ईरान में फंसे पायलट को बचाने के चक्कर में अमेरिका ने गंवा दिए दो हजार करोड़ के एयरक्राफ्ट

ईरान में फंसे अमेरिकी पायलट को सुरक्षित बाहर निकालने का मिशन बेहद साहसी और जोखिम भरा था. यह ऑपरेशन CSAR यानी कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू का हिस्सा था. ऐसे मिशन दुनिया के सबसे कठिन सैन्य ऑपरेशन माने जाते हैं. इनमें दुश्मन के इलाके में घुसकर अपने सैनिकों को बचाया जाता है.

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ईरान की जमीन पर बिखड़ा पड़ा अमेरिकी विमान का मलबा.

US Pilot Rescue Operation: अमेरिका ने ईरान में फंसे पायलट को सुरक्षित बचा लिया है. रविवार सुबह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बात की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि एक बेहद साहसिक मिशन के बाद पायलट को बचा लिया गया. जंग के बीच ईरान की धरती से पायलट को सुरक्षित बचाना अमेरिका के लिए बड़ी बात है. क्योंकि यदि यह पायलट ईरान के हत्थे चढ़ जाता तो पूरी दुनिया में अमेरिका की जगहसाई होनी तय थी. अमेरिकी आधुनिक फाइटर जेट F-15 E के लापता पायलट को बचाने के लिए अमेरिका ने एक खतरनाक सैन्य ऑपरेशन लॉन्च किया. इस पूरे ऑपरेशन को ईरान की जमीन पर ही अंजाम दिया गया. जहां ईरान की ओर से भी लगातार फायरिंग हो रही थी. लेकिन इसके बाद भी अमेरिका अपने पायलट को सुरक्षित बचाने में सफल रहा. 

लेकिन इस खतरनाक ऑपरेशन के लिए अमेरिका ने बड़ी कीमत भी चुकाई. ईरान में फंसे इस एक पायलट की जान के लिए अमेरिका ने करीब दो हजार करोड़ की कीमत वाले अपने एयरक्राफ्ट भी गंवा दिए. 

कैसे हुआ यह पूरा ऑपरेशन जानिए

शुक्रवार को ईरान में अमेरिकी लड़ाकू विमान F-15 E गिरने के बाद पायलट को पकड़ने के लिए जैसे एक रेस शुरू हो गई. ईरान की IRGC और कई मिलिशिया ग्रुप उनकी तलाश में जुट गए. ईरान ने सरकारी टीवी से ऐलान कर दिया कि जो कोई पायलट को पकड़ेगा उसे 50 लाख का ईनाम दिया जाएगा. हथियारों से लैस स्थानीय लोग भी जंगलों और पहाड़ों में पायलट को खोज रहे थे. ईरान चाहता था कि वह पायलट को जिंदा पकड़ ले ताकि वह अमेरिका के साथ मोलभाव कर सके. 

यदि यह पायलट ईऱान के हाथ लग जाता तो युद्ध की तस्वीर कुछ और होती. साथ ही अमेरिका को वैश्विक स्तर पर शर्मिंदगी भी झेलनी पड़ती. लिहाजा अमेरिका ने अपने पायलट को बचाने के लिए एक खतरनाक मिशन शुरू किया. 

भीषण गोलीबारी के बीच पायलट तक कैसे पहुंचे अमेरिकी जवान

अमेरिकी सेना ने तेजी से कार्रवाई की. US स्पेशल फोर्स ने दक्षिण ईरान के अंदर घुसकर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया. देहदाश्त इलाके में रातभर भीषण गोलीबारी होती रही. अंतिम दिन तो ऐसा हुआ कि अमेरिकी टीम और ईरानी बल आमने-सामने थे. बताया जाता है कि पायलट कई घंटों तक छिपा रहा. वह लगातार अपनी जगह बदलता रहा ताकि पकड़ा न जाए. अमेरिका ने सैटेलाइट से जुड़े खास रेडियो सिग्नल से उसकी लोकेशन पता की. इसके बाद कमांडो टीम मौके पर पहुंची. ये पूरा ऑपरेशन नाइट स्टॉकर्स यूनिट ने संभाला. 

