‘कूटनीतिक जीत’: ट्रंप को लेकर पाकिस्तान में मचा बवाल तो शहबाज के मंत्री का संसद में जवाब

जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (जेयूआई-एफ) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने भी इस फैसले का विरोध करते हुए दावा किया कि यह “ट्रंप के डर” के कारण लिया गया है.  

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  • दावोस में 19 देशों के नेताओं ने शांति बोर्ड के चार्टर पर हस्ताक्षर किए, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल था
  • विपक्ष ने शांति बोर्ड में शामिल होने के निर्णय की कड़ी निंदा की और इसे देश की संप्रभुता के खिलाफ बताया
  • मंत्री ने कहा कि पाकिस्तान ने मई में भारत के साथ संघर्ष में देश की रक्षा का साहसिक उदाहरण दिया था
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पाकिस्तान के योजना मंत्री अहसान इकबाल ने शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले शांति बोर्ड में शामिल होने के सरकारी फैसले का बचाव करते हुए कहा कि गाजा और फिलिस्तीन में शांति के लिए अपने मुस्लिम भाईचारे वाले देशों के साथ पाकिस्तान का केंद्र में होना एक “कूटनीतिक जीत” है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सहित पाकिस्तान समेत 19 देशों के नेता और वरिष्ठ अधिकारी गुरुवार को दावोस में एकत्रित हुए और शांति बोर्ड के संस्थापक चार्टर पर हस्ताक्षर किए. विपक्ष ने इस कदम की कड़ी निंदा की है.

डीेगे हांकते दिखे

आज संसद के संयुक्त सत्र में इस मामले पर बहस हुई, जिसे राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने एक दिन पहले बुलाया था और जिसकी अध्यक्षता राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष सरदार अयाज सादिक ने की. सत्र के दौरान बोर्ड में शामिल होने के सरकार के फैसले का बचाव करते हुए इकबाल ने कहा कि इस “कूटनीतिक जीत” का जश्न मनाया जाना चाहिए. उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत 1998 में पाकिस्तान द्वारा किए गए परमाणु परीक्षणों को याद करते हुए की. उन्होंने कहा, “हमने पाकिस्तान की स्वतंत्रता और संप्रभुता का उदाहरण पेश तब भी किया, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ने पांच बार फोन किया. पाकिस्तान पर दुनिया भर से दबाव था, लेकिन हमने परीक्षण करने का निर्णय साहस के साथ लिया.”

विपक्षी बेंचों के जोरदार विरोध के बीच उन्होंने जोर देकर कहा, “हमें पाकिस्तान की रक्षा और अखंडता के बारे में सिखाने की जरूरत नहीं है. हम पाकिस्तान की स्वतंत्रता और संप्रभुता के रक्षक हैं.” उन्होंने आगे जोर देकर कहा कि पीएमएल-एन के सत्ता में होने से “पाकिस्तान की अखंडता और संप्रभुता को कोई खतरा नहीं हो सकता.”

ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र

इकबाल ने कहा कि मई में भारत के साथ चार दिवसीय संघर्ष के दौरान सरकार और सशस्त्र बलों ने यह साबित कर दिया था कि देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने वाले किसी भी व्यक्ति को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा. इसलिए कोई हमें कायर और लापरवाह नहीं कह सकता.

मंत्री ने कहा कि सदन में फिलिस्तीन पर भाषण देना बहुत आसान है, और उन्होंने आगे कहा कि फिलिस्तीनी क्षेत्र में देखी गई क्रूरता से हमारे दिल जख्मी हो गए हैं. उन्होंने आगे कहा, "लेकिन मुस्लिम देशों ने उस रक्तपात को समाप्त करने के लिए सामूहिक पहल की." उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष फिलिस्तीन के लोगों द्वारा मनाई जा रही शांति को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है.

...तो कहते अलग-थलग कर दिया

इकबाल ने कहा कि अगर सरकार ने शांति बोर्ड में शामिल न होने का फैसला किया होता, तो विपक्षी सदस्य यह कहते कि पाकिस्तान को कोई महत्व नहीं दिया गया, उसे अलग-थलग कर दिया गया. वे सवाल उठाते कि पाकिस्तान शांति की इतनी बड़ी पहल का हिस्सा क्यों नहीं है.

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शांति बोर्ड में शामिल होने वाले अन्य मुस्लिम देशों का उल्लेख करते हुए, इकबाल ने पूछा कि क्या वे मुस्लिम देश और पाकिस्तान के भाईचारे वाले देश नहीं हैं? क्या वे मुसलमानों के रक्तपात में योगदान देने के लिए शांति बोर्ड में शामिल हुए हैं?

मंत्री ने कहा कि इस पहल के माध्यम से प्रमुख मुस्लिम देशों को फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों और फिलिस्तीनी शांति के लिए अपनी भूमिका निभाने का अवसर दिया गया है.  उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार का रुख वही है जो पाकिस्तान के लोगों का है: 'इजराइल एक हमलावर और क्रूर देश है, जिसके हाथों पर मुसलमानों और फिलिस्तीनियों का खून है.'

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उन्होंने कहा कि हमारा नैतिक रुख बिल्कुल नहीं बदला है. सरकार ने इसी रुख के आधार पर बोर्ड में शामिल होने का निर्णय लिया है. ताकि हम अपने भाई देशों के साथ मिलकर फिलिस्तीनी शांति के लिए अपनी भूमिका निभा सकें. फिलिस्तीनी में बमबारी रुकने का एक प्रमुख कारण आठ मुस्लिम देशों की भूमिका थी, जिन्होंने गाजा के लिए युद्धविराम योजना पर ट्रंप प्रशासन के साथ काम किया था. फिलिस्तीनी लोगों ने उस युद्धविराम को स्वीकार किया, और उन्होंने इस बात की सराहना की कि इसके परिणामस्वरूप मिली शांति ने उन्हें अपना जीवन नए सिरे से शुरू करने का अवसर दिया.

विपक्ष ने जमकर धोया

इकबाल से पहले बोलते हुए, सीनेट में विपक्ष के नेता राजा नासिर अब्बास ने संसद को विश्वास में लिए बिना शांति बोर्ड में शामिल होने के सरकार के फैसले पर आपत्ति जताई.  उन्होंने निंदा करते हुए कहा, “यह बोर्ड फिलिस्तीनी लोगों की मुसीबतों को और बढ़ाएगा. जो काम इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू नहीं कर सके, वह शांति बोर्ड के नाम पर शुरू होगा. ” जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (जेयूआई-एफ) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने भी इस फैसले का विरोध करते हुए दावा किया कि यह “ट्रंप के डर” के कारण लिया गया है.  उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति पर ईरान जैसे मुस्लिम देशों के खिलाफ इजरायल को मजबूत करने का आरोप लगाया. इससे पहले, जेयूआई-एफ के सीनेटर कामरान मुर्तजा ने सीनेट में स्थगन प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें संसद या कैबिनेट को विश्वास में लिए बिना पाकिस्तान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 'शांति बोर्ड' में शामिल करने के मुद्दे पर चर्चा की मांग की गई थी.

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