफेंस सिस्टम ईरान की पहुंच में हैं. सीजफायर से बमबारी तो रुक गई, लेकिन खतरा खत्म नहीं हुआ.
  • यूएई: अबू धाबी ने खुलकर अमेरिका का साथ दिया था, इस उम्मीद में कि कोई निर्णायक नतीजा निकलेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब उसे डर है कि ईरान इस बात को भूलेगा नहीं.
  • कतर: कतर की स्थिति अन्य खाड़ी देशों से बेहतर है. उसकी तटस्थता और ईरान के साथ गैस व्यापार ने उसे सुरक्षा दी है. लेकिन कतर भी अब जान चुका है कि अमेरिकी सुरक्षा की एक सीमा है.

मध्यस्थ और खामोश फायदा उठाने वाले

  • पाकिस्तान: इस जंग में पाकिस्तान की भूमिका चौंकाने वाली रही. 'इस्लामाबाद समझौता' पाकिस्तान के लिए पिछले दशक का सबसे बड़ा कूटनीतिक पल है, जिससे वह वैश्विक मंच पर फिर से प्रासंगिक हो गया है. खाड़ी के कुछ देश शायद पाकिस्तान के ईरान की ओर झुकाव से खुश न हों, लेकिन पाकिस्तान की परमाणु शक्ति और श्रम निर्यात की वजह से वे उससे रिश्ता नहीं तोड़ सकते.
  • चीन: चीन को खामोशी से बड़ा फायदा हुआ है. उसने ईरान के साथ अपने आर्थिक रिश्तों का इस्तेमाल सीजफायर के लिए किया और अपनी 'जिम्मेदार महाशक्ति' वाली छवि मजबूत की. बिना कुछ खोए चीन को काफी बढ़त मिली है.
  • भारत: इस संघर्ष से भारत को आर्थिक रूप से लाभ हुआ है. तेल की कीमतों में स्थिरता आई है और समुद्री रास्ते सुरक्षित हुए हैं. हालांकि भारत के लिए पाकिस्तान का कूटनीतिक रूप से मजबूत होना एक छोटी परेशानी जरूर है, जिसे संभाला जा सकता है.

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फिलिस्तीन के लिए खुले हैं दोनों रास्ते

फिलिस्तीन की स्थिति साफ नहीं है. ईरान के मजबूत होने का मतलब है कि उनके सबसे बड़े समर्थक की ताकत बढ़ी है. लेकिन इजरायल इस सीजफायर से निराश और अपमानित महसूस कर रहा है और उसका गुस्सा कहीं न कहीं निकलेगा. गाजा अभी भी उसका सबसे आसान निशाना है. एक तरफ मजबूत संरक्षक ईरान है, तो दूसरी तरफ एक घायल और खतरनाक पड़ोसी इजरायल.

यह सीजफायर अमेरिका और ईरान, या इजरायल और हिजबुल्ला के बीच के असली झगड़े को खत्म नहीं करता. इसने बस यह साफ कर दिया है कि ताकत किसके पास है. ईरान ने अपना दबदबा दिखाया. सऊदी अरब ने अपनी कमजोरी जानी. अमेरिका ने अपनी सीमाएं देखीं और ट्रंप ने अपनी जीत का ऐलान किया. ये चारों बातें एक साथ सच हो सकती हैं. यही वह कहानी है जो इस सीजफायर ने हमारे सामने पेश की है.

(ब्रिगेडियर अनिल रमन के लेख के इनपुट के साथ)

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