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हेलीकॉप्टर्स के अलावा एक विशेष ट्रांसपोर्ट एयरकाफ्ट सी 130 की मदद से स्पेशल फोर्स पायलट तक पहुंचे. पायलट के बचाव के दौरान अमेरिकी और ईरानी सेनाओं के बीच मुठभेड़ हुई. भारी फायरिंग के बीच आखिरकार पायलट को सुरक्षित निकाल लिया गया.

दो हजार करोड़ के एक C-130 और दो ब्लैक हॉक्स हेलीकॉप्टर गंवाए

हालांकि इस ऑपरेशन में अमेरिकी हेलीकॉप्टर को भी नुकसान पहुंचने की खबर है. कुछ सैनिकों के घायल होने की भी बात सामने आई है. लेकिन मिशन को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया. दुश्मन के इलाके में घुसकर जंग के दौरान पायलट को ईरान से बाहर सुरक्षित निकालना सबसे बड़ी चुनौती थी  कई ट्रांसपोर्ट विमान और हेलीकॉप्टर  इस काम में लगाए गए. कुछ विमान तकनीकी कारणों से फंस गए थे.अमेरिका ने तुरंत नए विमान भेजे और हालात संभाले.

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खबर ये भी है कि अमेरिका ने खराब विमानों को दुश्मन के हाथ लगने से पहले नष्ट कर दिया गया. इसके बाद पूरी टीम को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया. यह अलग बात है कि एक सी-130 और दो ब्लैक हॉक्स हेलीकॉप्टर का नुकसान अमेरिका को झेलना पड़ा, जिसकी कीमत करीब दो हजार करोड़ के आसपास है. 

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सबसे खतरनाक ऑपरेशन में से एक

इस ऑपरेशन में खतरे का अंदाजा इस बात ये लगाया जा सकता है कि इसे पूरी तरह ईरान में अंजाम दिया गया. Us देश में जहां की सेना से लेकर पुलिस, इंटेलिजेंस, सारे हालात अमेरिका के विपरीत थे. 

पायलट की सेफ्टी और इंज्यूरी की भी चिंता 

वहीं पायलट के बारे में ये तो पता था कि वो जिंदा है. लेकिन उसे कितनी चोट आई है, इसकी जानकारी नहीं थी. क्योंकि मिसाइल हमले बाद जलते हुए फाइटर से पैराशूट के साथ बाहर कुदना यानी इजेक्शन बहुत ही मुश्किल होता है. जमीन पर गिरने के बाद 90% चांसेज रहते हैं कि पायलट घायल हो जाएगा. उतरने के बाद वो अपने साथियों को सही लोकेशन की जानकारी देता है. वो जनता है कि अगर वह दुश्मन के हाथ पड़ गया तो उसके गंभीर टार्चर भुगतना पड़ेगा या फिर उसे मार दिया जाएगा.

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ऐसे खतरनाक हालात में भी अमेरिकी कमांडो अपने पायलट को बचाने को लिये दुश्मन के जमीन पर उतरे. उन्हें भी कोई डर नही होता है कि इस ऑपरेशन के सफल होने के 100 फीसदी गारंटी नहीं है, फिर भी कोशिश करते है और उसमें वह कामयाब होते है. हालांकि अमेरिका ऐसे ऑपरेशन ईराक और अफगानिस्तान में कर चुका है. लेकिन वाकई में यह बहुत ही मुश्किल होता है. क्योंकि हर जंग में अलग तरह की स्थिति होती है. 

मिशन पूरा होने के बाद ट्रंप ने पायलट बचाने की पुष्टि की

मिशन पूरा होने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पायलट के बचाए जाने की पुष्टि की. उन्होंने इसे बेहद साहसी और जोखिम भरा मिशन बताया. यह ऑपरेशन CSAR यानी कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू का हिस्सा था.

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ऐसे मिशन दुनिया के सबसे कठिन सैन्य ऑपरेशन माने जाते हैं. इनमें दुश्मन के इलाके में घुसकर अपने सैनिकों को बचाया जाता है. हर पल जान का खतरा बना रहता है. सबसे बड़ी बात ऑपरेशन में ना तो कोई सैनिक घायल हुआ और ना ही मारा गया.

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